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जन्म के एक घंटे के अंदर नवजात को ब्रेस्टफीड करवाया जाता है. डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइंस के अनुसार भी ऐसा करना जरूरी बताया गया है. विशेषज्ञ भी इसे बच्चे के लिए अमृत मानते हैं. इसके अलावा भी छह माह तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध देने की ही बात कही जाती है. जानिए मां का दूध बच्चे की सेहत को किस तरह से फायदा पहुंचाता है.
1. नवजात के जन्म के तुरंत बाद निकलने वाला मां का पहला दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है. बीटा-कैरोटीन की उच्च मात्रा के कारण इसका रंग पीला या संतरी होता है. इस दूध से बच्चे को प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट और कैल्शियम जैसे कई तरह के पोषक तत्व मिल जाते हैं. ये बच्चे की इम्यूनिटी को मजबूत करने वाली कोशिकाओं का निर्माण करता है, साथ ही बच्चे के शरीर से बिलीरुबिन को निकालकर पीलिया होने को रोकता है.
2. इसके अलावा ब्रेस्टफीडिंग बच्चे को यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन, रेस्पिरेट्री ट्रैक्ट इन्फेक्शन बैक्टीरिया के कारण होने वाले संक्रमण और डायरिया जैसी समस्याओं से बचाता है.
3. तमाम विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रेस्ट मिल्क कोलेस्ट्रॉल, टॉरिन और डीएचए का बेहतर सोर्स है. ये तीनों पोषक तत्व मानसिक विकास के लिए बेहतर माने जाते हैं. माना जाता है कि ब्रेस्टफीडिंग से बच्चे का आईक्यू भी विकसित होता है.
4. विशेषज्ञों की मानें तो मां को एक स्तन से 10 से 15 मिनट तक फीड कराना चाहिए. शुरुआत के तीन-चार दिन तक बच्चे को कई बार स्तनपान कराना चाहिए क्योंकि इस दौरान दूध अधिक बनता है और यह उसके लिए बेहद जरूरी है. लेकिन फीड कराते समय साफ-सफाई का विशेष खयाल रखें.
5. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक बच्चे को दो साल की उम्र तक ब्रेस्टफीडिंग करानी चाहिए. जन्म के पहले घंटे से लेकर छह माह तक मां का दूध ही उसका आहार होना चाहिए. छह महीने के बाद बच्चे के खानपान में दाल का पानी और केला जैसी चीजें शामिल करनी चाहिए. एक साल के बाद उसे दलिया, सूजी की खीर, फल वगैरह खिलाएं.
इन स्थितियों में नहीं कराएं फीड
1. सामान्य मामलों में मां का दूध बच्चे के लिए बहुत जरूरी होता है. लेकिन अगर मां एचआईवी पॉजिटिव, टीबी या कैंसर की मरीज है, कीमोथैरेपी ले रही है तो उसे फीड नहीं कराना चाहिए.
2. इसके अलावा बच्चे को गैलेक्टोसीमिया नाम की बीमारी है, तो भी उसे फीड न कराएं. इस बीमारी के चलते बच्चा दूध में मौजूद शुगर को पचा नहीं पाता.
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