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रासायनिक दृष्टि से यह सोडियम क्लोराइड (NaCl) है जिसका क्रिस्टल पारदर्शक एवं घनाकार होता है। शुद्ध नमक रंगहीन होता है, किंतु लोहमय अपद्रव्यों के कारण इसका रंग पीला या लाल हो जाता है।
भारत में नमक के स्रोत
सन् 1947 के पूर्व भारत में नमक का प्रधान स्रोत लवणश्रेणी (Salt Range) थी। खैबर (पाकिस्तान) में नमक की विशाल खानें हैं। यहाँ नमक की तह की मोटाई 100 फुट से भी अधिक है। यह नमक इतना अधिक वर्णहीन एवं पारदर्शक है कि यदि नमक की 10 फुट मोटी दीवाल के एक ओर प्रकाशपुंज रखा जाए तो दूसरी ओर कोई भी व्यक्ति सरलता से पढ़ सकता है। इस नमक निक्षेप पर पर्याप्त लंबे समय से खननकार्य होता चला आ रहा है। यहाँ नमक के खाननकार्य के समय एक प्रकार की धूल (Salt dust) विपुल मात्रा में बनती है। यह लवणीय धूल इंपीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज द्वारा संचित की जाती है जो इसका उपयोग क्षारीय संयत्र (Alkali plant) में करते हैं। इस क्षेत्र से नमक के उत्पादन की मात्रा भारत विभाजन के पूर्व 1,87,490 टन था। खैबर नमक की शुद्धता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। इसके अतिरिक्त अनेक स्थान और भी हैं जहाँ नमक के समृद्ध स्तर प्राप्त हुए हैं। ऐसा ही एक स्थान वाछी तथा दूसरा कोहर है। यहाँ पर नमक के अतिरिक्त पोटासियम क्लोराइड भी कुछ अंशों में विद्यमान है। विभाजन के पश्चात् यह भाग पाकिस्तान में चला गया है। इस समय भारत का शैल्य नमक स्रोत केवल हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित नमक की खानें हैं। यहाँ पर दो स्थानों गुंमा तथा ध्रंग में नमक की खुदाई का कार्य बहुत समय से होता रहा है। सड़क के किनारे-किनारे जोगिंदर नगर से मंडी तक अनेक स्थानों पर लवण जल के झरने हैं। गुंमा में नमक का एक निक्षेप 150 फुट से अधिक मोटा है, किंतु इस नमक में 10-15 प्रतिशत तक बालू के रूप में सिलिका मिला हुआ है। अत: यह नमक पूर्ण रूप से मनुष्य के खाने के योग्य नहीं है। लंबे समय से यह नमक पशुओं को खिलाने के उपयोग में लाया जाता रहा है। गुंमा में लवण निक्षेपों से एक पूर्णत; शुद्ध एवं श्वेत प्रकार का नमक उत्पन्न करने की योजना भारत सरकार बना रही है। ध्रंग में भी लवण जल के अनेक विशाल झरने हैं, जहाँ नमक के विलयन को वाष्पित कर उच्च प्रकार का नमक प्राप्त किया जा सकता है।
भारत में नमक का द्वितीय स्रोत राजस्थान है। साँभर के समीप लगभग 90 वर्ग मील का एक बृहत् क्षेत्र है जो एक गर्त है। इस गर्त के निकटवर्ती क्षेत्रों का जल एकत्र हो जाता है और इस प्रकार नमकीन जल की एक झील बन जाती है। संभवत: इसका कारण निकटवर्ती क्षेत्रों की मिट्टी में नमक का विद्यमान होना ही है। यह लवण जल क्यारियों में एकत्र किया जाता है। यहाँ इसका धूप द्वारा वाष्पीकरण होता है, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रचंड धूप पड़ती है। नवंबर के महीने में ये क्यारियाँ लवणजल से भरी जाती हैं तथा अप्रैल, मई तक अवक्षिप्त नमक को एकत्र कर लिया जाता है और जो बिटर्न (Bittern) शेष रहता है उसे झील के एक भाग में संचित कर दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त नमक उत्तम होता है। नमक का उत्पादन इस क्षेत्र में पर्याप्त होता है। अभी तक इस नमक के उद्भव (Origin) का स्पष्टीकरण नहीं हुआ है। कुछ विद्वानों का कहना है कि यह वायुजनित नमक है जो समुद्र से वायु के साथ आता है और वर्षा के साथ राजस्थान में गिर जाता है तथा इस विशाल झील में संचित हो जाता है। बिटर्न का बहुत समय तक कोई मूल्य ही नहीं समझा जाता था, किंतु लेखक ने अनुसंधान करके पता लगाया है कि इस बिटर्न में लगभग 62 प्रतिशत सामान्य लवण, 25 प्रतिशत सोडियम सल्फेट तथा 8 प्रतिशत सोडियम कार्बोनेट होता है। इस क्षेत्र में सोडियम सल्फेट तथा सोडियम क्लोराइड के लवणों का विपुल मात्रा में संग्रह हा सकता है। उपयुक्त साधनों से नमक से सोडियम सल्फेट तथा सोडियम कार्बोनेट का पृथक्करण संभव हो सकता है। साँभर झील क्षेत्र में एक लंबे समय से खननकार्य किया जा रहा है, किंतु अभी तक नमक के उत्पादन तथा मात्रा में कोई ह्रास नहीं हुआ है। अत: यह झील नमक का एक चिरस्थायी स्रोत समझी जा सकती है।
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