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व्यक्तित्व विकृति के कारण
व्यक्तित्व विकृति के मूल रूप से क्या-क्या कारण है, इस पर मनोवैज्ञानिकों एवं मनश्चिकित्सकों द्वारा ज्यादा प्रकाश नहीं डाला गया है। व्यक्तित्व विकृति के कारणों के संबंध में पर्याप्त अध्ययन एवं जानकारी न होने के प्रमुख कारण हैं-
इसका प्रथम कारण तो यह है कि व्यक्तित्व विकार की औपचारिक रूप से स्वतंत्र पहचान 1952 के पहले नहीं हो पायी थी। अत: इस क्षेत्र में आवश्यक शोध अध्ययन की कमी है।
दूसरा प्रमुख कारण यह है कि व्यक्तित्व विकृतियों का स्पष्ट रूप से निदान करने में लोगों को अभी भी अनेक प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और इस विकृति से ग्रसित लोग अभी भी उपचार हेतु मनोवैज्ञानिक उपचारगृह में नहीं जाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्तित्व विकृति के कारणों को लेकर अनेक कठिनाइयाँ मौजूद है, किन्तु इसके बावजूद अन्य मनोविकारों के समान ही व्यक्तित्व विकृति के भी तीन प्रमुख कारण बताये गये हैं।
जैविक कारक
मनोवैज्ञानिक कारक
सामाजिक-सांस्कृतिक कारक
1. जैविक कारक - मनोवैज्ञानिकों एवं मनोचिकित्सक ने व्यक्तित्व विकृति के कारणों में जैविक कारकों की भूमिका को प्रधान रूप से स्वीकार किया है। विभिन्न प्रयोगात्मक अध्ययनों के अनुसार बच्चों में विशेष तरह की शरीर संगठनात्मक प्रतिक्रिया प्रवृत्ति जैसे-अति संवेदनशीलता उच्च अथवा जीवन शक्ति आदि कारणों से एक विशेष प्रकार की व्यक्तित्व विकृति के उत्पन्न होने की संभावना रहती है। केन्टलर एवं गु्रयनवर्ग के अनुसार स्थिर व्यामोही व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में जैविक या शारीरिक कारकों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है।
लोरैन्गर एवं उनके सहयोगियों ने अपने अध्ययन के आधार पर ज्ञात किया कि सीमान्त रेखीय व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में शारीरिक कारण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते है। इसके साथ ही समाजविरोधी व्यक्तित्व विकृति की उत्पत्ति में भी जैविक कारकों को महत्त्वपूर्ण माना गया है।
2. मनोवैज्ञानिक कारक- व्यक्तित्व विकृति में जैविक कारकों के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक कारकों की भूमिका को भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। इन मनोवैज्ञानिक कारकों में प्रारंभिक सीखना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस मत के अनुसार बच्चे बचपन में ही अपने आसपास के वातावरण से कुछ-कुछ अनुक्रियाओं को कुछ खास ढंग से करना सीख जाते हैं, जो आगे चलकर व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करती है। वैसे तो सभी प्रकार की व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करने में मनोवैज्ञानिक कारक महत्त्वपूर्ण है, किन्तु इनमें भी समाज-विरोधी व्यक्तित्व विकार के कारणों में इनकी विशिष्ट भूमिका को स्वीकार किया गया है।
3. सामाजिक -सांस्कृतिक कारक- जैविक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों की तरह सामाजिक-सांस्कृतिक कारक किस प्रकार व्यक्तित्व विकृतियों को उत्पन्न करते हैं यह बात अभी अधिक स्पष्ट नहीं हो पायी है। इस संबंध में और अधिक शोध अध्ययन की आवश्यकता है। मनोवैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि आधुनिक आरामतलब जिन्दगी, तुरंत संतुष्टि, समस्याओं का तुरंत समाधान होना आदि के कारण व्यक्ति में उत्तरदायित्वहीनता एवं आत्मकेन्द्रितता जैसे लक्षण विकसित होने लगते है, जो धीरे-धीरे व्यक्तित्व विकृति को उत्पन्न करती हैं। फिर भी इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहने के लिये पर्याप्त शोध की आवश्यकता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्तित्व विकृति के कारणों में जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों की भूमिका महत्वपूर्ण है, किन्तु इस क्षेत्र में पर्याप्त शोध अध्ययन की आवश्यकता आज भी निरन्तर अनुभव की जा रही है।
व्यक्तित्व विकृति के निदान में सम्मिलित समस्यायें- व्यक्तित्व विकृतियों का ठीक-ठीक निदान करने में अनेक तरह की समस्यायें है।
व्यक्तित्व विकृतियों के निदान में पहली समस्या तो पर्याप्त शोध अध्ययनों का अभाव है, जिसके कारण नैदानिक मनोवैज्ञानिक एवं मनश्चिकित्सक इनके निदान हेतु वस्तुनिष्ठ कसौटी नहीं बना पाये हैं। इसके अतिरिक्त विद्वानों ने व्यक्तित्व विकृति को स्पष्ट रूप से परिभाषित भी नहीं किया है, जिसके कारण इनके निदान में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
विडगर तथा फ्रान्सेस का मत है कि व्यक्तित्व विकारों की ठीक-ठीक पहचान करना इसलिये भी कठिन हो जाता है, क्योंकि व्यक्तित्व विकृति के विभिन्न प्रकार परस्पर अनन्य नहीं है। कहने का आशय यह है कि एक ही व्यक्ति में व्यक्तित्व विकार के एक से अधिक लक्षण देखने को मिलते है। इस कारण यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि व्यक्तित्व विकारों में से कौन सा प्रकार है।
फ्रान्सेस के शब्दों में ‘‘ व्यक्तित्व विकृतियों में पाये जाने वाले व्यक्तित्व शीलगुण का स्वरूप विमीय होने के कारण वे सामान्य अभिव्यक्ति से लेकर रोगात्मक अभिव्यक्ति दोनों में पाये जाते हैं।’’ कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे शीलगुण कुछ मात्रा में सामान्य व्यक्तियों में भी देखने को मिलते हैं, जिसके कारण वास्तविक व्यक्तित्व विकृति का निदान करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।
व्यक्तित्व विकृतियों के निदान में एक और कठिनाई यह है कि इन विकृतियों को वस्तुनिष्ठ व्यवहारों के आधार पर परिभाषित नहीं किया जाता है बल्कि अनुमानित शीलगुणों के आधार पर परिभाषित किया जाता है। इस कारण भी इनके निदान में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
इस प्रकार आप समझ गये होंगे कि व्यक्तित्व विकृति के निदान या पहचान में नैदानिक मनोवैज्ञानिकों एवं मनश्चिकित्सकों को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे निदान की विश्वसनीयता बुरी तरह प्रभावित होती है। इन समस्याओं को दूर करने के लिये यह आवश्यक है कि व्यक्तित्व विकृति के निदान हेतु वस्तुनिष्ठ कसौटी तैयार की जाये।
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