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गाय-भैंस जैसे पशुओं में अक्सर फूल दिखने या गर्भाशय का बाहर निकल आना की समस्या देखने को मिलती है, जिसका प्रबंधन खानपान की दृष्टि से ठीक नहीं होता है। जिन पशुओ को उनकी आवश्यकता से कम पौष्टिक आहार और मिनरल मिक्सचर, विटामिन्स जैसे जरूरी आहार नहीं दिया जाता है, ऐसे पशुओं में ये समस्या देखने को मिलती है। भैसें गायों से प्रजनन के कई महत्वपूर्ण तथ्यों में अलग होती हैं जो उनको प्रजनन संबंधी कई बीमारियों के प्रति अतिसंवेदनशील बनाती हैं और उनकी प्रजनन क्षमता को कमतर करती हैं। किसानों को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाली बीमारियों में से एक प्रसव से पहले गर्भवती भैंसों की फूल/पिछा दिखाने की समस्या है, जिसमें गाभिन पशु जोर लगाता है और उसकी योनि और गर्भाशय ग्रीवा का पिछला हिस्सा शरीर से बाहर आ जाता है। फूल दिखाने की यह समस्या प्रिमिपेरस (पहली बार बच्चा देने वाले) पशुओं की तुलना में एक से अधिक बार बच्चे दे चुके पशुओं में अधिक पाई जाती है। यह मुख्य रूप से गर्भावस्था के आखिरी 2-3 महीने में ही होती है, लेकिन 5-6 महीने की गर्भवती भैंसों में भी यह बीमारी देखी गयी है।
फूल दिखने की समस्या शुरूआत गाय/भैंसों में फूल दिखाने की समस्या मुख्य रूप से बच्चा जनने से पहले ही होती है। आमतौर पर यह समस्या प्रसव के 15-60 दिन पहले शुरू होती है। रोग की शुरूआत में भैंस के बैठने पर छोटी गेंद के समान रचना योनिद्वार पर दिखाई देती है। भैंस के खड़े होने पर यह योनिद्वार के अन्दर चली जाती है। धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता रहता है और इसमें मिट्टी, भूसा व कचरा चिपकने लगता है। इसके कारण भैंस को जलन होती है और वह पीछे की ओर जोर लगाने लगती है। जिस कारण से समस्या बढ़ती जाती है और जटिल हो जाती है।
कभी-कभी तो कुत्ते और कौवे इसकी ओर आकर्षित होकर शरीर के बाहर निकले हुए भाग को काटने लगते हैं। बीमारी के लक्षण फूल दिखाने की समस्या को प्रजनन अंगों के शरीर से बाहर निकलने और बीमारी की गंभीरता के हिसाब से मुख्य रूप से तीन तरीकों से देखा जाता है –
पहली अवस्था – इस हालात में जब पशु बैठा या लेटा हुआ होता है तो योनि श्लेष्म योनि के बाहर निकलता है, लेकिन जब पशु खड़ा होता है तो अंदर चला जाता है।
दूसरी अवस्था – जब पशु खड़ा होता हैं तो शरीर से बाहर निकला हुआ प्रजनन अंग बाहर ही रहता है जिसमे योनि श्लेष्म ही मुख्य भाग होता है।
तीसरी अवस्था – इसमें योनि के साथ-साथ गर्भाशय ग्रीवा भी शरीर के बाहर आ जाती है और पशु अत्यधिक जोर लगाता है। इस तरह से फूल दिखाने की समस्या जो मुख्यत गर्भावस्था के अंतिम दिनों से जुड़ी होती है निम्न स्तर से लेकर जानलेवा भी हो सकती है। इससे जुड़े मुख्य लक्षण हैं- पशु के द्वारा गोबर व पेशाब करते वक्त जोर लगाना योनि के बाहर प्रजनन अंगों का लटका रहना बाहर निकले हुए मास की सूजन गाभिन पशुओं में पेशाब की रूकावट मुख्यत इस रोग से जुड़ी होती है. अत: पशु के बाहर निकले हुए अंगों को जब शरीर के अंदर किया जाता है तो उसके बाद पशु अधिक मात्रा में पेशाब करता है।
पशु सुस्त हो जाते हैं और खाना-पीना छोड़ देते हैं। गर्भाशय ग्रीवा की सील टूटने से गर्भपात हो सकता है। समय पर इलाज ना करने से अंगों में संक्रमण होकर यह पशु के खून में भी फैल सकता है जिससे पशु की मौत भी हो सकती है। ये भी पढ़ें: गाभिन भैंस की इस तरह करें देखभाल, नहीं होगा घाटा फूल दिखाने या गर्भाशय का बाहर आ जाना (प्रोलैप्स ऑफ यूट्रस) कई बार गाय व भैंसों में प्रसव के 4-6 घंटे के अंदर गर्भाशय बाहर निकल आता है, जिसका उचित समय पर उपचार न होने पर स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कष्ट प्रसव के बाद गर्भाशय के बाहर निकलने की संभावना अधिक रहती है। इसमें गर्भाशय उल्टा होकर योनि से बाहर आ जाता हैं और पशु इसमें प्राय: बैठ जाता है।
गर्भाशय और अंदर के अन्य अंगों को बाहर निकलने की कोशिश में पशु जोर लगाता रहता है जिससे कई बार गुद्दा भी बहार आ जाता है और स्थिति और गम्भीर हो जाती है। फूल दिखाने या गर्भाशय के बाहर निकलने के मुख्य कारण भोजन में सूखे चारे की अधिक मात्रा- पशुओं के भोजन में सूखे चारे जैसे गेहूं का भूसा, की अधिक मात्रा भी फूल दिखाने की समस्या के लिए जिम्मेदार कारक है। क्योंकि इससे पशु गोबर करते वक्त अधिक जोर लगाता है जिससे योनि और गर्भाशय ग्रीवा के पिछले हिस्से का बाहर निकलने का खतरा बढ़ जाता है। कैल्शियम की कमी- पशुओं के आहार में कैल्शियम का निम्न स्तर भी फूल दिखाने के समस्या से जुड़ा हुआ है, क्योंकि कैल्शियम का निम्न स्तर गर्भवती पशुओं में प्रजनन अंगों के ढीला होने के लिए जिम्मेदार होता है। जब गाभिन पशु गोबर या पेशाब करने के लिए जोर लगाता है तो उसके साथ ही योनि और गर्भाशय ग्रीवा का पिछला हिस्सा शरीर से बाहर आ जाता है।
वसा का अत्यधिक जमाव- भैंसों की कोख़ में भी वसा /चर्बी के अत्यधिक जमा होने की वजह से योनि के आस-पास दबाव बढ़ जाता है, जिससे फूल दिखाने की समस्या ज्यादा होती है। एस्ट्रोजेन का उच्च स्तर- गर्भावस्था के छह महीने के बाद भैंसों में फूल दिखाने की संभावना अधिक होती है। गर्भावस्था के अंतिम समय में एस्ट्रोजेन के उच्च स्तर को भैंसों में फूल दिखाने का एक कारण माना जाता है। एस्ट्रोजेन का यह बढ़ा स्तर पुठे और योनिद्वार के ढीला होने के लिए जिम्मेदार होता है जिससे योनि और गर्भाशय ग्रीवा का पिछला हिस्सा शरीर से बाहर आ जाता है। पशुओं को खिलाये जाने वाले कुछ हरे-चारे जैसे कि बरसीम, सड़े हुए जौ और मक्का इत्यादि में भी एस्ट्रोजेन का अधिक स्तर पाया जाता है तथा गर्भावस्था के अंतिम दिनों में इनके अधिक खिलाने से पशुओं में फूल दिखाने का डर बना रहता है। कष्ट प्रसव जिसके उपचार के लिए बच्चे को खींचना पड़ता है प्रसव से पूर्व योनि का बाहर आना जेर का गर्भाशय से बाहर न निकलना उपचार व रोकथाम:- जैसे ही पशु में गर्भाशय के बाहर निकलने का पता चले उसे दूसरे पशुओं से अलग कर देना चाहिए ताकि बाहर निकले अंग को दूसरे पशुओं से नुकसान न हो। बाहर निकले अंग को गीले तौलिए या चादर से ढक देना चाहिए और यदि संभव हो तो बाहर निकले अंग को योनि के लेवल से थोड़ा ऊंचा रखना चाहिए ताकि बाहर निकले अंग में खून इकट्ठा न हो। बाहर निकले अंग को अप्रशिक्षित व्यक्ति से अंदर नहीं करवाना चाहिए बल्कि उपचार के लिए शीघ्रातिशीघ्र पशु चिकित्सक को बुलाना चाहिए। यदि पशु में कैल्शियम की कमी है तो कैल्शियम सुबह और शाम में नियमित रूप से दिया जाता है। बाहर निकले अंग को गर्म पानी या फिर सेलाइन के पानी से ठीक प्रकार साफ कर लिया जाता है। यदि ग्र्भाह्य के साथ जेर भी लगी हुई है तो उसे जबरदस्ती निकलने की आवश्यकता नहीं होती। हथेली के साथ सावधानी पूर्वक गर्भाशय को अंदर किया जाता है और उसे अपने स्थान पर रखने के उपरांत योनि द्वार में टांके लगा दिए जाते हैं। इस बीमारी में यदि पशु का ठीक प्रकार से इलाज न करवाया जाए टो पशु स्थायी बांझपन का शिकार हो सकता है। अत: पशु पालक को इस बारे में कभी ढील नहीं बरतनी चाहिए। गर्भावस्था में पशु की उचित देख भाल करने तथा उसे अच्छे किस्म के खनिज मिश्रण से साथ सन्तुलित आहार देने से इस बीमारी की सम्भावना को कम किया जा सकता है।पशुओं को कैल्शियम तथा विटामिन ई व सेलेनियम देने से भी लाभ हो सकता है। कैसे करें बचाव? गाय/भैंस को साफ-सुथरी जगह बांधें, जिससे निकले हुए भाग पर भूसा व गंदगी न लग सके। कुत्ते और कौवे ऐसे स्थान पर न जा सकें। अन्य पशु भी उससे दूर रहें। भैंस को ऐसी जगह बांधें, जो आगे से नीचा तथा पीछे से 2-6 इंच ऊंचा हो। इससे पेट का वजन बच्चेदानी/ योनि पर दवाब नहीं डाल पाता है। भैंस को सूखा चारा (तूड़ी/भूसा) न खिलाएं। हरा चारा होना चाहिए और दाने में चोकर व दलिया प्रयोग करें। प्रसव तक चारे की मात्रा थोड़ी कम ही रखें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भैंस को कब्ज न होने पाए व गोबर पतला ही रहे। भैंस के आहार में रोजाना 50-70 ग्राम कैल्शियम युक्त खनिज लवण मिश्रण अवश्य मिलायें। ये खनिज मिश्रण दवा विक्रेता के यहां अनेक नामों (एग्रीमिन, मिनीमिन, मिल्कमिन इत्यादि) से मिलते हैं। खनिज लवण मिश्रण पर ISI मार्क लिखा होना चाहिये। शरीर निकलने पर योनि को साफ व ठण्डे पानी से धोएं, जिससे उस पर भूसा व मिट्टी न लगी रहे। पानी में लाल दवाई डाल सकते हैं। पानी में ऐसी कोई दवा न डालें जिससे योनि में जलन होने लगे। नाखून काटकर साफ हाथों से योनि को अंदर धकेल दें तथा नर्म रस्सी की ऐंड़ी बाँध दें। ऐंडी बांधते समय यह ध्यान रखें कि यह अधिक कसी न हो तथा पेशाब करने के लिए 3-4 अंगुलियों जितनी जगह रहे। रोग की प्रारंभिक अवस्था में आयुर्वेदिक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है (प्रोलेप्स-इन, कैटिल रिमेडीज अथवा प्रोलेप्स-क्योर) । इसके अतिरिक्त, होम्योपैथिक दवाई (सीपिया 200X की 10 बूँदें रोजाना) पिलाने से भी लाभ मिल सकता है। गंभीर स्थिति होने पर पशुचिकित्सक से सम्पर्क करें। पशुचिकित्सक इस स्थिति में दर्दनाशक व संवेदनाहरण के लिए टीका लगाते हैं। जिससे पशु जोर लगाना बंद कर देता है। अब शरीर के बाहर निकले हुए भाग को साफ कर तथा अंदर करके टाँके लगा देते हैं। इसके बाद भैंस को कैल्शियम की बोतल, आधी रक्त में तथा आधी त्वचा के नीचे लगा देते हैं। कभी-कभी प्रोजेस्ट्रोन का टीका भी भैंस को लगा दिया जाता है। परन्तु इसमें यह सावधानी रखी जाती है कि बच्चा देने में अभी 10 दिन से ज्यादा बचे हों। योनि के उपर लगे टाँकों को बच्चा देने के समय खोल दिया जाता है। प्रसवकालीन अपभ्रंश (फूल दिखना) सभी अपभ्रंश में (फूल दिखने) यह सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है। समय पर उपचार न होने के कारण भैंस मर सकती है। यह बच्चा जनने के तुरन्त बाद या 4-6 घंटे के अंदर हो जाता है। बड़े आकार के अथवा विकृत बच्चे को जबरदस्ती जनन नलिका से बाहर खींचने के कारण प्रसव के बाद गर्भाशय बाहर आ जाता है। ब्याने के बाद जेर को जबरन खींचने से भी अपभ्रंश की सम्भावना रहती है। इसमें भैंस बैठी रहती है तथा गर्भाशय के लटके भाग पर लड्डू जैसी संरचनाएं स्पष्ट नजर आती है। इन पर जेर भी चिपकी हो सकती है। थोड़ा सा छेड़ने पर इनमें से खून भी निकलने लगता है। उपचार:- भैंस को अलग बांध कर रखें। गर्भाशय को लाल दवा युक्त ठण्डे/बर्फीले पानी से धोकर, एक गीले तौलिए से ढक दें ताकि गर्भाशय सूखने न पाये तथा उस पर मक्खियाँ न बैठें एवम् भूसा व गोबर भी न चिपके। इसके बाद तुरन्त पशुचिकित्सक से सम्पर्क करें। पशुचिकित्सक गर्भाशय को साफ करके, जेर निकालकर गर्भाशय को उचित विधि द्वारा अंदर कर देते हैं तथा योनि पर टाँकें लगा देते हैं ताकि गर्भाशय पुन: बाहर न निकले। इसके बाद भैंस को कैल्शियम, ऑक्सिटोसिन व एंटीबायोटिक दवाइयाँ आवश्यकतानुसार लगाई जाती हैं। प्रसवोपरांत अपभ्रंश:- यह मुख्य रूप से बच्चा देने के कुछ दिनों बाद शुरू होता है। इसका मुख्य कारण जनन नलिका में कोर्इ घाव या संक्रमण होता है। यह घाव व संक्रमण प्रसूति के समय गलत तरीके से बच्चा निकालने से, अथवा गंदे हाथों से जेर निकालने से हो जाता है। योनि से अक्सर बदबूदार मवाद निकलता है तथा भैंस अक्सर पीछे की ओर जोर लगाती है। उपचार :- उपचार के लिए तत्काल पशुचिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिए। पशुचिकित्सक गर्भाशय व योनि को साफ करके उसमें एंटीबायोटिक गोलियाँ/द्रव रख देते हैं। संक्रमण समाप्त होने तक इलाज करवाना चाहिए। कैल्शियम आदि के टीके भी आवश्यकतानुसार लगाये जा सकते हैं। सावधानियाँ एवम् रोकथाम :- योनि अपभ्रंश अक्सर वंशानुगत देखने को मिलता है। अत: प्रजनन में सावधानी बरतें। भैंस को 40-50ग्राम कैल्शियम युक्त खनिज लवण मिश्रण नियमित रूप से खिलायें। गर्भाशय में बच्चा फंसने पर उसे जबरदस्ती अथवा गलत विधि द्वारा न निकालें/निकलवाएं। जेर निकलवाने के लिए अधिक जोर न लगाया जाए। शरीर के निकले भाग की सफाई का विशेष ध्यान रखें। उसे जूती द्वारा कभी अन्दर न करें। अपभ्रंश होने पर शीघ्र पशुचिकित्सक की सलाह लें। फूल दिखाने में देशी हर्बल दवाइयां:- इस बीमारी में कई देशी हर्बल दवाइयां काफी फायदेमंद हैं लेकिन अधिक प्रोलेप्स वाले पशुओं को सप्ताह में एक बार कैल्शियम जरूर चढवाएं। अगर पशु अधिक जोर लगा रहा है तो एपीडयूरेल एनेस्थिसिया दिया जा सकता है। इसके अतिरिक्त एंटीबायोटिक, एंटीइंफ्लेमेटरी से उपचार इंजेक्शन लगवाए जा सकते हैं। पशु को ऐसे स्थान पर बांधे कि जिससे कि पीछे का हिस्सा उपर रहे। रात के समय पशु को भरपेट चारा दें। 24 घंटे निगरानी में रखें। फूल दिखाए तो ठंडे पानी में लाल दवाई या लाल पोटास से साफ कर चढ़ाए। पशु को 100 ग्राम गुड, 150 मिली लीटर कैल्सियम, 50 ग्राम लहसुन, 50 ग्राम हल्दी पाउडर, 100 ग्राम प्याज़, 200 ग्राम एसबगोल का पाउडर तथा 50 ग्राम काला नमक के साथ पेस्ट बनाकर 250 ग्राम बेसन 150 ग्राम सरसों के तेल मे मिलकर रोज खिलाये कम से कम 7 दिन तथा ईसको पुनः रिपिट करे अगले महीने मे। इससे इस समस्या का समाधान जल्दी मिलने लगता है । इसके साथ साथ पशुचिकित्सक के सलाह से 15 दिन के अंतराल पे 10 एमएल फोस्फोरोस, 10 एमएल नेऊरोक्सीन 12, तथा 20 एमएल कैल्सियम का इंजेक्टीओन (लगातार 3 दिन) लगवाए।
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