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भ्रूणीय विकास
नर व मादा युग्मक मिलकर युग्मनजों का निर्माण करते हैं। युग्मनज समसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होकर विकास करते हुए एक संरचना का रूप लेते हैं, इस संरचना को ही भ्रूण कहते हैं।
गर्भ धारण करने के लगभग 2 महीने या 8-9 हफ्ते तक गर्भाशय में शिशु जिस रूप में होता है, वह रूप ही भ्रूण कहलाता है।
युग्मनज में समय के साथ-साथ परिवर्तन आते-आते विकास होता रहता हैं तथा विकासशील अवस्था जारी रहती है, इसे ही भ्रूणीय विकास कहते हैं।
मादा शरीर के गर्भाशय में भ्रूण विकास होता है। भ्रूण रोपित होने से लेकर एक शिशु के रूप में गर्भ से बाहर आने तक का पूरा काल लगभग 280 दिन का होता है। जैसे-जैसे भ्रूण विकसित होता है; वैसे-वैसे गर्भाशय का आकार बड़ा होता जाता है।
गर्भधारण करने के शुरुआती दिनों में भ्रूण एक थैली जैसी आकृति में रहता है। इसमें एक खास तरह का तरल पदार्थ होता है।
प्रथम माह- इसमें शिशु के हाथ-पैर व पीठ के हल्के आकार उभरते हैं। आँख, नाक, कान की भी छोटी-छोटी संरचनाएं बननी शुरु हो जाती है। चौथे हफ्ते में भ्रूण में बन रहे शिशु द्वारा ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है।
दूसरा माह- इसके प्रारम्भ में ही शिशु के मस्तिष्क का निर्माण होना आरम्भ होता है। इसी के साथ गर्भनाल भी विकसित होती रहती है। पाँचवे हफ्ते तक भ्रूण में एंडोडर्म, मिसोडर्म व एक्टोडर्म का निर्माण होता है। छठे हफ्ते में हृदय व धड़कन बनती है व भिन्न-भिन्न शारीरिक अंगों के निर्माण की प्रक्रिया का प्रारम्भ होता है।
तीसरा माह- इसमें भ्रूणीय विकास में शिशु का मुख व आँखे स्पष्ट रूप में बन जाती हैं। आंतरिक अंगो का निर्माण व विकास होता है
तथा भ्रूण विकास क्रिया निरन्तर चलती है। बाहरवें हफ्ते में हाथ-पैर की उंगलियों व अंगूठों का निर्माण शुरू होता है।
चौथा व पांचवा माह- इसमें शिशु के सिर व पलकों के हल्के-हल्के बाल आने लगते हैं। चौदहवें हफ्ते में जनन अंगो का निर्माण हो जाता है व लम्बाई बढ़ती है। गर्भाशय का आकार बढ़ता है। मसूड़े व दाँत बनने लगते है। पांचवे माह में शिशु क्रिया करने लगता है तथा स्त्री को भी गर्भ में हो रही क्रियाओं का अनुभव होता है।
छठा व सातवां माह- इसमें शिशु और विकसित हो जाता है। इसमें शिशु हाथ-पैर चलाना शुरू कर देता है। इस दौरान गर्भस्थ शिशु को हिचकियां आना भी सामान्य बात है। सातवें हफ्ते के मध्य तक शिशु की थोड़ी-थोड़ी पलकें खुलना प्रारम्भ होती हैं।
आठवां माह- इसमें शिशु के शरीर में ओर विकास होने लगता है, बड़ा होने लगता है तथा वजन बढ़ता है। सभी बाह्य व आंतरिक अंग पूर्ण रूप से निर्मित हो चुके होते हैं। शिशु के ऊपरी हिस्से में स्थिरता आती है।
नौवां माह- इसमें यह पूर्ण रूप से विकसित हो चुका होता है तथा एक निश्चित अवधि के बाद प्रसव द्वारा गर्भाशय से बाहर आता है।
भ्रूण के विकास के भी भिन्न-भिन्न चरण होते है। नर व मादा (शुक्राणु व अण्डाणु) युग्मकों के निर्माण से साथ यह प्रारंभ होती है।
यौन सम्बन्ध बनाने के दौरान जब नर द्वारा अपने वीर्य का स्रवण मादा की योनि मार्ग में कर दिया जाता है, तब इनके मिलने से युग्मनजों का निर्माण होता है अर्थात् निषेचन हो जाता है।
इसके बाद मादा में गोल संरचनाओं का निर्माण होता है, जिन्हें कोरकपुटिका कहा जाता है। यह संम्पूर्ण क्रिया विदलन कहलाती है।
ये संरचनाएं मादा के भीतर गर्भाशय की सतह पर स्थित हो जाती है, इसी से भ्रूण रोपित होता है।
भ्रूण के बनने के साथ ही गर्भाशय में अपरा (आंवल) का निर्माण होता है। अपरा के द्वारा ही भ्रूण के विकास हेतु रुधिरवाहिनियों से रुधिर गमन होता है।
शिशु के बाहर आते ही मादा के शरीर की दूध देने वाली ग्रन्थियों से दूध वाहित होना भी आरम्भ हो जाता है।
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