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गर्भावस्था के दौरान डाउन सिंड्रोम टेस्ट पॉजिटिव आने पर क्या होता है?

एक सकारात्मक स्क्रीनिंग टेस्ट परिणाम का मतलब है कि आपके बच्चे के डाउन सिंड्रोम होने की संभावना औसत से अधिक है । आपके परीक्षण के परिणामों में एक संख्या शामिल हो सकती है जो बताती है कि जोखिम कितना अधिक है। लेकिन अधिक जोखिम का मतलब यह नहीं है कि आपके शिशु को डाउन सिंड्रोम होगा।

डाउंस सिंड्रोम के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट

डाउंस सिंड्रोम क्या है?
हमारे शरीर की कोशिकाओं में आनुवांशिक पदार्थ (जेनेटिक मैटिरियल) गुणसूत्र (क्रोमोसोम) नामक गट्ठों (बंडल) में पैक होते हैं।

डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त लोगों में एक अतिरिक्त गुणसूत्र होता है, और यह शरीर के हर हिस्से को प्रभावित करता है। डाउंस सिंड्रोम गर्भधारण के समय होता है, जब डिंब और वीर्य के आनुवांशिक बंडल आपस में मिलते हैं। इस स्थिति को ट्राइसमी 21 के नाम से भी जाना जाता है।

यह साफ नहीं है कि ऐसा किस कारण से होता है, मगर यह किसी के भी साथ हो सकता है।

किसी भी उम्र की महिला डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु को जन्म दे सकती है, हालांकि ज्यादा उम्र की महिलाओं में डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु को जन्म देने की आशंका ज्यादा होती है।

डाउंस सिंड्रोम होने से पढ़ने-लिखने और सीखने से जुड़ी परेशानियां उत्पन्न होती हैं। ये परेशानियां हल्की से लेकर गंभीर तक हो सकती हैं। इसके अलावा डाउंस सिंड्रोम को बहुत सी अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के साथ भी जोड़ा जाता है, इनमें से कुछ गंभीर भी हो सकती हैं। हालांकि, चुनौतियों के बावजूद, बहुत से लोग इस स्थिति के साथ भी लंबी, अच्छी और भरपूर जिंदगी जीते हैं।

भारत में 800 से 1000 शिशुओं में से करीब एक शिशु डाउंस सिंड्रोम के सा​थ पैदा होता है। डाउंस सिंड्रोम के बारे में हमारे इस लेख में और जानें।
डाउंस सिंड्रोम की जांच क्यों जरुरी है?
डाउंस सिंड्रोम सबसे आम गुणसूत्रीय असामान्यता है और इसका परिवार पर बहुत गहरा असर हो सकता है। इसलिए बेहतर यही है कि हर गर्भवती महिला, खासकर कि 35 साल से अधिक उम्र की महिलाएं अपना स्क्रीनिंग टेस्ट अवश्य कराएं।

अधिक उम्र की महिलाओं में कम उम्र की महिलाओं की तुलना में डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु को जन्म देने की संभावना ज्यादा होती है।

हालांकि, स्क्रीनिंग जांच कराने की बाध्यता को लेकर कोई कानून नहीं है, मगर अधिकांश डॉक्टर सभी प्रेग्नेंट महिलाओं को स्क्रीनिंग जांच कराने की सलाह देते हैं। यद्यपि अधिक उम्र की महिलाओं को डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु होने का खतरा ज्यादा होता है, मगर महिलाएं उम्र ढलने से पहले ही शिशुओं को जन्म देती हैं। इसलिए अधिकांश डाउंस सिंड्रोम वाले शिशु कम उम्र की माँओं के होते हैं।

स्क्रीनिंग से परिवारों को यह निर्णय लेने में मदद मिलती है कि वे आगे क्या करना चाहते हैं। इससे डॉक्टरों को भी यह फैसला लेने में मदद मिलती है कि सीवीएस या एमनियोसेंटेसिस जैसे डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाने की जरुरत है या नहीं।
डाउंस सिंड्रोम का पता लगाने के लिए गर्भावस्था में कौन सी जांचें की जाती है?
डाउंस सिंड्रोम के लिए दो चरणों में टेस्ट कराए जाते हैं:

स्क्रीनिंग टेस्ट आमतौर पर सभी महिलाओं को कराने होते हैं। इन जांचों से कोई निश्चित जवाब नहीं मिल पता। इनसे केवल यह पता चलता है कि आपके शिशु को डाउंस सिंड्रोम होने की संभावना ज्यादा है या नहीं। स्क्रीनिंग जांचों से गर्भपात होने का खतरा नहीं होता।

डायग्नोस्टिक टेस्ट उन महिलाओं को कराना होता है जिनके स्क्रीनिंग टेस्ट में शिशु को डाउंस सिंड्रोम होने की उच्च संभावना बताई जाती है। डायग्नोस्टिक टेस्ट यानि कोरियोनिक विलस सेम्पलिंग (सीवीएस) और एमनियोसेंटेसिस से आमतौर पर आपको सटीक उत्तर मिल जाता है। दुर्भाग्यवश डायग्नोस्टिक जांचों से गर्भपात होने का खतरा रहता है।


भारत में विभिन्न अस्पतालों में अलग-अलग स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध हैं। कुछ टेस्ट 13 सप्ताह की गर्भावस्था में कराए जाते हैं, वहीं कुछ बाद में 20 सप्ताह की प्रेग्नेंसी तक कराए जाते हैं।

स्क्रीनिंग टेस्ट में शामिल हैं:

अल्ट्रासाउंड स्कैन
खून की जांच
अल्ट्रासाउंड स्कैन और खून की जांच दोनों कराना

टेस्ट से यह पक्का पता नहीं चलता कि आपके शिशु को डाउंस सिंड्रोम है या नहीं। ये केवल इतना बताते हैं कि आपके शिशु को डाउंस सिंड्रोम होने का कितना ज्यादा खतरा है।

टेस्ट के परिणाम आमतौर पर 'स्क्रीन पॉजिटिव' या 'स्क्रीन नेगेटिव' के तौर पर बताए जाते हैं। आमतौर पर 350 में से एक कट-ऑफ प्वाइंट इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपका खतरा 350 में से एक से भी कम है, तो आपका परिणाम 'स्क्रीन नेगेटिव' बताया जाएगा। इसका मतलब है कि आपके शिशु में डाउंस सिंड्रोम होने का खतरा बहुत ही कम है, मगर थोड़ी बहुत संभावना फिर भी हो सकती है।

स्क्रीनिंग जांचें 100 फीसदी विश्वसनीय नहीं होती हैं। कई बार गलत ढंग से शिशुओं में डाउंस का बहुत कम खतरा बताया जाता है, मगर बाद में उनका जन्म डाउंस सिंड्रोम के साथ होता है।

पहली तिमाही की स्क्रीनिंग
11 से 13 हफ्तों की गर्भावस्था के बीच, एक विशेष अल्ट्रासाउंड स्कैन कराया जा सकता है, जिसे न्यूकल ट्रांसल्यूसेंसी (एनटी) स्कैन कहा जाता है। इस स्कैन में मापा जाता है कि गर्भस्थ शिशु की गर्दन के पीछे की तरफ त्वचा के नीचे कितना तरल है। इससे डाउंस सिंड्रोम के खतरे का पता लगाया जा सकता है।

इसके अलावा एक खून की जांच भी होती है, जिसे डबल मार्कर कहा जाता है। इस जांच में एचसीजी (hCG, ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रॉफिन) और पैप-ए (PAPP-A, प्रेग्नेंसी एसोसिएटेड प्लाज्मा प्रोटीन) के स्तरों को मापा जाता है।

अगर किसी महिला के गर्भ में डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु पल रहा हो, तो उसके खून में एचसीजी और पैप-ए दोनों का असामान्य स्तर पाया जाएगा।

ये टेस्ट कितने सही हैं, इस बात को लेकर काफी विवाद है, मगर ये काफी सटीक प्रतीत होते हैं। हालांकि, एनटी स्कैन की सटीकता कई बातों पर निर्भर करती है, जिनमें स्कैन करने वाले डॉक्टर की कुशलता और स्कैनिंग मशीन की गुणवत्ता भी शामिल है।

बहरहाल, पहली तिमाही में जांच करवा लेने के कई फायदे हैं, क्योंकि इसमें डाउंस सिंड्रोम का पता चलने की दर काफी अच्छी होती है।

अगर आपकी रिपोर्ट डाउंस सिंड्रोम होने का उच्च जोखिम दर्शाती है, तो आपके पास आगे क्या करना है, इस बारे मे सोच-विचार करने का पर्याप्त समय होगा। आपके पास उपलब्ध विकल्पों में थोड़ा और इंतजार करना या फिर कोरियोनिक विलस सैम्पलिंग (सीवीएस) या एमनियोसेंटेसिस जैसे डायग्नोस्टिक टेस्ट कराना शामिल होते हैं, ताकि डाउंस होने का पता निश्चित तौर पर चल सके।

अगर आप स्क्रीनिंग टेस्ट के तुरंत बाद ये डायग्नोस्टिक टेस्ट कराती हैं, और अपनी गर्भावस्था अपनी गर्भावस्था जारी न रखने करने का विकल्प चुनती हैं, तो शायद आप सक्शन टर्मिनेशन करवा पाएं। यह मेडिकल टर्मिनेशन की तुलना में कम जटिल होता है। मेडिकल टर्मिनेशन में दवा के जरिये छोटे स्तर का प्रसव मिनी लेबर प्रेरित किया जाता है। सक्शन टर्मिनेशन का इस्तेमाल केवल 12 से 14 हफ्ते की गर्भावस्था के दौरान किया जा सकता है।

पहली तिमाही की स्क्रीनिंग का एक दोष यह है कि इनकी कीमत ज्यादा होती है और साथ ही ये केवल चुनिंदा केंद्रों और शहरों में उपलब्ध होते हैं।

नॉन इनवेसिव प्रीनेटल टेस्टिंग (एनआईपीटी)
एनआईपीटी एक अतिरिक्त स्क्रीनिंग टैस्ट है जो शिशु में डाउंस सिंड्रोम, एडवर्ड्स​ सिंड्रोम और पटाऊ सिंड्रोम होने के खतरे के बारे में बताता है।

अन्य स्क्रीनिंग जांचों जैसे कि संयुक्त जांच की तुलना में एनआईपीटी अधिक सटीक है और गर्भावस्था में काफी पहले (करीब 9 से 10 हफ्ते में) कराया जा सकता है। साथ ही, इसमें गर्भपात का खतरा भी नहीं होता।

एनआईपीटी के दौरान आपकी बाजू से थोड़ा रक्त का नमूना लिया जाता है। आपके खून में शिशु के डीएनए के अंश होते हैं। इन अंशों का संभावित गुणसूत्रीय असामान्यताओं के लिए परीक्षण किया जाता है। इसके परिणाम आपको शायद करीब तीन हफ्तों में मिल जाते हैं।

यदि परिणाम में पता चले कि शिशु में गुणसूत्रीय असामान्य होने का खतरा ज्यादा है, तो आपको डायग्नोस्टिक टेस्ट जैसे कोरियोनिक विलस सेम्पलिंग (सीवीएस) या एमनियोसेंटेसिस करवाने होंगे।

जिनकी संयुक्त जांच में उच्च-जोखिम परिणाम आया हो, उनमें से कुछ माता-पिता डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाने से पहले एनआईपीटी करवाते हैं। यदि एनआईपीटी में नेगेटिव परिणाम हो, तो कुछ माता-पिता डायग्नोस्टिक टेस्ट न करवाने का निर्णय लेते हैं। इस अतिरिक्त कदम से आपको डायग्नोस्टिक जांचें करवाने से बच सकते हैं, जिनकी आपको जरुरत नहीं होती।

हालांकि, यदि एनआईपीटी में उच्च जोखिम का परिणाम आता है, तो इस बात की संभावना रहती है कि डायग्नोस्टिक टेस्ट का परिणाम भी पॉजिटिव होगा।

ध्यान रखें कि एनआईपीटी काफी महंगा टेस्ट होता है और केवल चुनिंदा शहरों और केंद्रों में उपलब्ध होता है। साथ ही, हो सकता है यह केवल उन गर्भवती महिलाओं को कराया जाए, जिन्हें अतिरिक्त जोखिम हो। अपने लिए सबसे उचित विकल्प के बारे में डॉक्टर से बात करें।

दूसरी तिमाही की स्क्रीनिंग
दूसरी तिमाही की स्क्रीनिंग 16 से 17 हफ्तों की गर्भावस्था के बीच कराई जाने वाली खून की जांचों पर आधारित होती है। यह टेस्ट आपके खून में विभिन्न मार्कर्स को मापता है:

बी-एचसीजी (b-hCG, बीटा सबयुनिट ऑफ ह्यूमन कोरियोनिक गोनाडोट्रॉफिन)
एएफपी (AFP, सिरम एल्फा फीटोप्रोटीन)
यूईएसटी (uEst, अनकंजुगेटेड एस्ट्रिऑल)
इन्हिबिन ए

अगर आपके गर्भ में डाउंस सिंड्रोम में ग्रस्त शिशु पल रहा है, तो आपके खून में एचसीजी का स्तर ज्यादा होगा और एएफपी और यूईएसटी का स्तर कम होगा।

भारत में इस टेस्ट के विभिन्न रूप उपलब्ध हैं:

ट्रिपल टेस्ट: इसमें तीन मार्कर्स को मापा जाता है - एचसीजी, एएफपी और यूई3
क्वाड्रपल टेस्ट: इसमें चार मार्कर्स को मापा जाता है - एचसीजी, एएफपी, यूई3 और इन्हिबिन ए

ट्रिपल स्क्रीनिंग के परिणाम आमतौर पर एक या दो हफ्ते में आ जाते हैं। अगर परिणाम पॉजिटिव हो, तो फिर आगे सामान्यत: एम्नियोसेंटेसिस टेस्ट (गर्भाशय के अंदर के तरल की जांच) आदि किए जाते हैं। इन टेस्ट से निर्णयात्मक रूप से डाउंस सिंड्रोम होने की पुष्टि हो जाती है।

दूसरी तिमाही में जांच के फायदे:

आमतौर पर खून के नमूने लेना आसान होता है
अधिकांश लैबोरेटरीज में यह खून का परीक्षण हो सकता है

दूसरी तिमाही में जांच करवाने के अवगुण:

ये जांचें डाउंस सिंड्रोम का पता लगाने में इतनी सटीक नहीं हैं, जितनी की पहली तिमाही की जांचें।

जब तक आपको इन जांचों के परिणाम मिलते हैं, तब तक आप अपनी गर्भावस्था में काफी आगे बढ़ चुकी होंगी। अगर आपका डाउंस सिंड्रोम का जोखिम ज्यादा हुआ, तो आपको निर्णय लेना होगा कि डाउंस की पुष्टि के लिए आप एम्नियोसेंटेसिस टेस्ट करवाना चाहती हैं या नहीं। अगर, इस टेस्ट में भी शिशु में डाउंस सिंड्रोम होने की पुष्टि होती है, तो आपको गर्भावस्था समाप्त करने के बारे में फैसला लेना होगा। गर्भावस्था के इस चरण में गर्भपात करवाना आपके लिए बड़े मानसिक आघात जैसा हो सकता है।


पहली और दूसरी तिमाही की संयुक्त स्क्रीनिंग

सिरम इंटीग्रेटेड टेस्ट में पहली तिमाही की खून की जांच पैप-ए को आगे दूसरी तिमाही की खून की जांच एचसीजी, एएफपी, यूईएसटी और इन्हिबिन ए के साथ जोड़ा जाता है।

इंटीग्रेटेड टेस्ट में पहली तिमाही की न्यूकल ट्रांसल्यूसेंटी स्कैनिंग और पैप-ए रक्त परीक्षण को आगे दूसरी तिमाही में एचसीजी, एएफपी, यूईएसटी और इन्हिबिन ए के साथ जोड़ा जाता है। विशेषज्ञ इंटीग्रेटेड टेस्ट को डाउंस सिंड्रोम का पता लगाने का सबसे प्रभावी तरीका मानते हैं।


बहरहाल, संभव है कि ये टेस्ट हर नर्सिंग होम या अस्पताल में उपलब्ध न हों। अगर ये टेस्ट न हो सकते हों, तो डॉक्टर आपको अन्य स्क्रीनिंग टेस्ट करवाने के लिए कह सकती हैं, जैसे कि न्यूकल ट्रांसल्यूसेंसी स्कैन, जो कि काफी आम हैं।
अगर जांच में शिशु को डाउंस सिंड्रोम होने के उच्च जोखिम का पता चले तो क्या होगा?
अधिकांश डॉक्टर पहली तिमाही और दूसरी तिमाही की स्क्रीनिंग करवाने की सलाह देती हैं।

अगर, आपकी जांच में डाउंस सिंड्रोम के उच्च जोखिम का पता चले, तो डॉक्टर आपको सीवीएस या एम्नियोसेंटेसिस जैसे डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाने के लिए कह सकती हैं। दुर्भाग्यवश, डायग्नोस्टिक टेस्ट करवाने में गर्भपात होने का खतरा रहता है। इसलिए आपको इनके बारे में फैसला लेने में थोड़ा समय लग सकता है।

अगर आपकी दूसरी तिमाही की जांचों में भी उच्च जोखिम की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर आपके साथ डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु होने के फायदे व नुकसान के बारे में चर्चा करेंगी। कुछ डॉक्टर जेनेटिक काउंसलर से सलाह लेने के लिए भी कह सकती हैं।

इसके बाद यह आपके और आपके परिवार पर निर्भर करता है कि आप इस गर्भावस्था को जारी रखना चाहती हैं या फिर गर्भपात करवाने का निर्णय लेती हैं। निर्णय लेने से पहले आप इसके बारे में जितने चाहे सवाल कर सकती हैं और इसपर विचार कर सकती हैं। आपका निर्णय चाहे कुछ भी हो, मगर डॉक्टर आपके हर निर्णय में आपका साथ देंगी।

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