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प्रेगनेंट अमृता राव को रोज भागवत गीता सुनाते थे उनके पति, जानिए प्रेग्नेंसी में गीता सुनने के फायदे
गर्भावस्था में भागवत गीता सुनने से मां और बच्चे के बीच बहुत गहरा भावनात्मक संबंध बनता है। जानिए प्रेग्नेंसी में भागवत गीता सुनने के अन्य फायदे।
प्रेगनेंट अमृता राव को रोज भागवत गीता सुनाते थे उनके पति, जानिए प्रेग्नेंसी में गीता सुनने के फायदे
एक्ट्रेस अमृता राव (Amrita Rao) ने अपनी प्रेग्नेंसी को काफी इंजाॅय किया था। इसकी वजह थे, उनके पति आरजे अनमोल। वह अपनी पत्नी को प्रेग्नेंसी के दौरान भागवत गीता सुनाया करते थे और कभी-कभी उनके लिए गुनगुनाया भी करते थे।
इसका सकारात्मक असर सिर्फ अमृता पर ही नहीं बल्कि उनके बच्चे पर भी पड़ा। पिछले साल नवंबर माह में अमृता ने बहुत ही प्यारे से बेटे को जन्म दिया। उसके खिलखिलाते चेहरे को देखकर यकीन हो गया है कि भागवत गीता सुनने का ही नतीजा है कि बच्चा इतना स्वस्थ और हंसमुख है।
एक्ट्रेस अमृता राव की ही तरह हर गर्भवती महिला को भाागवत गीता सुनना चाहिए। मां और बच्चे को कई आश्चर्यजनक फायदे मिलते हैं।
क्या है मान्यता
भागवत गीता सुनने से मन खुश रहता है, विचार सकारात्मक होते हैं। अमृता राव मानती हैं कि गर्भावस्था के दौरान भागवत सुनने के कारण उनके बच्चे का विकास बहुत अच्छी तरह से हुआ।
वैसे भी भागवत गीता न सिर्फ जीवन के दार्शनिक पहलुओं के बारे में बताती है बल्कि यह व्यवहारिक जीवन जीने में भी मदद करती है।
कब शुरू करें भागवत गीता सुनना
अमृता को अनमोल ने गर्भावस्था के कुछ समय के बाद से ही भागवत गीता पाठ करके सुनाना शुरू किया था। यह एक तरह से गर्भ संस्कार का हिस्सा है, जो कि हर महिला को अपनाना चाहिए। वैसे गर्भ संस्कार का मतलब सिर्फ इतना ही नहीं होता है। गर्भ संस्कार प्रेग्नेंसी से काफी पहले शुरू हो जाता है।
गर्भ संस्कार का समय काल गर्भावस्था से पहले, गर्भावस्था के दौरान और बच्चे की डिलीवरी के बाद 2 साल बाद तक जारी रहता है।
हालांकि, महिलाओं के लिए यह जानना संभव नहीं है कि वह किस समय गर्भधारण करेगी, लेकिन यदि प्लानिंग कर रही हैं, तो तभी गर्भ संस्कार अपना लेना चाहिए। गर्भधारण करने से पहले ही भागवत गीता सुनें। गर्भधारण के तुरंत बाद से इसका असर भ्रूण और मां पर पड़ता है।
गर्भावस्था के दौरान भागवत गीता सुनने के फायदे
प्रेगनेंट महिला को भागवत गीता सुनने से कई तरह के लाभ मिलते हैं, जैसे कि :
सकारात्मक सोच : बच्चे की हर प्रतिक्रिया सबसे पहले मां से होकर गुजरती है। मां जैसा सोचती है, वैसा ही असर बच्चे पर पड़ता है। यदि मां का व्यवहार सकारात्मक रहता है, तो मां के शरीर में सकारात्मक बदलाव होते हैं।सकारात्मकता के कारण वह खुश रहती है। उसके खुश रहने के कारण गर्भ में पल रहा शिशु भी स्वस्थ और खुश रहने लगता है। कहने का मतलब यह है कि भागवत गीता सुनने से महिला में सकारात्मक विकसित होती है।
भावनात्मक संबंध : भागवत गीता सुनना यानी बच्चे को बाहरी बातों से अवगत कराना होता है। गर्भ संस्कार एक तरह से महिला और बच्चे के बीच | गर्भ संवाद | तय करता है। वैसे भी कहा जाता है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाएं यदि अपने बच्चे से बात करती है, तो इससे बच्चे को अच्छा लगता है और वह खुश रहता है।इससे बच्चे और मां के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होता है। यह बच्चे के मानसिक विकास पर भी असर डालता है।
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