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भारत में 0.44-2.8 फीसदी आबादी इसकी शिकार है। यहां अक्सर इसे छूत की बीमारी के रूप में देखा जाता है और इस तरह इसके मरीज मुख्यधारा से दूर हो जाते हैं। यानी इसके मरीज न केवल शारीरिक, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक आघात भी सहते हैं।

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