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जो बच्चें कुपोषण के शिकार होते हैं, वे शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह से कमज़ोर होते हैं। यदि बचपन से ही बच्चे कुपोषण के शिकार हो जाएं तो उनकी यह कमी जीवन भर उनके साथ रह जाती है। ऐसे में, बच्चे जीवन, करियर हर तरह से पिछड़ सकते हैं। कुपोषण के शिकार बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ मासिक विकास पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और ऐसे बच्चों में एकाग्रता की भी कमी होती है। भारत में ज़्यादातर बच्चों में विटामिन । और आयोडीन की कमी देखने को मिलती है। जिन बच्चों में विटामिन । की कमी होती है, वह बीमार भी अधिक पड़ते है, साथ ही उनमें डायरिया और अन्य संक्रमण होने की भी संभावनाएं अधिक रहती हैं। आयोडीन की कमी से होने से बच्चों के मानसिक विकास पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
कुपोषण उन लोगों को भी हो सकता है जिनको पौष्टिक भोजन तो मिलता है लेकिन उनकी आहार शैली सही नहीं होती है। उदाहरण के लिये जैसे कि दूध तो मिलता है पीने के लिये लेकिन उस दूध को सही तरह से रखा और उबाला नहीं गया हो और सेवन भी दूध के खराब होने की शुरुआत में किया गया हो तो ऐसे इंसान दूध तो पी रहे हैं किंतु दूध का पोषण उनको नहीं मिल पा रहा है। इसी तरह खाने-पीने की सभी चीजों के पोषक तत्व नष्ट होने पर उनका सेवन किया जाये तो ऐसा व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो सकता है। बड़ों की तुलना में बच्चों को और पुरूषों की तुलना में महिलाओं को कुपोषण की शिकायत अधिक होती है। होने को यह किसी भी आयु में हो सकता है। वैसे लड़कियों के साथ हर दिशा में भेदभाव होने के बावजूद पोषण के मामले में लड़कियों की स्थिति लड़कों के मुकाबले बेहतर पाई गई है।
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