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डॉप्‍लर स्‍कैन एक तरह का रेगुलर अल्‍ट्रासाउंड स्‍कैन ही होता है और इसमें हाई फ्रीक्‍वेंसी साउंड वेव्‍स का इस्‍तेमाल किया जाता है। नॉर्मल अल्‍ट्रासाउंड की तरह ही इसकी प्रक्रिया होती है और इसमें आप कंप्‍यूटर पर गर्भस्‍थ शिशु की तस्‍वीर देख सकते हैं।

रेगुलर अल्‍ट्रासाउंड से डॉप्‍लर स्‍कैन इसलिए अगल होता है क्‍योंकि ये रक्‍त वाहिकाओं में रक्‍त के प्रवाह, खून के प्रवाह की गति, दिशा और खून के थक्‍के के बारे में भी बताता है। आजकल अधिकतर अल्‍ट्रासाउंड में इनबिल्‍ट डॉप्‍लर फीचर होता है और दोनों ही स्‍कैन एक साथ किए जा सकते हैं।

क्‍या प्रेगनेंसी में डॉप्‍लर टेस्‍ट करवा सकते हैं
जी हां, गर्भवती महिला के लिए डॉप्‍लर स्‍कैन सुरक्षित है लेकिन आपको एक प्रशिक्षित अल्‍ट्रासाउंड डॉक्‍टर से ही ये स्‍कैन करवाना है। इस अल्‍ट्रासाउंट से शिशु की सेहत के बारे में पूरी जानकारी पाने में मदद मिलती है।
आमतौर पर प्रेगनेंसी की तीसरी तिमाही यानी 36 और 40वें सप्‍ताह में ग्रोथ स्‍कैन के साथ डॉप्‍लर स्‍कैन किया जाता है। हालांकि, अगर गर्भावस्‍था में कोई प्रॉब्‍लम हो तो इससे पहले भी डॉप्‍लर टेस्‍ट करवाया जा सकता है।

तीसरी तिमाही से पहले डॉप्‍लर टेस्‍ट शिशु में जेनेटिक और कार्डिएक विकारों का पता लगाने के लिए किया जाना चाहिए। इस समय अल्‍ट्रासाउंड डॉक्‍टर को 5 से 10 मिनट से ज्‍यादा समय इस टेस्‍ट में नहीं लगाना चाहिए।

डॉप्‍लर और कलर स्‍कैन में थर्मल इंडेक्‍स थोड़ा अधिक होता है लेकिन फिर भी इसकी कम डोज सुरक्षित होता है। कम से कम समय के लिए आप इस स्‍कैन को कर सकते हैं। अधिकतर मामलों में डॉप्‍लर स्‍कैन सिर्फ कुछ मिनट के लिए ही किया जाना चाहिए।

डॉप्‍लर स्‍कैन या अल्‍ट्रासाउंड क्‍यों किया जाता है
यदि पेट में जुड़वां बच्‍चे हों, शिशु रीसस एंटीबॉडीज से प्रभावित हो, शिशु का स्‍वस्‍थ विकास न हो रहा हो, पहली प्रेगनेंसी में शिशु का आकार छोटा रहा हो, पहले देरी से मिसकैरेज हुआ या डिलीवरी के वक्‍त बच्‍चा मर गया हो, डायबिटीज या हाई ब्‍लड प्रेशर से ग्रस्‍त प्रेगनेंट महिला को, जिनका बीएमआई (बॉडी मास इंडेक्‍स) कम या ज्‍यादा हो तो इन स्थितियों में डॉप्‍लर टेस्‍ट किया जाता है।
प्‍लेसेंटा ठीक तरह से काम कर रहा है या नहीं, और इसे शिशु को पर्याप्‍त ऑक्‍सीजन और पोषण मिल पा रहा है या नहीं, इस बात का पता लगाने के लिए भी डॉप्‍लर स्‍कैन किया जाता है।

डॉप्‍लर स्‍कैन से डॉक्‍टर को पता चलता है कि क्‍या शिशु की सेहत को ठीक करने के लिए कोई कदम उठाने या जल्‍दी डिलीवरी करवाने की जरूरत तो नहीं है।
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कैसे किया जाता है डॉप्‍लर अल्‍ट्रासाउंड
नॉर्मल अल्‍ट्रासाउंड की तरह ही डॉप्‍लर स्‍कैन किया जाता है। प्रेगनेंट महिला को टेबल पर लिटाकर पेट पर वॉटर बेस जैल लगाया जाता है। अब ट्रांसड्यूसर को पेट पर लगाया जाता है और इससे आप कंप्‍यूटर की स्‍क्रीन पर उसी समय अपने शिशु की तस्‍वीरें देख सकती हैं। इस स्‍कैन में केवल कुछ मिनट का समय लगता है और इसमें दर्द नहीं होता है।

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