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IVF Treatment Failure Reasons: आईवीएफ फेल होने की ये है 3 वजह, जिसके कारण नहीं मिल पाता संतान सुख

सफल गर्भावस्था हासिल करने के लिए एक या दो आईवीएफ ट्रीटमेंट की जरूरत होती है। यह शारीरिक, मानसिक और संज्ञानात्मक रूप से काफी थकाने वाला हो सकता है, लेकिन आपको यह जानना चाहिए कि आप इस संघर्ष में अकेले नहीं है।

गर्भावस्था के लिए आईवीएफ की मेडिकल प्रक्रिया धीरे-धीरे लोकप्रिय होती जा रही है। इस तकनीक ने निसंतान दंपतियों की सफलतापूर्वक माता-पिता बनने में मदद की है। इसके साथ ही कई मामलों में आईवीएफ की नाकामी भी सामने आई है। इस प्रक्रिया की नाकामी के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। हालांकि आपको इसके लिए खुद को दोष नही देना चाहिए। बाहरी कारक वह प्रमुख कारण है, जो आईवीएफ की प्रक्रिया के चारों खाने चित होने होने के लिए जिम्मेदार है। क्यों यह प्रक्रिया फेल हुई और आप इसके बाद बाद क्या कदम उठा सकते हैं, यह आपका डॉक्टर या हेल्थ केयर प्रोफेशनल आपको समझा सकता है।
आईवीएफ प्रक्रिया की नाकामी के तीन कारण

आपकी और से चुना गया क्लीनिक, लैब के मानक, इस प्रक्रिया को करने का तरीका और भ्रूण विज्ञानियों की योग्यता सभी ऐसे तत्व हैं, जो आईवीएफ के नतीजे को प्रभवित कर सकते हैं। अगर यह सब स्थितियां आदर्श भी हैं तो भी यह प्रक्रिया फेल हो सकती है। फर्टिलिटी क्लीनिक ने कुछ प्रमुख विशेषताओं की पहचान की है, जो आईवीएफ की नाकामी का कारण हो सकती है। इनमें से कुछ के संबंध में नीचे चर्चा की हई है।
1. अंडाणु में असामान्यता

मानव अंडाणु या डिंब एक अत्यंत जटिल संरचना है। इसके नतीजे के तौर पर इसमें नुकसान होने की आशंका काफी रहती है, जो इसे बेकार बना सकते है। जब कोशिकाएं विभाजित होती हैं तो गुणसूत्र (आपके और पार्टनर के जीन्स वाले डीएनए पैकेट) दोगुने हो जाते हैं और कोशिका के मध्य भाग में एकत्र हो जाते हैं। आपको याद आ सकता है, जो कि यह तो आपने हाईस्कूल में जीवविज्ञान की किताब में पढ़ा था। इसमें से आधे क्रोमोसोम एक तरह से अपना स्थान बदलते हैं, जबकि कोशिका के विभाजित होने के कारण दूसरे आधे क्रोमोसोम विपरीत दिशा में आगे बढ़ते हैं, जिसके नतीजे के तौर पर 2 समान कोशिकाएं हो जाती हैं। ये क्रोमोसोम आगे बढ़ते हैं क्योंकि यह एक स्पिंडल उपकरण से जुड़े होते हैं, जो क्रोमोसोम को अलग-अलग करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह गुणसूत्र के विभाजन का जिम्मा संभालते हैं। इससे कोशिकाएं अलग-अलग हो जाती हैं।


जैसे-जैसे अंडाशय में उत्पन्न होने वाले कीटाणु कोशिकाओं की उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे स्पिंडल उपकरण के टूटने का खतरा बन जाता है, जिससे गुणसूत्र असामान्य हो जाते हैं और इसके नतीजे के रूप में अव्यावहारिक भ्रूण बन जाता है। अंडाशय में मुक्त कणों, प्रतिक्रियात्मक ऑक्सिजन प्रजातियां और मेटाबॉलिक प्रॉडक्ट्स की उम्र बढ़ने के साथ अंडाशय में उत्पन्न होने वाली कीटाणु कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। कार्गर स्टेट जैसे प्रमुख प्रकाशन संघों में प्रकाशुत हाल के अध्ययम में कहा गया कि अंडाशय में बनने वासी कीटाणु कोशिकाओं में 25 से 40 प्रतिशत गणसूत्र असामान्य होते है। जैसे-जैसे महिला का उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे यह संख्या बढ़ती है।
2. भ्रूण प्रत्यारोपण का फेल होना

भ्रूण की गर्भाशय की अंदरूनी परत से जोड़ने में नाकामी आईवीएफ के फेल होने का प्रमुख कारण रही है। भ्रूण के प्रत्यारोपण में नाकामी मिलने का कारण या तो भ्रूण के साथ कोई समस्या हो सकती है या गर्भाशय के साथ होने वाली की भी परेशानी भी आईवीएफ की प्रक्रिया के नाकाम होने का कारण हो सकती है, लेकिन हालात अलग-अलग होते हैं। करीब 90 प्रतिशत मामलों में प्रजजन प्रक्रिया से जुड़े डॉक्टर भ्रूण का विकास न होने को प्रत्यारोपण में नाकामी का दोष देते हैं। कई भ्रूण पनप कर पांच दिन से पहले मर जाते है। लेकिन वह भ्रूण जो पहले कुछ दिन तक जिंदा रहते हैं और स्वस्थ दिखाई देते हैं, वह भी गर्भाशय में प्रत्यारोपित होने के बाद किसी समय मर जाएंगे।

कई बार जेनेटिक और गुणसूत्र संबंधी समस्याओं के कारण भ्रूण काफी कमजोर होता है, जबकि कुछ मामलों में भ्रूण में पर्याप्त कोशिकाएं नहीं होती और इनका विकास नहीं हो पाता। आईवीएफ के साथ पीजीएस( प्रीइंप्लाटेशन जेनेटिक स्क्रीनिंग) टेस्ट की ऐसी तकनीक है, जिसके साथ आईवीएफ प्रक्रिया के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस तकनीक में भ्रूण को गर्भाशय में ट्रांसफर करने से पहले भ्रूण की आनुवांशिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। .यह डॉक्टरों को उस भ्रूण को चुनने की इजाजत देता है, जिसमें जिंदा रहने की संभावना रहती है। खराब क्वॉलिटी के कमजोर भ्रूण होने के कई कारण होते हैं, जिसके चलते भ्रूण एक निश्चित चरण के आगे विकास नहीं कर पाते, लेकिन ऐसी कोई फूलप्रूफ तकनीक नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि भ्रूण के साथ क्या गलत हुआ, जो वह खरीब हो गए।

3. गुणसूत्र संबंधी असामान्यता

भ्रूण में गुणसूत्र संबंधी अनियमितताओं के कारण भी आईवीएफ प्रक्रिया फेल हो सकती है। इससे संकेत मिलता है कि गुणसूत्रों का डीएनए गायब है, या अधिकता में है या अनियमित है। ऐसी स्थिति में भ्रूण को बॉडी रिजेक्ट कर देती है, जिसका परिणाम आईवीएफ प्रक्रिया की नाकामी होता है। भ्रूण के विकास की प्रक्रिया के दौरान असामान्य गुणसूत्र किसी एक पैरंट्स से विरासत में मिलते हैं।

भ्रूण में यह असामान्यताएं आईवीएफ की नाकामी के सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। इन गड़बड़ियों की वजह से ही आईवीएफ साइकिल में काफी नुकसान होता है और भ्रूण प्रत्यारोपण में नाकामी हाथ लगती है। स्पर्म में गुणसूत्र संबंधी गड़बडियां मिलने से नतीजे के तौर पर गुणसूत्र के लिहाज से खराब भ्रूण मिलते हैं, पर यह जोखिम मानव अंडाणुओं में हुए नुकसान की तुलना में काफी कम होता है।

ट्रांससेशनल एंड्रोलॉजी और यूरोलॉजी जर्नल के अनुसार, सामान्य स्पर्म विश्लेषण वाले पुरुषों में डिफेक्टिव स्पर्म डीएनए हो सकता है। स्पर्म डीएनए का अलग-अलग खंडों में विश्लेषण से स्पर्म के आनुवांशिक मुददों को समझा जा सकता है। अक्सर इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता। कुछ उपभोक्ताओं के ट्रीटमेंट में काफी महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट साबित होता है। प्रेग्नेटिक स्क्रीनिंग टेस्ट (पीजीएस) से भ्रूण में गुणसूत्रों की अखंडता को तय किया जा सकता है।

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