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बहकी-बहकी बात करना, बेवजह शक और अकेले में बड़बड़ाना कोई साया नहीं, सिजोफ्रेनिया के लक्षण
वास्तविकता से परे बहकी-बहकी बात करना, किसी पर बेवजह शक और अकेले में बड़बड़ाना कोई भूत-प्रेत का साया नहीं बल्कि एक सिजोफ्रेनिया नामक मानसिक रोग है। इसमें व्यक्ति के सोचने-विचारने की क्षमता पूरी तरह खत्म हो जाती है। इस डिसऑर्डर से पीड़ित प्रत्यक्ष को नहीं मानता और अपनी दुनिया बनाकर उसके अनुसार व्यवहार करने लगता है। अंधविश्वास से घिरे लोग इसे बीमारी न मानकर तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक से इलाज का प्रयास करते हैं, जब राहत नहीं मिलती तो अस्पताल पहुंचते हैं। ऐसे ही 70 रोगी हर माह इलाज के लिए सिविल अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञों के पास आ रहे हैं। विशेष बात यह कि इस बीमारी का इलाज सिर्फ दवा है, जोकि 3 साल से लेकर जिंदगीभर चल सकता है।मनोरोग वार्ड में 20 साल से लेकर 40 साल तक की आयु के रोगी इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। मनोचिकित्सक की जांच में सामने आया है कि घर की अशांति, खुशनुमा माहौल न होना, असंतुलित आहार, तनाव और नींद न आने के कारण ब्रेन के न्यूरोट्रांसमीटर का बैलेंस बिगड़ जाता है। इसके रोगियों की संख्या बढ़ रही है, जिनके ब्रेन तक वास्तविक जानकारी नहीं पहुंच पाती है। रोगी आसपास की हकीकत से दूर होता जाता है। तब वह अकेले में बात करता है, बेवजह लोगों पर शक करता है, उसे लगता है कि शरीर में कुछ चल रहा है। इस स्थिति में जागरूक लोग रोगी को इलाज के लिए अस्पताल लेकर जाते हैं, लेकिन पिछड़े इलाकों में रहने वाले लोग नजरअंदाज करते हैं।यूं चलता है इलाज
प्रथम चरण में 1 से 3 साल तक

द्वितीय चरण में 5 साल तक

तृतीय चरण में जिंदगी भर दवा का सेवन करना पड़ सकता है।

सिजोफ्रेनिया बीमारी के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। हर माह करीब 70 रोगी इलाज के लिए आते हैं। लोग इस बीमारी को भूत-प्रेत का साया बताते हैं। मगर ऐसा ना करें और इस बीमारी को गंभीरता से लेते हुए रोगी को मनोचिकित्सक के पास इलाज के लिए लेकर जरूर पहुंचे। दवा से रोग का प्रभाव कम किया जा सकता है।\'\' -विनोद डूडी, मनोरोग विशेषज्ञ।

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