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Stent कैसे काम करता है? स्टेंट कैसे लगाया जाता है, इससे जुड़े खतरे और हर प्रश्न का उत्तर यहां है
स्टेंट कैसे काम करता है
स्टेंट (Stent) एक छोटी सी डिवाइस होती है, जो किसी की जान बचा सकती है. नसों में किसी तरह की ब्लॉकेज (Blockage) के बावजूद रक्त प्रवाह बाधित न हो, इसके लिए मरीज के शरीर में स्टेंट लगाया जाता है. स्टेंट लगने के बाद व्यक्ति साधारण जिंदगी जी सकता है. स्टेंट किसी का जीवन बचा सकता है यह तो आप जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्टेंट कैसे काम करता है? अगर नहीं जानते तो कोई बात नहीं, इस आर्टिकल में हम आपको बताएंगे कि स्टेंट कैसे काम करता है (How do stents work) और स्टेंट लगने के बाद मरीज कैसे अपना भरपूर जीवन जी सकता है.
स्टेंट क्या काम करते हैं – What do stents do in Hindi?
स्टेंट क्या काम करते हैं, यह आप जानते हैं. फिर भी जो लोग नहीं जानते उनके लिए इस प्रश्न का उत्तर भी जान लेते हैं. स्टेंट एक छोटी सी डिवाइस होती है, जो प्लाक जमने के कारण लगभग बंद हो चुकी नसों को वापस खोलती है और रक्त प्रवाह सुचारू करती है. दरअसल जब हमारी नसों में बैड कॉलेस्ट्रॉल जमा हो जाता है तो वह खून के प्रवाह को रोकने लगता है. ऐसा होने पर दिल तक खून नहीं पहुंचता है या बहुत कम रक्त पहुंचता है. ऐसे में स्टेंट लगाकर रक्त प्रवाह को दुरुस्त किया जाता है. स्टेंट लगाने के लिए एंजियोप्लास्टी की जाती है. हार्ट अटैक जैसी आपात स्थिति में एंजियोप्लास्टी करके स्टेंट लगाता जाता है या फैटी प्लाक जमा होने पर प्लान्ड ट्रीटमेंट के तहत भी एंजियोप्लास्टी (Angioplasty procedure) की जाती है.
स्टेंट की आवश्यकता क्यों?
ये प्रश्न भी जरूरी है, क्योंकि सिर्फ बलून के जरिए भी सिकुड़ी नस को चौड़ा किया जा सकता है, जिससे कि रक्त प्रवाह ठीक हो सकता है, इस विधि को बिना स्टेंट की एंजियोप्लास्टी कहते हैं. लेकिन स्टेंट नहीं होने की वजह से नस फिर से सिकुड़ सकती है. नस के फिर से सिकुड़ने की आशंका 30 फीसद तक होती है, जबकि स्टेंट लगने पर नस बाधित होने की आशंका 10-15 फीसद तक ही रह जाती है. अगर स्टेंट ‘ड्रग एल्यूटिंगट’ स्टेंट है तो नस के फिर से सिकुड़ने की आशंका और 2-3 फीसद कम हो जाती है.
आजकल सभी एंजियोप्लास्टी के मामलों में स्टेंट लगाया जाता है, ताकि मरीज को बार-बार नस सिकुड़ने की समस्या न हो. नस बहुत पतली या बहुत चोड़ी होने पर ही स्टेंट नहीं लगाया जाता है. इसके अलावा अगर मरीज को स्टेंट के मैटेरियल से एलर्जी हो तो उस स्थिति में भी स्टेंट नहीं लगाया जाता. हालांकि, ऐसा बहुत कम ही मामलों में होता है.
स्टेंट का इस्तेमाल जब आपकी कोरोनरी धमनियों में होता है तो इससे दिल के दौरे (Heart Attack) और एनजाइना (Angina) का इलाज किया जा सकता है. स्टेंट का इस्तेमाल पेरिफेरल आर्टरियल डिजीज (PAD) के इलाज के लिए पैरों में भी किया जा सकता है. इसके अलावा कभी-कभी दिमाग को खून की सप्लाई करने वाली धमनी (कैरोटिड धमनी) के सिकुड़ने पर गर्दन की भी स्टेंट लगाया जाता है. किडनी को खून की सप्लाई करने वाली गुर्दे की धमनियों को भी स्टेंट लगाकर चौड़ा किया जाता है.
स्टेंट कैसे दिखते हैं – What do stents look like in Hindi?
स्टेंट देखने में बेलनाकार होते हैं और यह बहुत ही महीन धातु की जाली (fine metal mesh) से बने होते हैं.
स्टेंट कितने बड़े होते हैं – How big is a stent in Hindi?
ज्यादातर स्टेंट 15-20 मिलीमीटर लंबे होते हैं. हालांकि, इनकी लंबाई 8 से 48 एमएम तक और 2-5 एमएम डायामीटर तक भी होते हैं.
स्टेंट को कैसे लगाया जाता है – How are stents inserted in Hindi?
एक्स-रे का इस्तेमाल करके हाथ की कलाई या कमर के निचले हिस्से से एक लंबी पतली नली (Catheter) को संकुचित धमनी तक पहुंचाया जाता है. अब इस कैथेटर के जरिए एक बहुत ही महीन तार को धमनी के संकुचित हिस्से तक पहुंचाया जाता है. इस महीन ताल के ऊपर एक गुब्बार डाला जाता है, जिसके बाहर संकुचित स्टेंट लगा होता है. गुब्बारे को फुलाने पर ही स्टेंट खुलकर धमनी की चौड़ाई बढ़ाता है.
जब कार्डियोलॉजिस्ट को यह विश्वास हो जाता है कि स्टेंट ठीक जगह पर पहुंच गया है तो वह बलून को फला देते हैं. बलून फुलाने से स्टेंट भी फैलता है और धमनी की दीवारों पर फिट हो जाता है. इस तरह से बंद धमनी फिर से खुल जाती है. इसके बाद कैथेटर, बलून और महीन तार को वापस निकाल लिया जाता है, जबकि स्टेंट वहीं रहकर रक्त प्रवाह को सुचारू बनाए रखता है. इस पूरी प्रक्रिया में आधे से एक घंटे तक का समय लगता है.
स्टेंट किस चीज से बना होता है – What is a stent made of in Hindi?
स्टेनलेस स्टील, प्लेटिनम-क्रोमियम और कोबाल्ट क्रोमियम जैसी धातुओं से स्टेंट को बनाया जाता है. स्टेंट पर पॉलिमर की कोटिंग भी होती है. इसके अलावा ज्यादातर स्टेंट में ऐसे ड्रग की कोटिंग होती है जो स्टेंट के बीच के हिस्सों में स्कार टिश्यू बनने से रोकती है. क्योंकि स्कार टिश्यू की वजह से धमनी फिर से संकुचित हो सकती है. ऐसे स्टेंट को ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट कहा जाता है और लंबे समय तक बेहतर महसूस हो इसके लिए 95 फीसद मामलों में ड्रग एल्युटिंग स्टेंट का इस्तेमाल किया जाता है.
क्या स्टेंट से दर्द होता है – Will Stent hurt in Hindi?
आमतर पर स्टेंट लगाए जाने के दौरान दर्द नहीं होता. कैथेटर को नस के जरिए प्रभावित धमनी तक पहुंचाने से पहले लोकल एनस्थीसिया का इस्तेमाल किया जाता है. धमनी के अंतर कैथेटर बिल्कुल भी महसूस नहीं होता. जब बलून को फुलाया जाता है, उस दौरान कुछ लोगों को सीने में दर्द जरूर महसूस होता है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आप लेटे हुए रहेंगे, लेकिन जाग्रत अवस्था में. हालांकि, कुछ मरीजों को एनस्थीशिया देकर सुला दिया जाता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में मरीज पूरी प्रक्रिया के दौरान जगे रहते हैं.
कलाई से स्टेंट डाला जाए या कमर के निचले हिस्से से
ज्यादातर मामलों में कलाई के जरिए स्टेंट डाला जाता है. कलाई से कैथेटर डालने में ब्लीडिंग का खतरा भी कम होता है. हालांकि कमर के निचले हिस्से से लंबे कैथेटर को आसानी से दूर की धमनियों तक पहुंचा जा सकता है. यही वजह से कि कुछ जटिल प्रक्रियाओं में कमर के निचले हिस्से से कैथेटर डाल जाता है.
स्टेंट कितनी समय तक रहता है – How long will a stent last in Hindi?
एक बार लगने के बाद स्टेंट हमेशा धमनी में बना रहता है. स्टेंट लगने के बाद सिर्फ 2-3 फीसद मामलों में ही धमनी के फिर से संकुचित होने की आशंका होती है. अगर ऐसा होता है तो यह आमतौर पर 6 से 9 महीनें में होता है. अगर धमनी फिर से संकुचित होती है तो एक और स्टेंट डालकर फिर से चौड़ा कर दिया जाता है. अन्य धमनियों में संकुचन होने पर उन्हें भी स्टेंट की मदद से चौड़ा किया जा सकता है. अगर आपकों बताई गई दवाओं का आप नियमित तौर पर सेवन करते हैं और लाइफस्टाइल में जरूरी बदलाव करते हैं तो आपको और ज्यादा स्टेंट की जरूरत नहीं पड़ेगी. आपको धूम्रपान छोड़ना होगा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और कॉलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण रखने के उपाय करने होंगे.
स्टेंट से कौन-कौन से खतरे जुड़े हैं – What are the risks of stents in Hindi?
धमनियों के अंदर कैथेटर के जाने से हल्की चोटें आना आम बात है, जो कुछ ही हफ्तों में अपने आप ठीक हो जाती हैं. हालांकि, खून आना असामान्य है, लेकिन प्रभावित हिस्से को दबाने से यह समस्या भी हल हो जाती है. जैसा कि आपने ऊपर पढ़ा कलाई से कैथेटर डालने पर कमर के निचले हिस्से की बजाय ब्लीडिंग की आशंका कम होती है. इससे कोई बड़ा और गंभीर खतरा नहीं होता. एक गंभीर खतरा यह है कि इस प्रक्रिया की वजह से खून का थक्का (Blood Clot) बन सकता है, जिससे हार्ट अटैक आ सकता है. हालांकि, ऐसा 500 में से किसी एक मामले में होता है.
रिकवरी कैसी होती है – What is recovery like?
अगर प्लान करके एंजियोप्लास्टी करवा रहे हैं तो दिल तुरंत ठीक से काम करना शुरू कर देता है. कलाई से कैथेटर को प्रभावित धमनी तक पहुंचाया गया है तो आप एंजियोप्लास्टी के तुरंत बाद घूमना-फिरना शुरू कर सकते हैं. अगर कमर के निचले हिस्से से एंजियोप्लास्टी की गई है तो आपको कुछ देर लेटे रहने को कहा जाएगा. इसके बाद आपको अगले 4-6 घंटे तक वार्ड में रहने को कहा जाएगा. आपकी पूरी तरह से जांच की जाएगी और ब्लीडिंग न होने पर ही आपको घर जाने की इजाजत मिलेगी. अगले दिन से ही आप अच्छा महसूस करने लगेंगे, लेकिन अगले कुछ दिनों तक आपको भारी काम नहीं करने से बचना होगा. अगर हार्ट अटैक के कारण स्टेंट डाला गया है तो आपको रिकवरी में ज्यादा समय लग सकता है.
स्टेंट से जुड़े खतरे – Are there any side effects of putting in stents?
आपकी धमनी में एक बाहरी चीज को इंप्लांट किया गया है तो इस स्टेंट की वजह से ब्लड क्लॉट बन सकते हैं. लेकिन पहले साल में 50 में से सिर्फ 1 व्यक्ति में ऐसा खतरा होता है और इस खतरे को दवाओं के जरिए कम किया जा सकता है. इस तरह के खतरे से बचने के लिए आपके डॉक्टर आपको दवाओं का सुझाव देंगे, उनके सुझाव को गंभीरता से सुनें और इस्तेमाल करें.
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