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सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों को 8 से 10 महीने के इलाज में पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है।

सिजोफ्रेनिया एक ग्रीक शब्द है, जिसका मतलब है 'स्प्लिट माइंड'। सिजोफ्रेनिया एक मनोरोग है जो किसी व्यक्ति में मानसिक विकार के बारे में बताता है। इस विकार से ग्रस्त व्यक्ति को वास्तविकता या फिर अपनी बात जाहिर करने में परेशानी होती है और ये सामाजिक व व्यावसायिक दोनों ही प्रकार से परेशानी का सामना करते हैं। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति आम तौर पर बिना सोचे समझे कुछ भी कहने और भ्रम जैसी दुविधा में जीते हैं। हालांकि सिजोफ्रेनिया को एक दुर्लभ स्थिति माना जाता है लेकिन जब बात दुनिया भर की होती है तो हालात काफी परेशान करने वाले प्रतीत होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में 20 लाख लोग सिजोफ्रेनिया से ग्रस्त हैं। और रोगों से तुलना की जाए तो भले ही इसके मामले कम हो लेकिन सिजोफ्रेनिका की व्यापकता अधिक है। चूंकि यह एक क्रॉनिक मानसिक बीमारी है इसलिए इसके प्रति वर्ष मामलों की संख्या बहुत कम होती है, लेकिन बहुत सारे लोग वर्तमान में इस स्थिति से पीड़ित हैं।

सिजोफ्रेनिया के बारे में समाज के भीतर बहुत सारी गलत धारणाएं मौजूद हैं। बता दें कि सिजोफ्रेनिया का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि आपकी स्प्लिट पर्सनैलिटी है या फिर आपको मल्टीपल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोग न तो खतरनाक होते हैं और न ही हिंसक होते हैं, इनका बर्ताव सामान्य आबादी की ही तरह समान होता है। हालांकि कई बार ऐसे लोग सामाजिक मनोवृत्ति का शिकार हो जाते हैं। सही उपचार या रोगी की देखभाल में कमी रोग को बढ़ाने का काम करती है।

सिजोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति को निरंतर अंतराल पर दौरे पड़ते हैं। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगो को बेहतर जीवन देने के लिए विभिन्न जैव-मनोवैज्ञानिक-सामाजिक रणनीतियों का उपयोग किया जा सकता है। अच्छा समर्थन, थेरेपी और उपचार से लोग के व्यवहार में बहुत सुधार दिखाई दे सकता है और वे हेल्दी जीवन जी सकते हैं।


सिजोफ्रेनिया के प्रकार

पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया (Paranoid schizophrenia)

पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया में पीड़ित व्यक्ति को संदेह, जुनून या भ्रम की स्थिति बहुत ज्यादा होती है और ऐसी स्थिति में वह वैसा ही करने लगता है, जो उसे सही लगता है। इस स्थिति से पीड़ित व्यक्ति का व्यवहार अजीब तरह से हो सकता है और उसकी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं भी ठीक नहीं होती है और सामान्य जीवन से उसका जुड़ाव बहुत कम दिखाई देता है।

कैटेटोनिक सिजोफ्रेनिया (Catatonic schizophrenia)

कैटेटोनिक सिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से बिल्कुल कुंद हो जाता है, इतना ही नहीं उसके चेहरे पर बहुत कम या फिर कोई चेहरे पर कोई भाव ही नहीं होता है। उदाहरण के तौर पर वे लंबे समय तक नहीं चल सकता। उसमें खाने, पीने या पेशाब जाने तक की भावना नहीं पैदा होती है। कभी-कभी कैटेटोनिया कई घंटों तक रहता है, जिसके कारण उनके अस्पताल जाने की नौबत तक आ जाती है।

अपरिभाषित सिजोफ्रेनिया (Undifferentiated schizophrenia)

अपरिभाषित सिजोफ्रेनिया में व्यक्ति में कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो एक से अधिक प्रकार के सिजोफ्रेनिया में आते हैं।

हेबेफेरेनिक सिजोफ्रेनिया (Hebephrenic schizophrenia)

यह सिजोफ्रेनिया का वह रूप है जिसमें रोगी के भीतर भावनात्मक परिवर्तन, भ्रम और व्यवहार में बदलाव, गैर-जिम्मेदार और अप्रत्याशित व्यवहार जैसे लक्षण बिल्कुल सामान्य होते हैं। इन रोगियों का मन हमेशा उदास रहता है और कभी भी मौजूदा स्थिति से मेल नहीं खाता है। हालांकि रोगी कभी-कभी गर्व, मुस्कराहट, शरारत और आपकी होली गई बातों को दोहरा सकता है।
सिजोफ्रेनिया के लक्षण

सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में अलग-अलग प्रकार के लक्षण हो सकते हैं। यह अपने आप आ सकते हैं या फिर खुद-ब-खुद चले भी जाते हैं। इसके अलावा पूरे जीवनकाल में ये लक्षण केवल दो या तीन बार हो सकते हैं। इस रोग की शुरुआत में, लक्षण अचानक और गंभीर भी हो सकते हैं।

साइकोटिक फेज के दौरान रोगी वास्तविकता को कई हिस्सों में समझ सकता है। ये लक्षण रोजमर्रा के जीवन में दिखाई सकते हैं। ये लक्षण आवश्यक गतिविधियों के दौरान जैसे कि काम करने, खाना खाने, या आस-पास घूमते वक्त भी दिखाई दे सकते हैं। कुछ गंभीर मामलों में काम करने जैसी गतिविधियां भी सीमित दिखाई दे सकते हैं।

साइकोटिक फेज में दिखाई देने वाले लक्षण हैं:

1-पीड़ित व्यक्ति को देखने, सुनने, महसूस करने या कुछ चीजों की गंध आएगी लेकिन वो वास्तविक नहीं होती हैं।
2-भ्रम की स्थिति रहती है, जहां अजीब चीजें महसूस होती हैं, जो बिल्कुल झूठी होती हैं।
3-पीड़ित व्यक्ति के मन में ख्याल अचानक एक से दूसरी जगह पर चला जाता है।
4-मौजूदा हालात के साथ उचित भावनाओं, विचारों और मनोदशा का महसूस न होना।

सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों को ये चीजें भी अनुभव होती हैंः

1-एक वक्त में बहुत सारी ऊर्जा दिखाना या फिर कैटाटैनिक बनना। ये एक ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर बहुत कठोर हो जाता है।
2-ऐसी चीजें बोलना, जिसके बारे में समझ ही नहीं होना।
3-हाथ-पैर न धोना और खुद को सही तरीके से बनाकर रखना।
4-खुद को अलग-थलग रखना।
5-कार्यस्थलों, जहां भीड़-भाड़ हो, वहां पर कार्य करने या अन्य गतिविधियों को करने की क्षमता खो देना।
6-जीवन में कम रुचि दिखाना।
7-अवसाद के लक्षण दिखाई देना या मूड में बदलाव होना।
8-शारीरिक रूप से निष्क्रिय होना।
सिजोफ्रेनिया के कारण और जोखिम कारक

सिजोफ्रेनिया का कारण

सिजोफ्रेनिया का कोई एक कारण नहीं है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति के पीछे पर्यावरण और आनुवंशिक जैसे कुछ कारक योगदान देते हैं। सिजोफ्रेनिया के पीछे मुख्य कारण आनुवांशिक होता है और इस स्थिति के लिए मानसिक बीमारी से पीड़ित रोगी के रिश्तेदार भी इसी बीमारी से पीड़ित देखे जाते हैं। हालांकि, अन्य न्यूरोलॉजिक्ल कारक भी हैं जो इस स्थिति में योगदान देते हैं। सिजोफ्रेनिया की शुरुआत और रिकवरी में मनोवैज्ञानिक और परिवार का माहौल भी भूमिका निभा सकता है।

जोखिम कारक

पूरे जीवनकाल में सिजोफ्रेनिया जैसी समस्या होने की संभावना लगभग 1% होती है। इसलिए ये कहा जा सकता है कि सौ में से सिर्फ एक व्यक्ति को ही अपने जीवनकाल में सिजोफ्रेनिया जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति पुरुषों और महिलाओं दोनों में समान रूप से प्रचलित है। पुरुषों में ये रोग आमतौर पर 10 से 25 वर्ष की आयु के बीच पाया जाता है जबकि महिलाओं में यह स्थिति 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच अधिक आमतौर पर देखने को मिलती है।

मादक पदार्थों का सेवन भी सिजोफ्रेनिया का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। वे लोग, जो नशा करते हैं उनमें नशा नहीं करने वालों की तुलना में सिजोफ्रेनिया का जोखिम छह गुना अधिक होने की संभावना रहती है।
सिजोफ्रेनिया की रोकथाम

सिजोफ्रेनिया जैसी स्थिति को रोका नहीं जा सकता है हालांकि इसके जोखिम को कम करने के लिए कुछ उपाय जरूर किए जा सकते हैं। नशे का प्रयोग और तनाव जैसे जोखिम कारक भी सिजोफ्रेनिया में योगदान कर सकते हैं, इसलिए इनसे बचना भी सिजोफ्रेनिया जैसी स्थिति के जोखिम को कम करता है। रोग का शुरुआत में ही पता लगाने और उचित देखभाल से इसे बढ़ने से रोका जा सकता है।
सिजोफ्रेनिया का निदान

इस स्थिति का पता लगाने का कोई निश्चित मेडिकल टेस्ट नहीं है। सिजोफ्रेनिया का पता रोगी की केस हिस्ट्री और उसके मानसिक हालात को देखकर ही लगाया जाता है। इस रोग का पता लगाने के लिए फुल साइकेट्रिक इवैल्युशेन, मेडिकल हिस्ट्री का मूल्यांकन और फिजिकल टेस्ट किए जाते हैं। मरीज में किसी प्रकार के लक्षणों का पता लगाने के लिए लैब परीक्षणों का उपयोग भी किया जाता है।

सिजोफ्रेनिया का पता लगाने को लेकर जरूरी बातें

सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए रोगी में कम से कम 30 दिनों तक निम्न लक्षणों में से दो या उससे अधिक लक्षण मौजूद होने चाहिए:

1-बुरे-बुरे सपने आना
2-भ्रम की स्थिति रहना
3-बोलने में दिक्कत होना
4-कैटाटैनिक व्यवहार
5-नकरात्मक या फिर उदासीन शब्दों का प्रयोग

रोग का पता लगाने के अन्य मानदंड हैं:

1-काम या स्कूल में अन्य लोगों से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याएं, या खुद की देखभाल करने में समस्या।
2-कम से कम एक महीने तक सक्रिय लक्षणों के साथ बीते छह महीने से सिजोफ्रेनिया के लक्षण दिखाई देना।
3-भले ही कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या न हो लेकिन नशे की लत या फिर मानसिक स्वास्थ्य विकार भी लक्षणों का कारण बनता है।
सिजोफ्रेनिया का इलाज

अगर शुरुआत में ही इस रोग की पहचान और उसे कंट्रोल किया जाए तो सिजोफ्रेनिया का उपचार काम आ सकता है। दवाओं के साथ सामाजिक और सामुदायिक सपोर्ट उपचार में प्रभावी साबित होता है। मरीजों को अस्पताल या फिर मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में भेजने से इस रोग को बढ़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। परिवार के सदस्यों का सपोर्ट भी रोग को बढ़ने से रोकने में बहुत उपयोगी साबित होता है।

सिजोफ्रेनिया के लिए दी जाने वाली दवा आमतौर पर बुरे सपने, भ्रम, सनक और भ्रमित सोच जैसे मनोविकार के लक्षणों को कम करने में मदद करती है। सिजोफ्रेनिया के लिए फार्माकोथेरेपी को विकसित हुए वर्षों बीत चुके हैं और सिजोफ्रेनिया के उपचार के लिए बेहद प्रभावी दवाइयां उपलब्ध हैं। यह दवाइयां मनोचिकित्सा के साथ-साथ प्रेरणा की कमी, अभिव्यक्ति की कमी और सामाजिक जुड़ाव में कमी जैसे लक्षणों का इलाज करने के लिए भी उपयोगी साबित होती है।

ये थेरेपी तनाव को कंट्रोल कर और कम्युनिकेशन को बेहतर बनाने के साथ-साथ जीवन कौशल को बेहतर बनाने में भी मददगार साबित होती है। कभी-कभी ग्रुप थेरेपी समान लक्षण वाले समूह को आपस में जोड़कर भी मदद करती है।

जीवनशैली में इन बदलावों को कर सिजोफ्रेनिया से उबरने में मिलती है मदद

सामाजिक सपोर्ट भी है बहुत जरूरी

रोगी को शांत करने और तनाव को कम करने के लिए उसे मित्रों और परिवार के साथ जुड़ने के लिए तरीके सुझाएं। अपने दैनिक कार्यों को जारी रखते हुए दूसरों के साथ जुड़े रहना भी लाभदायक सिद्ध होता है। सामान्य दिखने वाले लोगों के साथ समय बिताने से भी फायदा मिलता है। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोग जुड़े रहने से अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं।

तनाव को प्रबंधित करना सीखें

शरीर के कोर्टिसोल हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाकर सिजोफ्रेनिया के कारण होने वाले तनाव को कम करने में मदद मिलती है। तनाव कम करने के लिए रिलैक्सेशन प्रैक्टिस भी काफी मददगार साबित होती है।

एक्सरसाइज करें

एक्सरसाइज, फोकस और ऊर्जा को बढ़ाने और रोगियों को शांत महसूस करने में मदद करती है। चलने, दौड़ने, तैरने, या डांस करने जैसी गतिविधियां मात्र दिन में 30 मिनट करने से लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है।

उचित नींद लें

नियमित नींद चक्र मूड को फ्रेश बनाए रखने में मदद करता है। रोगी को आठ घंटे से अधिक की नींद की सलाह दी जाती है।

नशे के सेवन से बचें

ड्रग्स, निकोटीन और अल्कोहल सिजोफ्रेनिया के लक्षणों को बढ़ाने में मदद कर सकती है। इतना ही नहीं ये कुछ दवाओं के उपचार के रास्ते में भी बाधा पैदा करती हैं।

हेल्दी खाने की आदत बनाएं

फिश ऑयल, अखरोट और फ्लैक्ससीड्स से मिलने वाला ओमेगा -3 फैटी एसिड आपके ध्यान को बेहतर बनाने, थकान से बचने और मूड को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं। सही अंतराल पर भोजन और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल कर शरीर में पर्याप्त पोषण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
रोग का निदान और जटिलताएं

सिजोफ्रेनिया ताउम्र रहने वाली एक स्वास्थ्य स्थिति है, जिसका वर्तमान में कोई इलाज नहीं है। हालांकि, इस विकार से जुड़ी कई स्वास्थ्य स्थितियों और लक्षणों को सही उपचार, थेरेपी, शिक्षा और सहायता से प्रबंधित किया जा सकता है। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोग दूसरे लोगों की तरह ही मजबूत रिश्ते रख सकते हैं, स्कूल या काम पर जा सकते हैं और आम लोगों की ही तरह हेल्दी जीवन जी सकते हैं।

जटिलताएं

अगर इस स्थिति को बिना उपचार के छोड़ दिया जाए या फिर सही मदद न मिले तो रोग के निम्नलिखित परिणाम हो सकते हैंः

1-सोच, तर्क और याददाश्त में कमी
2-आत्मघाती विचार
3-डिप्रेशन
4-काम करने में असमर्थता के कारण वित्तीय समस्याएं
4-रिश्ते-नाते खत्म हो जाना कनेक्शन खोना
5-एकांत में रहना
6-आक्रामक व्यवहार

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