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14 साल की उम्र तक सिकल सेल के 12 प्रतिशत मरीजों की हो जाती है मौत
जन्मजात बीमारी सिकल सेल के 12 प्रतिशत मरीजों की 14 साल की उम्र तक मौत हो जाती है।
राजीव उपाध्याय, जबलपुर। जन्मजात बीमारी सिकल सेल के 12 प्रतिशत मरीजों की 14 साल की उम्र तक मौत हो जाती है। प्रदेश में अनुसूचित जाति में सिकल सेल एनीमिया के 48 प्रतिशत मामले हैं, जबकि सामान्य वर्ग में केवल 10 प्रतिशत मामले हैं। इसके बाद भी मप्र के सरकारी अस्पतालों में सिकल सेल क्लीनिक ही नहीं हैं। जबकि महाराष्ट्र, गुजरात और ओडिशा में क्लीनिक हैं।
यह जानकारी इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की 30वीं वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक में वैज्ञानिकों ने दी। आईसीएमएआर के जबलपुर स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन ट्राइबल हेल्थ (एनआईआरटीएच) में गुरुवार को वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक हुई। वैज्ञानिकों ने आदिवासी क्षेत्र में मलेरिया, कुपोषण से हाइपरटेंशन व अन्य बीमारियों के बारे में अपने शोध प्रस्तुत किए, जिन पर आईसीएमआर दिल्ली व अन्य महानगरों से आए वैज्ञानिकों ने विचार-विमर्श किया।
प्रदेश में सिकल सेल की दवाएं नहीं
एनआईआरटीएच के वैज्ञानिक डॉ. राजीव यादव ने अपने शोध के बारे में बताया कि मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों में सिकल सेल के लिए उपयोग की जाने वाली हायड्रॉक्सी यूरिया दवा ही नहीं है। इसकी नियमित आपूर्ति नहीं हो रही है। गरीब इस बीमारी से अधिक पीड़ित हैं। इसका एक स्ट्रिप 140 रुपए का बाजार में मिलता है। इस कैप्सूल को लेने से मरीज को खून चढ़ाने की दर कम हो जाती है। प्रदेश में बड़वानी, मंदसौर, शहडोल, मंडला, रीवा में सिकल सेल डिस्पेंसरी खोली गई थीं, लेकिन वहां न दवाएं हैं और न ही उपकरण।
यह है सिकल सेल बीमारी
एक ही रिश्ते में शादी होने पर पैदा होने वाले बच्चों में जन्मजात ये बीमारी आने की आशंका रहती है। इसमें बच्चा सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित हो जाता है। इसमें लाल रक्त कण हंसिये का आकार ले लेते हैं। इससे खून में लाल रक्त कण की कमी होने लगती है और मरीज की मौत हो जाती है।
लक्षण
कमजोरी, बुखार, वजन कम होना, खून की कमी से पैदा होने वाले दुष्प्रभाव
ये है पीड़ितों की स्थिति
अनुसूचित जाति- 48 प्रतिशत
अनुसूचित जनजाति- 14 प्रतिशत
ओबीसी- 27.4 प्रतिशत
सामान्य वर्ग- 10 प्रतिशत
शासन की सूची में ये आदिवासी समस्या नहीं
प्रदेश सरकार ने सिकल सेल को आदिवासियों की बीमारी में शामिल नहीं किया है। इससे इस बीमारी में आदिवासियों को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। जबकि मप्र में सिकल सेल एनीमिया बड़ी बीमारी है।
एक मरीज पर 10000 का खर्च
सिकल सेल की बीमारी में नीमोकोकल, मेनिंगोकोकल और हिब वैक्सीन लगने चाहिए, लेकिन प्रदेश सरकार ने इसे सरकारी अस्पतालों में शुरू नहीं किया है। यदि ये टीके लगवाए जाएं तो प्रति मरीज 15 हजार रुपए प्रति वर्ष खर्च शासन पर आता है। इसके लिए प्रदेश में कोई योजना नहीं है।
इनका कहना है
सिकल सेल एनीमिया बीमारी के लिए मरीजों को दवाएं चाहिए। इसके लिए हम कंपनियों से भी चर्चा करते हैं। वे भी इसमें सहयोग करेंगी।
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