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लिवर कैंसर के लक्षण, कारण, उपचार और इलाज

भारत में हर १ लाख लोगों में से ३ से ५ लोगों को लिवर कैंसर होने की संभावना रहती है। इसका अर्थ है हर साल लिवर कैंसर के ३०,००० से ५०,००० नए मामले आते हैं। आमतौर पर लिवर कैंसर के शुरुआती लक्षण और संकेत दिखाई नहीं देते जिस वजह से लिवर की स्थिति खराब होती जाती है और हमें पता भी नही चल पाता है। यदि समय पर लिवर कैंसर का इलाज नहीं किया जाए तो यह जानलेवा भी हो सकता है।

ऐसे में यह काफी जरुरी हो जाता हैं कि आपको लिवर कैंसर के लक्षण और उपाय के बारे में पता हो। तो आइये, इस आर्टिकल में लिवर कैंसर के लक्षण और इसके इलाज के बारे में विस्तार से जानते हैं।
लिवर क्या है?

लिवर हमारे शरीर का महत्वपूर्ण भाग है जो पेट के ऊपरी दाएं हिस्से में और डायाफ्राम के नीचे स्थित होता है। लिवर खून में मौजूद अधिकांश रासायनिक तत्वों को नियंत्रित करता है। इसके अलावा लिवर हमारे शरीर से जहरीले तत्वों (टॉक्सिक) को बाहर निकालने में सहायता करता है। लिवर विटामिन और वसा (चर्बी) जैसे अन्य पोषक तत्वों को पचाने में और पित्त के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाता है। लिवर शरीर को इंफेक्शन से लड़ने और फैट को पचाने का काम करता है। इसके अलावा लिवर कार्बोहाइड्रेट को स्टोर करने में काफ़ी सहायता करता है। इसलिए अगर लिवर स्वस्थ रहता है और ठीक से काम करता है तो हम स्वस्थ रहते हैं।
लिवर कैंसर क्या है

आमतौर पर ४० साल की उम्र के लोगों में लिवर कैंसर होने की संभावना युवाओं की तुलना में अधिक रहती है। लिवर कैंसर को कई बार हेपेटिक कैंसर के नाम से भी जाना जाता है। लिवर कैंसर हमारे लिवर की कोशिकाओं में शुरू होता है और धीरे-धीरे फैलने लगता है। जब कैंसर की कोशिकाएं जिगर से उसके आस पास की कोशिकाएं और अन्य अंगों में फैलने लगती है जहा लिवर की अन्य गतिविधियों में भी हस्तक्षेप करने लगती हैं तब लिवर कैंसर घातक हो सकता है और इस चरण को मेटास्टेसाइज कहते है। शुरुआत में लिवर कैंसर के कोई ख़ास लक्षण दिखाई नहीं देते हैं लेकिन जैसे-जैसे लिवर कैंसर बढ़ने लगता है, वैसे-वैसे इसके लक्षण महसूस होना शुरू हो जाते हैं। लिवर कैंसर के अधिकतर मामलों में मूल कारण का नहीं पता चल पाता है। कुछ मामलों में हेपेटाइटिस का इन्फेक्शन इसका मुख्य कारण हो सकता है।
लिवर कैंसर के लक्षण क्या हैं?

ज़्यादातर मरीज़ों को लिवर कैंसर की शुरुआत में कोई विशेष लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे लिवर कैंसर की स्थिति समय के साथ बिगड़ने लगती है वैसे-वैसे इसके लक्षण महसूस होने लगते हैं। लिवर कैंसर के प्रमुख लक्षण निम्न लिखित हैं:

वजन कम होना
भूख कम लगना
पेट के ऊपरी भाग में दर्द होना
कमजोरी और थकान आना
पीलिया होना (आंखों और त्वचा के सफ़ेद भाग का पीलापन)
मल सफेद होना
वजन कम होना
उल्टी होना
जी मिचलाना
बुखार आना
खुजली होना
हेपटेमेगाली
पेट में सूजन होना
पैरों में सूजन होना
दाहिने कंधे की ब्लेड में या ब्लेड के आस-पास दर्द होना


लिवर कैंसर कितने प्रकार का होता है?

वैसे तो लिवर कैंसर के कई प्रकार होते हैं लेकिन लिवर कैंसर के मुख्य रूप से दो प्रकार होते हैं। पहला प्राइमरी लिवर कैंसर और दूसरा सेकेंडरी लिवर कैंसर।

प्राइमरी लिवर कैंसर

प्राइमरी लिवर कैंसर में कैंसर की कोशिकाएं लिवर से ही विकसित होना शुरू करती हैं और अन्य ऊतकों और अंगों तक फैल जाती हैं। प्राइमरी लिवर कैंसर में भी कई प्रकार होते हैं जो निम्न हैं :

हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा: आमतौर पर ७५% लिवर कैंसर हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा पर आधारित होते हैं। यह हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी से संबंधित इंफेक्शन के कारण होता है।
फ़िब्रोलामेलर हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा: यह दुर्लभ प्रकार का लिवर कैंसर है, जो आमतौर पर मेडिकल ट्रीटमेंट से होता है।
कोलेजनोकार्सिनोमा: लिवर कैंसर का यह प्रकार लिवर के पित्त नलिका में हो सकता है। आमतौर पर मरीजों में लिवर कैंसर के १० से २०% मामलों में होता है।
एंजियोसारकोमा: यह लिवर में रक्त वाहिकाओं (ब्लड वेसल्स) से शुरू होता है और तेजी से बढ़ता है। आमतौर पर १% लिवर कैंसर के मामले एंजियोसारकोमा के होते हैं।

सेकेंडरी लिवर कैंसर या मेटास्टेटिक लिवर कैंसर

सेकंडरी लिवर कैंसर में कैंसर की कोशिकाओं का विकास किसी अन्य अंग में शुरू होता है और ये फैलकर लिवर तक पहुंच जाती हैं और लिवर को प्रभावित करती हैं, इसे मेटास्टेटिक लिवर कैंसर के नाम से भी जाना जाता है।
लिवर कैंसर होने के कारण क्या हैं?

ज़्यादातर मामलों में लिवर कैंसर होने के कारण स्पष्ट नहीं होते हैं। कुछ मामलों में लिवर कैंसर होने का कारण पता लगाया जा सकता है जैसे लिवर कैंसर का एक कारण क्रोनिक हेपेटाइटिस संक्रमण भी हो सकता है।

आमतौर पर लिवर कैंसर के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:

आनुवंशिकी: यदि आपके परिवार में किसी सदस्य को लिवर की बीमारी है या इसका इतिहास है तो लिवर कैंसर के विकास की संभावना बढ़ जाती है।
सिरोसिस: इस में जिगर की कोशिकाएं बड़े पैमाने में नष्ट हो जाती है। लिवर सिरोसिस अक्सर शराब के अधिक सेवन करने से होता है। हालांकि यह अन्य कारणों से भी हो सकता है लेकिन शराब सिरोसिस होने का मुख्य कारण है।
मधुमेह का होना: मधुमेह से ग्रस्त मरीज़ों को भी लिवर कैंसर होने का खतरा होता है।
फैटी लिवर का होना।
अधिक मोटापा: व्यक्ति के शरीर का वजन बहुत ज़्यादा बढ़ जाना भी लिवर कैंसर का कारण बन सकता है।
जन्मजात: जन्म से ही किसी व्यक्ति को स्वास्थ्य समस्या या किसी अन्य दोष होने के कारण भी लिवर कैंसर हो सकता है।
लंबे समय से इन्फेक्शन: हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी विषाणु से जुड़े पुराने इन्फेक्शन की वजह से रोगियों को लिवर का कैंसर होने की संभावना रहती है।
रासायनिक पदार्थ: आर्सेनिक और विनाइल क्लोराइड जैसे रासायनिक पदार्थों का सेवन करना।
दुर्लभ बीमारियां: कुछ मामलों में लिवर कैंसर के विकास को टायरोसिन (आनुवंशिक विकार जो लिवर के काम में बांधा डालता है) और विल्सन बिमारी ( जन्मजात बीमारी जिसमे लिवर, मस्तिष्क और अन्य महत्वपूर्ण अंगों में कॉपर जमा हो जाता है) से जोड़ा गया है। ऐसे दुर्लभ बीमारियां भी लिवर कैंसर का कारण बन सकती हैं।
अधिक मात्रा में शराब का सेवन और धूम्रपान करने से लिवर कैंसर हो सकता है।

लिवर कैंसर का निदान

लिवर कैंसर का निदान करने के लिए, आपके डॉक्टर आपसे आपकी मेडिकल हिस्ट्री के बारे में पूछेंगे और आपके शारीरिक की जांच करेंगे। यदि आप शराब का सेवन करते है या आपको पहले कभी हेपेटाइटिस बी या सी संक्रमण हुआ है? तो इस बारे में डॉक्टर को जरूर बताइए। लिवर कैंसर के निदान परीक्षण और प्रक्रिया में निम्नलिखित टेस्ट शामिल हैं:

लिवर फंक्शन टेस्ट: इस टेस्ट से आपके डॉक्टर को आपके खून में प्रोटीन, लिवर एंजाइम और बिलीरुबिन के स्तर का पता लगता है।
अल्फा-फेटो प्रोटीन टेस्ट: आपके रक्त में अल्फा-फेटो प्रोटीन की उपस्थिति लिवर कैंसर का संकेत हो सकती है। यह प्रोटीन आमतौर पर केवल एक विकासशील भ्रूण के लिवर और जर्दी थैली में उत्पन्न होता है। अल्फा-फेटो प्रोटीन का उत्पादन आमतौर पर जन्म के बाद बंद हो जाता है।
इमेजिंग टेस्ट: अल्ट्रा साउंड, सीटी स्कैन या एमआरआई स्कैन टेस्ट से आपके पेट में लिवर और अन्य अंगों की स्पष्ट तस्वीर तैयार की जाती है। इन तस्वीरों से आपके डॉक्टर को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि ट्यूमर कहां विकसित हो रहा है, इसका आकार कितना है और कैंसर अन्य अंगों में फैल गया है या नहीं।
लिवर बायोप्सी: यदि लिवर फंक्शन टेस्ट, अल्फा-फेटो प्रोटीन टेस्ट और इमेजिंग टेस्ट करने पर भी लिवर कैंसर की स्थिति का सही कारण नहीं पता चल रहा तब आपके डॉक्टर लिवर बायोप्सी कर सकते हैं। लिवर बायोप्सी में डॉक्टर लिवर के ऊतकों का एक छोटा सा टुकड़ा निकालते है और परीक्षण करते हैं। अक्सर लिवर बायोप्सी करने से पहले मरीज को लोकल एनेस्थीसिया दी जाती है जिससे मरीज को दर्द नहीं होता है।

लिवर कैंसर का इलाज

लिवर कैंसर के उपचार के लिए कई विकल्प उपलब्ध हैं। उपचार की प्रक्रिया तय करने के लिए आपके डॉक्टर निम्नलिखित कारकों पर विचार करेंगे और इसके आधार पर इलाज की प्रक्रिया निर्धारित की जाएगी:

आपके लिवर में ट्यूमर की संख्या, आकार और स्थान?
आपका लिवर कितनी अच्छी तरह काम कर रहा है?
सिरोसिस मौजूद है या नहीं?
कैंसर अन्य अंगों में फैल गया है या नहीं?

आमतौर पर लिवर कैंसर का इलाज ५ निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है :

सर्जरी: लिवर कैंसर में सर्जरी से इलाज किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में कैंसर वाले हिस्से को निकाल देते हैं। यदि मरीज के लिवर में छोटा ट्यूमर बना है तो इसका सर्जरी से इलाज किया जा सकता है।
लिवर ट्रांसप्लांट: ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कैंसर वाले लिवर को हटाकर उस जगह स्वस्थ लिवर से बदल देते है। लेकिन लिवर ट्रांसप्लांट इलाज़ तब ही संभव है जब कैंसर किसी और अंग (ऑर्गन) में न फैला हो।
एबलेशन: इस प्रकिया में मरीज को बेहोश कर कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए इंजेक्शन दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया उन मरीज़ों के लिए अधिक फायदेमंद होती है जिनकी सर्जरी या लिवर ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता है।
रेडिएशन थेरेपी: रेडिएशन थेरेपी में हार्ट एनर्जी वाले रेडिएशन का इस्तेमाल करते हैं जिससे कैंसर ग्रस्त कोशिकाएं को नष्ट करने का प्रयास किया जाता है। रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स ज्यादा हो सकते हैं जिस वजह से त्वचा की समस्या और उल्टी की समस्या हो सकती है।
कीमोथेरेपी: कीमोथेरेपी का इस्तेमाल भी कैंसर से ग्रस्त कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए किया जाता है। यह दवाओं के माध्यम से दी जाती है। लिवर कैंसर में कीमोथेरेपी काफी प्रभावी उपचार है। परंतु इसकी दवाओं के वजह से मरीज को उल्टी, हेयर लॉस, भूख कम लगना, ठंड लगना, शरीर में दर्द होना और शरीर में गर्मी काफी ज्यादा बढ़ जाना आदि समस्याओं का सामना मरीज को करना पड़ सकता है।


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