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पीरियड्स प्रॉब्लम और मिसकैरेज की वजह हो सकती है रसौली, ये है आसान इलाज

बदली हुई लाइफस्टाइल और हॉर्मोन्स डिसबैलंस के कारण महिलाएं कई तरह की हेल्थ संबंधी समस्याओं से जूझ रही हैं। रसौली भी एक ऐसी ही समस्या है, जो महिलाओं में बिगड़े हुए हॉर्मोन्स के कारण होती है और उन्हें हेल्थ संबंधी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। रसौली को फाइब्रॉइड्स, यूट्रस सिस्ट, बच्चेदानी की गांठ के नाम से भी जाना जाता है।
रसौली क्या है?

रसौली या फाइब्रॉड्स एक तरह की गांठ होती है, जो यूट्रस या बच्चेदानी में फाइब्रस टिश्यूज से बनती है। महिलाओं का यूट्रस तीन भागों में बंटा होता है और यह यूट्रस के किसी भी हिस्से में हो सकती है। इसका साइज भी अलग-अलग हो सकता है। रसौली स्टोन्स से अलग होती है और यह केवल महिलाओं की सेहत से जुड़ी समस्या है।

क्या-क्या परेशानी होती है?

रसौली के कारण महिलाओं को प्रेग्नेंसी में समस्या आती है और पीरियड्स के दौरान हेवी ब्लीडिंग या बहुत अधिक दर्द सहन करना पड़ सकता है। कई बार महिलाओं को बार-बार मिसकैरेज भी झेलना पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि महिलाएं अपनी सेहत से जुड़ी इन समस्याओं के प्रति जागरूक रहें। खासतौर पर पीरियड्स के दौरान होनेवाली ब्लीडिंग और अनियमितता को हल्के में ना लें।

क्यों होती है रसौली?

आमतौर पर हॉर्मोनल डिसबैलंस के कारण यूट्रस में रसौली बनती है लेकिन सेहत संबंधी अन्य समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं। हॉर्मोन्स बिगड़ने की वजह हर किसी के साथ अलग-अलग हो सकती है। कभी लाइफस्टाइल और खान-पान के कारण तो कभी किसी दवाई के साइडइफेक्ट के कारण। लेकिन रसौली की समस्या हेरिडिटी की वजह से अधिक देखने को मिलती है।

रसौली के लक्षण

-रसौली के कारण पीरियड्स के समय क्लोटिंग बहुत अधिक बढ़ सकती है। यानी ब्लीडिंग के साथ रक्त के थक्के आना।

- पेट के निचले हिस्से में बहुत अधिक दर्द होना और ब्लीडिंग अधिक होना।

-पेट के निचले हिस्से में भारीपन लगना और इंटरकोर्स के वक्त दर्द होना।

- बार-बार यूरिन पास होना और वजाइना से बदबूदार डिस्चार्ज होना।

-हर समय वीकनेस रहना, पैरों में दर्द होना और कब्ज की शिकायत रहना।

किस उम्र में रहता है अधिक रिस्क?

लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉक्टर सोनिया चावला का कहना है कि रसौली की समस्या हॉर्मोन्स से संबंधित होती है। रसौली की समस्या 16 से 50 साल की उम्र में देखने को मिलती है। इस कारण महिलाओं को मिसकैरेज या प्रिग्नेंसी ना होने जैसी समस्याएं होती हैं। अगर किसी पेशेंट की उम्र मेनॉपॉज के पास होती है तो हम उसे सर्जरी सजेस्ट नहीं करते। बल्कि दवाइयों से ही उनकी बीमारी को कंट्रोल करते हैं। क्योंकि मेनॉपॉज के बाद फाइब्रॉइड्स के टिश्यूज की ग्रोथ खुद-ब-खुद बंद हो जाती है।

नहीं है यूट्रस निकलवाने की जरूरत

कुछ साल पहले तक रसौली का एकमात्र इलाज यूट्रस निकालने को माना जाता था। लेकिन अब ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। पेशंट की कंडीशन और रसौली के साइज के आधार पर एक्सपर्ट्स ट्रीटमेंट देते हैं। कई बार सिर्फ दवाइयों से भी इस समस्या को खत्म किया जा सकता है। वहीं ऑपरेट करने की स्थिति में भी यूट्रस निकालने की जरूरत नहीं है। क्योंकि लेप्रोस्कोपी के जरिए बहुत छोटे-छोटे कट्स लगाकर भी रसौली को निकाला जा सकता है।

मिल सकती है मां बनने की खुशी

आज भी हमारे देश में लोगों के बीच ना केवल मेडिकल फैसिलिटीज को लेकर जागरुकता की कमी है बल्कि हेल्थ से जुड़ी बहुत सारी बातें उन्हें पता ही नहीं होती। इस कारण सबसे अधिक शारीरिक और मानसिक दर्द महिलाओं को सहन करना पड़ता है। खासतौर पर गांव और कस्बों में। लेप्रोस्कोपी से लाखों महिलाओं की प्रेग्नेंसी से संबंधित समस्या दूर हो सकती है और वे मां बनने की खुशी पा सकती हैं। लेकिन इसके लिए जरूरत है जागरूकता की।

कंफर्ट का मैच नहीं

लेप्रोस्कोपी और ओपन सर्जरी के बारे में बात करते हुए डॉक्टर सोनिया कहती हैं कि ओपन सर्जरी के बाद जहां पेशंट्स को 3 से 4 दिन हॉस्पिटल में रहना पड़ता था वहीं लेप्रोस्कोपी के बाद मात्र एक दिन में आपको डिसचार्ज कर दिया जाता है। साथ ही पेशंट को चलने, वॉशरूम जाने के लिए लंबे समय तक किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती है। वे अपने सभी काम आराम से कर सकते हैं, यहां तक कि सीढ़ियां चढ़ना भी।

खर्च में नहीं है बहुत अंतर

एक्सपर्ट्स का कहना है कि लेप्रोस्कोपी और ओपन सर्जरी की अगर तुलना की जाए तो यह बिल्कुल भी महंगी नहीं पड़ती है। क्योंकि जितना खर्च पेशंट को ओपन सर्जरी के बाद पेशंट के हॉस्पिट स्टे और अटेंडेंट के खर्च पर आता है, लगभग उतने में ही लेप्रोस्कोपी के बाद पेशंट पूरी तरह ठीक होकर दिन बाद ही घर जा सकता है। ऐसे में उस पर होनेवाले बाकी खर्च बच जाते हैं।

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