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प्रसव के बाद देखभाल : इन बातों का हर मां को रखना चाहिए ध्यान

“चाइल्ड बर्थ के पहले छह सप्ताह प्रसवोत्तर अवधि (Postpartum period) होती है। इस पीरियड को सेंसिटिव माना जाता है। गर्भावस्था और डिलिवरी के बाद महिलाओं में नींद की कमी, हार्मोनल चेंजेस, बॉडी शेप बदलना आदि देखने को मिलता है। इसलिए प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के लिए महिलाओं को सवा महीने तक आराम करने के लिए कहा जाता है।” ये कहना है डॉ मालती पांडेय (गायनोकोलॉजिस्ट, जयती क्लिनिक, लखनऊ) का। उन्होंने “हैलो स्वास्थ्य” से बात करते हुए ये जानकारी दी।

शिशु के जन्म के बाद, महिला की देखभाल के लिए उत्तर भारत में एक परम्परा के अनुसार गोंद के लड्डू (जिसमें कई तरह के नट्स, देशी घी आदि मिला होता है) खिलाएं जाते हैं। ये मां और शिशु दोनों के लिए फायदेमंद होते हैं। इसी तरह और भी कुछ हेल्दी टिप्स हैं जो डिलिवरी के बाद महिला को अपनाने चाहिए, चाहे फिर वह नार्मल डिलिवरी (Normal Delivery) हो या सी-सेक्शन (सिजेरियन)। लेकिन इस जानकारी से पहले जान लेते हैं एक मां के लिए देखभाल का क्या महत्व है।
नयी मां के लिए प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) की जरूरत क्यों होती है?
प्रसव के बाद क़रीब छह महीने के समय को पोस्टपार्टम पीरियड (Postpartum period) कहा जाता है। ये मां के शरीर का प्रसव के बाद रिकवरी फ़ेज़ माना जाता है। इस दौरान नयी मां को देखभाल की जरूरत होती है, क्योंकि प्रसव के बाद इस दौरान शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं। इस दौरान मां को अपने बच्चे को फ़ीड कराना होता है, साथ ही साथ प्रसव के दौरान आए बदलावों की भी रिकवरी हो रही होती है। सिलिए नयी मां के खानपान से लेकर, सोते-उठने और काम करने को लेकर भी कई तरह की सावधानियां बरतनी पड़ती है। यदि प्रसव के बाद के समय में ये सभी सावधानियां ध्यान से रखी जाएं, तो मां और बच्चा दोनों सुरक्षित रहते हैं।


इस दौरान नयी मां को शारीरिक और खास तौर पर मानसिक रूप से सपोर्ट की जरूरत होती है, इसलिए इस दौरान घर के सभी सदस्यों को मां की देखभाल करने की जरूरत होती है।

प्रसव के बाद परेशानियों (Post delivery Problems) में मां को क्या-क्या तकलीफ हो सकती है?


डिलीवरी के बाद महिलाओं को कई तरह की शारीरिक परेशानियों से गुज़रना पड़ता है। महिला की भले ही नॉर्मल डिलीवरी हुई या सीजेरियन (Cesarean), उसके शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं और ये बदलाव अपने साथ परेशनियां भी लाते हैं। इन तकलीफ़ों में कुछ तकलीफेन शारीरिक होती हैं, तो कुछ मानसिक। लेकिन दोनों ही तरह से नयी मां को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इन तकलीफ़ों में ये समस्याएं मुख्य रूप से देखी जाती है –


डिलीवरी के बाद तनाव (Postpartum depression)
वजायनल इंजरी (योनि का छिलना)
डिलीवरी के बाद योनि में सूखापन
वजायनल इंफ़ेक्शन (योनि का संक्रमण)
पोस्ट डिलीवरी ब्लीडिंग (Post delivery bleeding)
इर्रेग्यूलर पीरियड्स (अनियमित माहवारी)
वज़न में बदलाव (वज़न का बढ़ना)
स्तनों की समस्या (स्तनों में ढीलापन)



ये सभी परेशनियां मुख्य रूप से नयी मां को तकलीफ़ दे सकती हैं। लेकिन इसके अलावा और भी कुछ समस्याएं, जिसे महिलाएं इतनी तवज्जो नहीं देती, लेकिन इसे नज़रंदाज़ करना उन्हें भारी पड़ सकता है। इन समस्याओं में –


डिलीवरी के बाद पीठ दर्द (Back pain)
पैरों में सूजन
डिलीवरी के बाद कब्ज (Constipation)
त्वचा संबंधी समस्याएं (स्ट्रेच मार्क्स)
बालों की समस्याएं (बालों का झड़ना)



ये भी कुछ समस्याएं हैं, जो महिलाओं को भुगतनी पड़ सकती है। इसलिए सही देखभाल के ज़रिए और सही खान-पान के साथ पूरा आराम कर इन समस्याओं से निजात मिल सकता है। आइए अब बात करते हैं नयी मां के लिए देखभाल से जुड़ी टिप्स की।

फूड क्रेविंग (Food Craving)


इस बारे में शहानी हॉस्पिटल की डायरेक्टर की डाॅक्टर संतोष शहानी का कहना है कि गर्भवती महिला के लिए उचित पोषण (Balance diet) लेना बहुत जरूरी है। केवल खुद के लिए ही नहीं, बल्कि शिशु के अच्छे स्वास्थ के लिए भी जरूरी है। उचित पोषण सेफ बाथ् सर्वोत्तम तरीकों में से एक है। प्रेग्नेसी के दौरान जेस्टेशनल डायबिटीज (Gestational diabetes) से बचने के लिए जरूरी है कि आप चीनी का सेवन कम करते हुए भरपूर मात्रा में प्रोटीन और सब्जियां को अपने प्लेट में शामिल करें।

प्रेग्नेंसी पीरियड (Pregnancy period) में ध्यान रखें इन बातों का


गर्भावस्था में महिला को अपना पूरा-पूरा ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है। जिससे मां और उसके गर्भ में पल रहे बच्चे की पूरी तरह देखभाल की जा सके। आइए जानते हैं उन बातों के बारे में, जो एक गर्भवती को ज़रूर ध्यान रखनी चाहिए।


गर्भावस्था में फोलिक एसिड की पर्याप्त मात्रा लेना बहुत जरूरी है। फोलिक एसिड (folic acid) बच्चे को कई परेशानियों से बचा सकता है। यह बच्चे के ब्रेन और स्पाइनल कॉर्ड को विकसित करने में मदद कर सकता है।
गर्भावस्था में फलों का सेवन बहुत जरूरी है लेकिन, कोई भी फल खाने से पहले यह जरूर ध्यान रखें कि फल अच्छी तरह से धुले हुए हों। इससे संक्रमण का खतरा कम हो सकता है।
प्रेग्नेंसी के दौरान कच्चे मांस और कच्चे अंडे के सेवन से भी पहरेज करना चाहिए। क्योंकि इनमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया (Harmful bacteria) गर्भ में पल रहे शिशु की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
गर्भावस्था में एल्कोहॉल (Alcohol) और सिगरेट का सेवन न करें। शराब गर्भनाल के माध्यम से बच्चे के खून में प्रवेश करके शारीरिक और मानसिक विकास में कई तरह की बाधाएं पैदा कर सकती है। सिगरेट पीने वालों और स्मोकिंग जोन से भी दूर रहें।
गर्भावस्था के दौरान 11 से 16 किलो तक वजन बढ़ना लाजमी है। इसलिए डायटिंग न करें। एक्सपर्ट्स के अनुसार इस दौरान शरीर में आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन्स और कई तरह के खनिजों और पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। इसलिए पौष्टिक आहार का सेवन करना जरूरी है। डॉक्टर से सलाह लेकर डायट का ध्यान रखा जा सकता है।
प्रेग्नेंसी के दौरान किसी खास चीज को खाने मन होने लगता है। ऐसे में किसी एक ही चीज को बार-बार खाने के बजाए बाकी चीजों को भी खाने में शामिल करना चाहिए। इससे स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा।
गर्भावस्था के दौरान जंक फूड (Junk Food) खाने से परहेज करना ही बेहतर होगा। जंक फूड में फैट की मात्रा ज्यादा होती है, जिसकी वजह से कोलेस्ट्रॉल बढ़ने का खतरा हो सकता है।
इस दौरान अगर फीवर (बुखार) होता है तो जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करें। फीवर होने की वजह से गर्भ में पल रहे शिशु पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
गर्भावस्था के दौरान तनाव भी गर्भ में पल रहे शिशु के लिए हानिकारक हो सकता है। गर्भावस्था की शुरुआत में कई कारणों के चलते महिलाएं तनाव में रहने लगती हैं, जिसका बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए गर्भावस्था में मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करना बहुत जरूरी है।
इस दौरान ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना खाने से परहेज़ करना चाहिए। इससे गैस और पेट में जलन (Stomach Irritation) हो सकती है। साथ ही ये कब्ज की समस्या को भी बढ़ा सकता है।



इस तरह प्रेग्नेंसी के दौरान इन खास बातों को ध्यान में रख कर अपनी और बच्चे की सेहत को बेहतर बनाया जा सकता है। आइए अब जानते हैं प्रसव के बाद आपको किन बातों का ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है।

प्रसव के बाद देखभाल (Postpartum care) में अपनाएं ये टिप्स


हर मां को प्रसव के बाद भावनात्मक और शारीरिक सपोर्ट की जरूरत पड़ती हैं, जिसके बारे में घर के अन्य सदस्यों को ज़रूर ध्यान देना चाहिए। आइए जानते है वो कौन सी टिप्स है, जिसे हर नयी मां को फ़ॉलो करना चाहिए।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care): आराम दें खुद को


नवजात शिशु कई बार रात में ब्रेस्टफीडिंग करते हैं, इसलिए मां की नींद भी पूरी नहीं हो पाती है। नींद पूरी हो सके इसके लिए जब भी समय मिले, लेट जाएं। भले ही इस दौरान नींद न आए लेकिन, आंखें बंद करके आराम करने से शरीर को आराम मिलेगा और आप रिफ्रेश फील करेंगी। डिलिवरी के बाद कुछ महिलाएं नींद की कमी महसूस करती हैं, ऐसे में अपना मनपसंद म्यूजिक सुनें। नींद आने में मदद मिलेगी। डॉक्टर की सलाह से पोस्टपार्टम व्यायाम करना शुरू कर सकती हैं। इससे नींद न आने की समस्या कम होगी। जब भी शिशु दूध पीकर सो जाए, आप भी थोड़ी देर सोने की कोशिश करें।

प्रेग्नेंसी के बाद देखभाल के लिए मां को क्या खाना चाहिए?
प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के लिए नई मां को आराम करने के अलावा स्वस्थ और संतुलित आहार की जरूरत होती है। यूएसडीए (USDA) और अमेरिका के स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग के द्वारा बनाई गई | MyPlate | (माय प्लेट) नुट्रिशन गाइड के हिसाब से प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान महिला को ये पांच चीजें अपनी थाली में शामिल करनी ही चाहिए।

प्रसव के बाद देखभाल

अनाज (grains)
गेहूं, चावल, जई, कॉर्नमील, जौ या अन्य अनाज से बने खाद्य उत्पाद। जैसे-ब्राउन राइस और दलिया।

सब्जियां (vegetables)


प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के लिए मां अपनी डायट में गहरे हरे, लाल और ऑरेंज रंग की सब्जियां, फलियां (मटर और बीन्स), और स्टार्च वाली सब्जियां शामिल करें।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान करें फलों (Fruits) का सेवन

डायट में ताजे फल और फलों का जूस शामिल करें। विटामिन सी युक्त फल जैसे-संतरे, मौसमी आदि खाएं। इसके साथ ही चुकंदर, गाजर खाने से भी आपको अच्छे परिणाम मिलेंगे। इसके साथ ही बादाम, अखरोट जैसे ड्रायफ्रूट्स को भी अपनी डायट में शामिल करें। ये विटामिन और मिनरल्स के अच्छे सोर्स हैं।

डेयरी प्रोडक्ट्स (Dairy Products)


दूध और दूध से बने कई खाद्य पदार्थ आहार में शामिल करें। फैट फ्री या कम वसा वाले डेयरी प्रोडक्ट्स पर ध्यान दें, जिनमें कैल्शियम ज्यादा हो।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान खाने में शामिल करें प्रोटीन


चाइल्ड बर्थ के बाद मां को देखभाल के लिए अपने आहार में ज्यादा से ज्यादा प्रोटीन शामिल करना चाहिए। लो-फैट या लीन मीट के साथ ही नट्स, बीन्स और फलियों का सेवन करें।

प्रसव के बाद क्या न खाएं?


गैस बनाने वाली चीजें जैसे गोभी आदि न खाएं।
खट्टी चीजें न खाएं, इससे शिशु को अपच की समस्या हो सकती है।
मसालेदार व तला हुआ खाना न खाएं।
कॉफी व चॉकलेट कम खाएं।
शराब या सिगरेट का सेवन बिलकुल न करें।
बाहर का खाना अवॉयड करें।
कार्बोनेट पेय पदार्थाें को अवॉयड करें।

चाइल्ड बर्थ (Child birth) के बाद पानी पीना कितना जरूरी है?

स्तनपान कराने वाली महिलाओं को डिहाइड्रेशन का खतरा रहता है। प्रसव के बाद शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए पर्याप्त पानी पिएं। इसके अलावा खुद को हायड्रेट रखने के लिए नारियल पानी, जूस आदि का भी सेवन कर सकती हैं।

डिलिवरी के बाद खुद की देखभाल के लिए कराएं रेग्युलर चेकअप (Regular checkup)


सही खाद्य पदार्थों के सेवन के साथ ही नई मां रेग्युलर चेकअप करवाने की भी आदत डालें। समय-समय पर चेकअप जरूर करवाएं ताकि हर समस्या का समाधान शुरुआती स्टेज में ही किया जा सके।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) करने के दौरान पेट के घाव की देखभाल कैसे करें?


अगर बच्चे की डिलिवरी सी सेक्शन से हुई होगी, तो मां को प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। जब तक टांकें लगे होंगे, तब तक आपको सारी गतिविधियां आपके डॉक्टर द्वारा बताए गए निर्देशों पर ही करना होगा। हालांकि, टांके खुलने के बाद अगर टांके वाली त्वचा में कोई दरार या संक्रमण के लक्षण दिखाई दें, तो इसकी जानकारी अपने डॉक्टर को दें और स्नान न करें। लेकिन, अगर टांके हटने के बाद सब सामान्य है तो आप पहले की तरह स्नान कर सकते हैं। हालांकि, कुछ दिनों तक शॉवर में न नहाएं।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान शारीरिक संबंध बनाने के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान आपको कम से कम छह महीने कर संभोग नहीं करना चाहिए। क्योंकि, प्रसव के बाद महिला की योनि से ब्लीडिंग होती रहती है या फिर उसमें ड्राईनेस की समस्या हो सकती है। साथ ही, हल्का दर्द भी होता रहता है। ऐसे में शारीरिक संबंध बनाने के दौरान महिला साथी को अधिक दर्द और असहज महसूस हो सकता है। इसलिए प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) के दौरान शारीरिक संबंध के दौरान अधिक जोर न दें न ही अधिक समय तक इसे जारी रखें।

प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) करने के दौरान किन स्थितियों में डॉक्टर से तुरंत चिकित्सा प्राप्त करनी चाहिए?


प्रसव के बाद देखभाल (Postnatal care) करने के दौरान मां को निम्न स्थितियों के लक्षण होने पर आपातकालीन चिकित्सा जाना चाहिएः

लंबे समय तेज और लगातार सिर दर्द होना


प्रसव के बाद अगर कुछ घंटों से लागतार तेज सिर दर्द की समस्या हो, तो तुरंत अपने डॉक्टर को फोन करें। साथ ही निम्न लक्षणों के होने पर आपातकालीन नंबर पर फोन करेंः


देखने में परेशानी होना
बहुत ज्यादा उल्टी होना
सीने में तेज जलन होना
एंकल में सूजन होना।



प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को जितनी देखभाल की आवश्यकता होती है, उतनी ही केयर और पोषण की जरूरत उन्हें प्रसव के बाद भी पड़ती है। प्रसव के बाद महिला की शारीरिक और मानसिक हेल्थ की बेहतरी के लिए ऊपर बताए गए टिप्स अपनाने के साथ ही अपनी जरूरत के लिए घरवालों का सहारा लेने में न हिचकिचाएं।

ओव्यूलेशन कैलक्युलेटर

अपने पीरियड सायकल को ट्रैक करना, अपने सबसे फर्टाइल डे के बारे में पता लगाना और कंसीव करने के चांस को बढ़ाना या बर्थ कंट्रोल के लिए अप्लाय करना।

पर डॉ. प्रणाली पाटील के द्वारा मेडिकली रिव्यू किया गया
ओव्यूलेशन कैलक्युलेटर

ऑब्जेक्टिव्स
आपके पीरियड सायकल को ट्रैक करें

आपके पीरियड सायकल को ट्रैक करें
क्या आप कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं?

क्या आप कंसीव करने की कोशिश कर रही हैं?
प्रेग्नेंसी टालें

प्रेग्नेंसी टालें

आपके पिछले पीरियड का पहला दिन

सायकल की लेंथ

(दिन)

ऑब्जेक्टिव्स

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बच्चे के जन्म का पहला घंटाः क्या करें क्या न करें?


बच्चे के जन्म का पहला घंटा जज्चा और बच्चा दोनों के लिए ही काफी महत्वपूर्ण होता है। बच्चे के जन्म का पहला घंटा शुरू होने से पहले प्रसव के कई चरणों से होकर एक बच्चे का जन्म होता है। प्रसव के सारे चरण कितना समय लेंगे, यह इस बात पर निर्भर कर सकता है कि महिला की पहली प्रेगनेंसी है या दूसरी-तीसरी। अगर यह महिला की पहली प्रेग्नेंसी है, तो जाहिर की प्रसव का समय अधिक हो सकता है, क्योंकि प्रसव के पहले चरण में महिला की योनि की दीवारों का पतला होना, फैलना, खिंचना और धीरे-धीरे करके बच्चे के सिर का खिसकने जैसे कार्य शामिल होते हैं। वहीं, दूसरी बार इस प्रक्रिया में थोड़ा कम समय लग सकता है, क्योंकि महिला की योनि पहले के मुकाबले दूसरी बार अधिक ढीली हो गई होती है। इसी तरह तीसरे बच्चे के प्रसव के दौरान यह चरण और भी कम समय का हो सकता है।

बच्चे के जन्म का पहला घंटा : कैसे होता है बच्चे का जन्म?
प्रसव अगर नॉर्मल डिलिवरी से हो रही है, तो बच्चा महिला के बच्चेदानी से होते हुए योनि के मार्ग से जन्म लेता है। जन्म की प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले बच्चे का सिर योनि से बाहर आता है। फिर एक कंधा, इसके बाद दूसरा कंधा और फिर इसके बाद बच्चे का पूरा शरीर महिला की योनि से बाहर निकल जाता है। कुछ मामलों में प्रसव के दौरान बच्चे के पैर सबसे पहले बाहर आने की भी संभवना हो सकती है। जन्म के समय बच्चा एक झिल्ली नुमा चिकने पदार्थ के अंदर होता है। तो आमतौर पर बच्चे का सिर बाहर आने से पहले ही योनि के बाहर निकलकर फट जाता है। इसे शो कहते हैं। फटने के बाद इसमें से एमनीओटिक द्रव निकलने लगता है। लेकिन, अगर बच्चे का जन्म सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन के जरिए होता है, तो इसके चरण इससे काफी अलग होते हैं।

बच्चे के जन्म का पहला घंटा : जन्म के बाद क्या होता है?
बच्चे के जन्म का पहला घंटा कई चरणों से गुजरता है, जिसमें शामिल हैंः
नाड़ को काटना
जब बच्चे का जन्म होता है, तो वह एक नाड़ (कोर्ड) से जुड़ा हुआ होता है जिसे नाड़ी भी कहते हैं। इसका रंग सफेद, मटमैला हो सकता है। यह देखने में रस्सी की तरह होता है। इसे छूकर बच्चे की धड़कन महसूस की जा सकती है। यह नाड़ मां के गर्भ में बच्चे के शरीर में खून और ऑक्सीजन पहुंचाने का कार्य करता है। यह नाड़ एक सिरे से बच्चे की नाभि और दूसरे सिरे पर मां के बच्चेदानी की दीवार से चिपका रहता है। सामान्य तौर पर देखा जाए तो जब बच्चा जन्म के बाद रोना शुरू करता है, तभी डॉक्टर इसे काटकर मां की बच्चेदानी से अलग करते हैं। रोना शुरू करने के बाद बच्चे की त्वचा का रंग गुलाबी हो जाता है। जो इस बात को साबित करता है कि बच्चे का दिल और फेफड़े उचित तरीके से कार्य लगे हैं। इसकी जांच करने के बाद डॉक्टर या नर्स नाड़ को बच्चे की नाभि से लगभग 8 से 10 सेमी की दूरी पर एक क्लैम्प लगाकर काट देते हैं। जो अगले 24 घंटे तक बच्चे की नाभि से लगी रहकर ही सूखती रहती है। और अगले सात से दस दिनों में यह सूख कर अपने आप ही बच्चे की नाभि से अलग हो जाती है।

बच्चे के मुंह और नाक को साफ करना
बच्चे के जन्म के बाद सबसे पहले बच्चे के मुंह और नाक को साफ किया जाता है। अगर बच्चे के मुंह में किसी तरह का कोई पदार्थ चला गया है या जन्म के दौरान निकलने वाली झिल्ली का द्रव बच्चे के मुंह में चला गया होता है, तो उसे भी डॉक्टर या नर्स साफ करते हैं। कभी-कभी इन पदार्थों को साफ करने के लिए मशीनों का उपयोग किया जा सकता है हालांकि, मशीन का इस्तेमाल तभी किया जाता है, अगर यह पदार्थ बच्चे की सांस लेने वाली नली में चली गई हो। इसके बाद बच्चे की आंखों को साफ किया जाता है।
बच्चे को कपड़े में लपेटना ताकि शरीर का तापमान बना रहे
बच्चे के शरीर को अच्छे से साफ करने के बाद डॉक्टर बच्चे को एक साफ, मुलायम और हल्के कपड़े में लपेटते हैं, ताकि, बच्चे के शरीर का तापमान बना रहे।

स्वास्थ्य की जांच करना


बच्चे के जन्म का पहला घंटा शुरू होते ही डॉक्टर बच्चे के सांस लेने की कार्यक्षमता, बच्चे के दिल की धड़कन, त्वचा का रंग, हाथ और पैरों का हिलना, बच्चे की त्वचा को छूने पर उसका रवैया, इन सभी बातों की देखरेख करते हैं। जिसे एपगार कहते हैं। अगर बच्चा पूरी तरह से सामान्य है, तो इसके बाद डॉक्टर बच्चे के कान के साथ-साथ बच्चे के शरीर पर लगे खून या किसी भी द्रव को साफ करते हैं।
एपगार की प्रक्रिया में डॉक्टर बच्चे के जन्म के 1 मिनट और 5 मिनट बाद नवजात शिशु की स्थितियों का मूल्यांकन करते हैं। जिसे 10 के अंदर स्कोर देते हैं। इनमें शामिल होता हैः


बच्चे की शारीरिक गतिविधि
बच्चे की पल्स दर
बच्चे का मुंह बनाना या चिड़चिड़ापन होना
बच्चे के रंग में होने वाले बदलाव
बच्चे की सांस लेने की दर
अगर बच्चे को 7 से 10 के बीच स्कोर मिलता है, तो इसका मतलब है कि बच्चा पूरी तरह से स्वस्थ हैं। लेकिन अगर बच्चे को 4 से 6 के बीच स्कोर मिलता है, तो इसका मतलब हो सकता है कि बच्चे को ऑक्सीजन लेने में किसी तरह की परेशानी हो सकती है। जिसकी देखरेख करनी जरूरी हो सकती है। लेकिन, अगर बच्चे को 3 या उससे कम का स्कोर मिलता है, तो इसका मतलब है कि बच्चे का जीवन जोखिम भरा है, जिसकी देखरेख करने के लिए मेडिकल केयर और डिवाइस की मदद की आवश्यकता हो सकती है।
बच्चे के जन्म का पहला घंटा : नाड़ काटते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
सबसे पहले, नाड़ को हमेशा बच्चे की नाभि से 8 से 10 सेमी की लम्बाई पर ही काटना चाहिए।
काटने से पहले नापी गई दूरी पर एक क्लिप लगाना चाहिए। ताकि नाड़ में बाहर की हवा न जा सके और उससे किसी भी तरह का द्रव न टपके।
नाड़ काटने के बाद, बच्चे की नाभी से जुड़ी हुई नाड़ को किसी भी वस्तु के संपर्क में आने से बचाना चाहिए। क्योंकि यह बहुत जल्दी संक्रमित हो जाता है और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए जोखिम का कारण बन सकता है।
नाड़ काटने के बाद डॉक्टर इस पर दवा लगाते हैं। जब तक यह बच्चे के शरीर से जुड़ी होती है, हर दिन कीटाणुनाशक दवाओं के इस्तेमाल से इसकी देखरेख करना जरूरी होता है।
बच्चे के जन्म का पहला घंटा : बच्चे का रोना
जन्म के बाद बच्चे का रोनाबहुत ही जरूरी होता है। क्योंकि रोना शुरू करने के बाद ही बच्चे के शरीर में ऑक्सीजन और खून का संचार होता है। जिसकी वजह से ही बच्चे का रंग गुलाबी हो जाता है। जो यह बताता है कि बच्चे का शरीर उचित तरीके से कार्य करने लगा है।

जन्म के बाद का टीका
इन सारी प्रक्रिया के पूरी होने के बाद डॉक्टर आपके बच्चे के शरीर में खून के थक्के को ठीक करने और एक रक्तस्राव जैसे गंभीर विकारों को रोकने में मदद करने के लिए विटामिन के का इंजेक्शन लगा सकते हैं। इसके बाद पिता या परिवार की सहमति से बच्चे को जन्म के बाद ही हेपेटाइटिस बी का भी टीका लगा सकते हैं।
शारीरिक जांच करना
बच्चे के जन्म का पहला घंटा कैसा होगा यह हर अस्पताल या क्लिनिक में अलग-अलग हो सकता है। कुछ अस्पतालों में बच्चे के जन्म के पहले घंटे के अंदर ही उसकी शारीरिक जांच के तौर पर नवजात शिशु के ब्लड शुगर या बिलीरुबिन के लेवल की भी जांच की जाती है, जिसके लिए डॉक्टर बच्चे के खून का नमूना लेते हैं।
इसके अलावा, पीकेयू (फेनिलकेटोनुरिया) और जन्मजात होने वाली अन्य बीमारियों की जांच करने के लिए नवजात शिशु की स्क्रीनिंग ब्लड टेस्ट भी कर सकते हैं।

बच्चे को मां का दूध पिलाना
बच्चे की शारीरिक जांच लगभग 30 से 40 मिनट के अंदर पूरी कर ली जाती है। जिसके बाद बच्चे को मां के पास दिया जाता है ताकि मां उसे ब्रेस्टफीडिंग करा सके। इस काम में मां की मदद करने के लिए नर्स वहां मौजूद हो सकती है।


अगर आपके बच्चे का जन्म नॉर्मल डिलिवरी से हुई है, तो अगले 48 घंटे बाद आप घर आ सकेंगे, लेकिन अगर बच्चे का जन्म सी-सेक्शन से हुआ होगा, तो लगभग 96 घंटों के बाद घर जा सकेंगे।
अगर बच्चे के जन्म का पहला घंटा कैसा होता है या इससे जुड़ा आपका कोई सवाल है, तो अधिक जानकारी के लिए आप अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं।

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