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जानें, कितनी खतरनाक है पित्त की पथरी
पित्त यकृत (लीवर) में बनता है। वहां से वह सीधे ड्यूडेनम में जाकर वसा-पाचन (फैट डाइजेशन) में भूमिका निभा सकता है या फिर पित्ताशय में जाकर जमा हो सकता है। पित्त से बनने वाली पथरियां अमूमन पित्ताशय में बनती हैं, लेकिन कुछ रोगों में लीवर में पथरी बन जाती है। हालांकि ऐसा कम ही होता है।
पित्त में पत्थर के बनने में तीन कारक हैं - कलेस्ट्रॉल, पित्त-रंजक (बाईल पिगमेंट्स) और पित्त-लवण (बाईल सॉल्ट्स) । पथरियां भी कई तरह की हो सकती हैं। पहला स्वरूप पथरीकारक पित्त का है। यानी पित्त का पथरीकरण हुआ नहीं है, लेकिन पूरी आशंका बन गई है। इसे अंग्रेजी में लिथोजेनिक बाइल कहते हैं। अगला रूप बड़े पत्थर का है जो निष्क्रिय रूप में पित्ताशय में पड़ा रहता है। तीसरा स्वरूप पित्ताशय से निकली वाहिनी सिस्टिक डक्ट में छोटे पत्थर का फंस जाना है। इससे पित्ताशय में पित्त रुक जाता है और पित्ताशय सूजने लगता है। ऐसा होने पर रोगी में कलिसिस्टाइटिस के लक्षण पैदा होते हैं। चौथा और अन्तिम स्वरूप पित्ताशय की पथरी का लुढ़क-सरक कर नीचे कॉमन बाइल डक्ट नामक वाहिनी के अन्तिम हिस्से में आ जाना है। ऐसा होने से अग्न्याशय से पाचक रसों का निकास रुक जाता है और रोगी को पैंक्रियेटाइटिस विकसित हो जाती है।
पित्ताशय में बनी बड़ी पथरी तो जल्दी अपनी जगह नहीं बदल सकती है, लेकिन छोटी पथरियों के विषय में एक बात जाननी जरूरी है जो वाहिनियों में रुकावट पैदा करती हैं। छोटी पथरियां अपना स्थान बदल कर आगे सरक सकती हैं और आंत के रास्ते बाहर भी निकल सकती हैं। यही कारण है कि ऐसा भी हो सकता है कि पहली बार हुए अल्ट्रासाउंड में वे कहीं दिखायी दें और दूसरी बार में वे न दिखायी दें अथवा आगे बढ़ी जान पड़ें। पथरी कोई स्थायी-स्थिर संरचना नहीं।
पथरी अपनेआप में कितनी खतरनाक है?
पत्थर का ज्यादातर खतरा रास्ता रोकने से है। यहां प्रवाह के रास्ते की बात हो रही है, पित्ताशय से आते पित्त का प्रवाह, अग्न्याशय से आते पाचक-रस का प्रवाह। हालांकि पित्ताशय में चुपचाप पड़ा पत्थर भी कम खतरनाक नहीं है। इसका सम्बन्ध एक बड़े रोग से पाया गया है। वह है पित्ताशय का कैंसर।
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