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डिलीवरी के बाद हो रही थी ब्लीडिंग, ऐसे बची खतरे से जान
ग्वालियर. प्रसव के बाद होने वाली ब्लीडिंग (रक्त स्राव) कई बार प्रसूता की मौत का कारण भी बन जाती है। या फिर, ऐसे मामले में डॉक्टरों को बड़ा ऑपरेशन करना पड़ता है। लेकिन गजराराजा मेडिकल कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड के माध्यम से इंजेक्शन के जरिए नस में दवा पहुंचाकर महज 15 मिनट में ही प्रसूता की ब्लीडिंग को रोक दिया।
-इतना ही नहीं,करीब 25 मिनट बाद ही उन्होंने प्रसूता को घर जाने की इजाजत भी दे दी।
-जीआरएमसी के रेडियोलॉजी विभाग के डॉक्टरों का दावा है कि प्रसव के बाद होने वाली ब्लीडिंग को रोकने में इस पद्धति का देश में पहली बार जेएएच में प्रयोग किया गया है।
कुछ घंटे बाद महिला को ब्लीडिंग होने लगी और महिला की हालत गंभीर हो गई
-जेएएच के गायनिक वार्ड में डबरा निवासी अमरदीप ने ऑपरेशन से बच्चे को जन्म दिया। ऑपरेशन के कुछ घंटे बाद महिला को ब्लीडिंग होने लगी और महिला की हालत गंभीर हो गई।
-महिला की स्थिति को देखते हुए उसे तत्काल ब्लड चढ़ाया गया। 6 यूनिट ब्लड देने के बाद भी जब ब्लीडिंग नहीं रुकी तो डॉक्टरों ने महिला को ऑपरेशन की सलाह दी।
-महिला की आर्थिक हालत ठीक नहीं होने के कारण वह ऑपरेशन में होने वाले खर्च को वहन नहीं कर सकती थी।
-इस पर महिला की स्थिति का पता लगाने के लिए उसे रेडियोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजेश बघेल के पास भेजा। रेडियोलॉजी के डॉक्टरों ने यूटेराइन आरटरी इम्बोलाइजेशन के तहत ब्लीडिंग वाली नस को बंद करने की सलाह दी जो महंगी और काफी जटिल पद्धति है। महिला के परिजन ने इसके लिए मना कर दिया।
-तब डॉ. राजेश बघेल ने अल्ट्रासाउंड द्वारा इलाज करने की बात कही।
-डॉ. बघेल ने परकुटेनियस ब्लू इंजेक्शन पद्धति से अल्ट्रासाउंड के माध्यम से दवा को इंजेक्शन द्वारा उस नली तक पहुंचाया जहां से ब्लीडिंग हो रही थी।
-दवा के कारण ब्लीडिंग रुक गई। इस पूरी प्रक्रिया में महज 15 मिनट का समय लगा और ब्लीडिंग पूरी तरह से बंद हो गई। करीब 25 मिनट बाद महिला को घर जाने दिया गया।
ऐसे किया इलाज
-अल्ट्रासाउंड के माध्यम से गर्भाशय में यह देखा गया कि ब्लीडिंग कहां से हो रही है।
-देखने पर पाया गया कि खून की एक नस फूल गई थी, जिससे लगातार ब्लीडिंग हो रही थी।
-इंजेक्शन के माध्यम से इस नस में दवा पहुंचाई गई। दवा पहुंचने के बाद ब्लीडिंग रुक गई।
देश में पहली बार हुआ है जेएएच में सफल प्रयोग
-जीआरएमसी में रेडियोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजेश बघेल ने बताया कि इलाज की यह पद्धति इससे पूर्व अग्नाशय और गुर्दे के रोगों के इलाज में प्रयोग की जाती थी।
-परंतु गर्भाशय के इलाज के लिए परकुटेनियस ब्लू इंजेक्शन पद्धति का उपयोग देश में पहली बार जेएएच के रेडियोलॉजी विभाग ने किया है, जो सफल रहा है।
ब्लीडिंग होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है
-गायनिक विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ज्योति बिंदल ने बताया कि डिलीवरी के बाद बच्चेदानी पूर्व अवस्था में आती है जिससे करीब 40 दिन तक ब्लीडिंग होना एक स्वभाविक प्रक्रिया है।
-अधिक ब्लीडिंग हो तो उसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे प्रेसेंटा के टुकड़े रह जाना, इंफेक्शन, बच्चेदानी में पूर्व से कोई गांठ होना प्रमुख है।
ब्लीडिंग केस का इलाज शुरू हो गया
-जेएएच समूह के अधीक्षक डॉ. जे एस सिकरवार ने बताया कि जेएएच में इस नई पद्धति से ब्लीडिंग केस का इलाज शुरू हो गया है।
-इस पद्धति से प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेज से संबद्ध अस्पतालों में भी रोगियों को इलाज मिल सके इसके लिए डीएमई को पत्र लिखा जाएगा। इस कार्य में रेडियोलॉजी विभाग पूरी मदद करेगा।

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