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शिशु में कॉन्सिटपेशन होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि:

फॉर्मूला दूध: फॉर्मूला दूध पीने वाले शिशु को कब्ज होने की संभावना ज्यादा होती है, क्योंकि स्तनदूध की तुलना में फॉर्मूला दूध को पचा पाना मुश्किल हो सकता है। इसकी वजह से मल कड़ा और बड़े आकार का आता है। फॉर्मूला दूध का ब्रांड बदलने से भी कब्ज की परेशानी हो सकती है। वहीं, दूसरी तरफ स्तनदूध पीने वाले शिशु को कब्ज होने की संभावना कम होती है। स्तनदूध पीने से ऐसा मल बनता है, जो लगभग हमेशा ही नरम होता है। चाहे शिशु ने कुछ दिनों से मल त्याग न किया हो फिर भी पॉटी नरम ही होती है।

ठोस आहार शुरु करना: ठोस आहार का सेवन शुरु करने पर शिशुओं को अक्सर कब्ज हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका शरीर नए भोजन के प्रति खुद को व्यवस्थित कर रहा होता है। जब आप शिशु को ठोस आहार खिलाना शुरु करते हैं, तो आपको उसके पेय पदार्थों का सेवन भी बढ़ाना चाहिए। कम फाइबर वाले भोजन या पर्याप्त तरल न पीने से शिशु को कब्ज हो सकता है। संतुलित व पौष्टिक आहार, कब्ज को दूर रखने में अत्यंत सहायक हैं।

शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन): हो सकता है शिशु दांत निकलने, थ्रश होने पर, गले में इनफेक्शन, सर्दी-जुकाम या कान के संक्रमण की वजह से दूध न पी रहा हो। या फिर हो सकता है आपका थोड़ा बड़ा शिशु ठोस आहार शुरु करने पर पर्याप्त मात्रा में दूध या पानी न पी रहा हो। कारण चाहे कुछ भी हो, यदि आपका शिशु पर्याप्त तरल पदार्थ नहीं लेगा तो उसके शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसकी वजह से उसे सूखी और कड़ी पॉटी हो सकती है, जिसे करने में शिशु को मुश्किल होगी।

बीमारी या स्वास्थ्य संबंधी स्थिति: कभी-कभार, कब्ज किसी भोजन से एलर्जी, भोजन विषाक्तता (जैसे कि बॉटुलिज्म) या भोजन के अवशोषण में समस्या (मेटाबॉलिक डिसोर्डर) की वजह से भी हो सकता है। कुछ दुर्लभ मामलों में, शिशुओं में कब्ज का कारण विशेष जन्मजात स्थितियां हो सकती हैं। इनमें शामिल हैं, वह बीमारी जिसमें बड़ी आंत उचित ढंग से काम नहीं करती (हर्शस्प्रून्गज़ डीजीज), वह स्थिति जिसमें गुदा और मलद्वार पूरी तरह से विकसित नहीं होते (एनोरेक्टल मैलफोर्मेशन), स्पाइना बिफिडा और सिस्टिक फाइब्रोसिस।

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