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नवजात शिशु की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं-
1. शारीरिक विकास से सम्बन्धित विशेषताएँ (Properties Related to Physical Development)
2. नवजात शिशु की क्रियाएँ (Activities of the Infant)
3. नवजात शिशु का क्रन्दन (Crying of the Newborn)
4. नवजात शिशु की संवेदनशीलता (Sensitivities of the Neonate)
5. नवजात शिशु के संवेग (Emotions of the Neonate) –
6. नवजात शिशुओं में अधिगम की क्षमता (Capacity for Learning in Infants)
7. नवजात शिशुओं का व्यक्तित्व (Personality of the Neonate)
1. शारीरिक विकास से सम्बन्धित विशेषताएँ (Properties Related to Physical Development):-
शारीरिक विकास से सम्बन्धित निम्न चार विशेषताएँ हैं-
(अ) नवजात शिशु का आकार (Size of the Infant) – जन्म के समय नवजात शिशु का औसत भार 7.5 पौण्ड तथा औसत लम्बाई 19.5 इंच होती है। भार के औसत का विस्तार 3-16 पौण्ड तक तथा लम्बाई के औसत का विस्तार 15-21 इंच तक होता है। अक्सर जन्म के समय लड़के लड़कियों की अपेक्षा अधिक लम्बे होते हैं। नवजात शिशु के आकार को अनेक कारक प्रभावित करते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कारक निम्न प्रकार से हैं-
(i) माँ का आहार (Maternal Diet)
(ii) आर्थिक स्तर (Economic Status)
(iii) जन्मक्रम (Birth Order)
(iv) गर्भस्थ शिशु की क्रियाएँ (Fetal Activity)
(v) अन्य कारक (Other Factors)
(ब) शारीरिक अनुपात (Physical Proportions) – नवजात शिशु के शारीरिक अनुपात वयस्क व्यक्तियों की अपेक्षा भिन्न होते हैं। उसका सिर उसके सम्पूर्ण शरीर का 1/4 होता है, जबकि वयस्क व्यक्तियों में सिर और शरीर का अनुपात 1: 7 होता है। खोपड़ी (Cranium) और चेहरे का अनुपात 8 : 1 होता है। नवजात शिशु के कन्धे पतले, गर्दन सँकरी, पेट कुछ लम्बा, नाक चपटी और जबड़े अविकसित होते हैं। उसकी भुजाएँ, धड़ तथा पैर और सिर की तुलना में छोटी होती हैं।
(स) नवजात शिशु के विशिष्ट गुण (Infantile Features)- नवजात शिशु के कुछ प्रमुख विशिष्ट गुण निम्न प्रकार से हैं-
1. त्वचा (Skin)
2. आँखें (Eyes)
3. दाँत (Teeth)
4. गर्दन (Neck)
5. मांसपेशियाँ (Muscles)
6. बाल (Hair)
7. हड्डियाँ (Bones)
(द) शरीरशास्त्रीय क्रियाएँ (Physiological Functions) – बालकों की अपेक्षा नवजात शिशुओं की शरीरशास्त्रीय क्रियाएँ भिन्न होती हैं-
1. हृदय की धड़कन (Heart Beats)
2. श्वसन क्रिया (Respiration)
3. तापक्रम (Temperature)
4. चूसने सम्बन्धी सहजक्रिया गतियाँ (Reflex Sucking Movements)
5. नींद (Sleep)
6. नाड़ी की गति (Pulse Rate)
7. भूख के आकुंचन (Hunger Rhythms)
2. नवजात शिशु की क्रियाएँ (Activities of the Infant):-
नवजात शिशु की क्रियाएँ अनायास होती हैं। अधिकांश व्यर्थपूर्ण प्रकृति की होती हैं। नवजात शिशुओं की क्रियाओं को मुख्यतः दो भागों में बाँट सकते हैं-
(अ) सामान्य क्रियाएँ (Mass Activities),(ब) सामान्यीकृत अनुक्रियाएँ (Generalized Responses)
3. नवजात शिशु का क्रन्दन (Crying of the Newborn):-
नवजात शिशु का क्रन्दन जन्म के समय या जन्म के कुछ ही देर में प्रारम्भ हो जाता है। यही उसका प्रथम स्वर और भाषा होती है। जन्म के कुछ समय तक शिशु की यह भाषा पूर्णतः एक प्रकार की सहज क्रिया होती है। जन्म के समय बालक के क्रन्दन का बहुत बड़ा लाभ है। उसके क्रन्दन से उसके फेफड़े फूल जाते हैं और उसको श्वसन क्रिया आरम्भ हो जाती है। श्वसन क्रिया प्रारम्भ होने से उसके रक्त को ऑक्सीजन मिलने लग जाती है। जन्म के समय वह पहला अवसर होता है, जब बालक अपनी आवाज प्रथम बार सुनता है। जन्म के 24 घण्टे बाद ही शिशु के क्रन्दन के अर्थ बदल जाते हैं। नवजात शिशुओं का क्रन्दन कुछ विशेष अक्षरों से प्रारम्भ होता है। रोते समय शिशु हाथ-पैर चलाता है और कभी हाथ की मुट्ठी खोलता है तो कभी बन्द करता है।
4. नवजात शिशु की संवेदनशीलता (Sensitivities of the Neonate):-
नवजात शिशु की संवेदनशीलता का अध्ययन कठिन है; क्योंकि इस प्रकार के अध्ययन अन्तर्दर्शन विधि से किये जाते हैं। अतः यह भी बताना कठिन है कि कौन-सी संवेदनाएँ शिशु में पाई जाती हैं और कितनी मात्रा में पाई जाती हैं। “जो बच्चे गर्भकालीन अवस्था के पूर्ण होने से पहले ही जन्म ले लेते हैं, वे भी तीव्र उद्दीपकों के प्रति उसी प्रकार अनुक्रिया करते हैं, जिस प्रकार अन्य बालक शिशुओं में अन्य संवेदनाओं की अपेक्षा स्पर्श-संवेदना के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं।”
i. दृष्टि (Sight) ,ii. श्रवण (Hearing),iii. स्वाद (Taste),iv. गन्ध (Smell),v. त्वक संवेदनशीलता (Skin Sensitivities)
5. नवजात शिशु के संवेग (Emotions of the Neonate) –
नवजात शिशुओं के संवेगों के सम्बन्ध में जो अध्ययन हुए हैं, वे कम हैं, परन्तु जो भी अध्ययन हुए हैं, वे विस्तृत अधिक हैं। शिशु में जन्म के समय या जन्म के कुछ ही समय बाद तीन संवेग पाए जाते हैं। यह संवेग कुछ विशिष्ट उद्दीपकों के द्वारा शिशुओं में उत्पन्न किए जा सकते हैं। तीन प्रमुख संवेग हैं-भय, क्रोध और प्रेम.
6. नवजात शिशुओं में अधिगम की क्षमता (Capacity for Learning in Infants):-
कोई भी प्राणी किसी समस्या या क्रिया का अधिगम तब कर सकता है, जब वह उस समस्या के सम्बन्ध में जागरूक हो। किसी समस्या के अधिगम के लिए यह भी आवश्यक है कि अधिगमकर्त्ता के स्नायु इतने विकसित और परिपक्व हो कि वह समस्या का अधिगम कर सकें। नवजात शिशुओं के स्नायु और मस्तिष्क इतने परिपक्व नहीं होते हैं कि वे किसी समस्या का सरल से सरल विधि द्वारा अधिगम कर सकें। नवजात शिशुओं में जागरुकता भी नहीं के बराबर पाई है। कुछ अध्ययनों के द्वारा यह स्पष्ट हुआ है कि यद्यपि नवजात शिशुओं में अनुबन्धन (Conditioning) द्वारा अधिगम बहुत कठिन है, फिर भी स्तनपान सम्बन्धी परिस्थितियों (Feeding situation) के प्रति नवजात को अधिगम कराया जा सकता है, परन्तु यह अनुबन्ध जन्म के कई दिनो बाद ही स्थापित कर सकता है।
7. नवजात शिशुओं का व्यक्तित्व (Personality of the Neonate):-
नवजात शिशुओं के व्यक्तित्व में अन्तर कुछ ही दिनों में दृष्टिगोचर होने लगता है। हम सभी जानते हैं कि कुछ नवजात शिशु सोने की तरह अच्छे और कीमती भी होते हैं और कुछ माता-पिता के लिए अत्यधिक परेशानी पैदा करने वाले होते हैं। नवजात शिशुओं के व्यक्तित्व में अन्तर वंशानुक्रम और वातावरण सम्बन्धी कारकों के कारण तो होते ही हैं, साथ ही साथ व्यक्तित्व में अन्तर अपरिपक्व जन्म (Premature Birth), जन्म के समय की परिस्थितियाँ तथा स्वास्थ्य की दशाएँ आदि कारकों के कारण भी होते हैं। नवजात शिशु के लिए जन्म एक दैहिक और मनोवैज्ञानिक आघात (Physiological and Psychological Shock) है। इस आघात के कारण बालक में चिन्ता उत्पन्न हो जाती है।इस बात का कोई प्रभाव नहीं है कि जन्म शिशु के लिए आघात है और उनमें चिन्ता उत्पन्न करता है तथा जन्म उनके व्यक्तित्व विकास को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करता है। यह अध्ययनों द्वारा अवश्य सिद्ध हो चुका है कि जो बालक जन्म होते ही माँ से अलग कर दिये जाते हैं और माँ से दूर रखे जाते हैं, उनका विभिन्न परिस्थितियों में समायोजन उतना अच्छा नहीं होता है, जितना कि उन बच्चों का, जो माँ के साथ रहते हैं।
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