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धात्री माता के लिए पोषण (Nutrition for Lactating Mother)
शिशु के लिए माता का दूध अमृत तुल्य है। इसे प्रकृति ने केवल शिशु के लिए ही बनाया है। मां के दूध में सभी आवश्यक पोष्टिक तत्व मौजूद रहते हैं जो शिशु की वृद्धि विकास एवं पोषण के लिए निहायत जरूरी होते हैं। नवजात शिशु के लिए माता का दूध ईश्वर का वरदान है जिसकी तुलना कभी भी किसी भी खाद्य वस्तु से नहीं की जा सकती ह
धात्री माता:
दूध पिलाने वाली स्त्री को धात्री माता (Lactating Mother or Nursing Mother) कहते हैं। माता का दूध हरेक शिशु का जन्मसिद्ध अधिकार है। इससे शिशु को कदापि वंचित नहीं करना चाहिए। 6 माह तक तो शिशु को अवश्य ही स्तनपान करवाना चाहिए। परंतु कई माताएं अपने शिशु को 2 से 3 वर्ष तक दुग्ध पान करवाती हैं, जोकि उचित नहीं है। इससे शिशु को भी कोई लाभ नहीं होता तथा माता का स्वास्थ्य स्तर निम्न होता है।
स्तनपान कराने से मां को लाभ (Advantages of Breast Feeding for Mother):
(1)स्तनपान कराने से मां को मानसिक संतुष्टि एवं खुशी मिलती है। वह शिशु को गोद में लेकर जब स्तनपान करवाती है तो आनंद विभोर हो जाती है।
(2) माता और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत बनता है। माता के दिल में शिशु के प्रति प्यार उमड़ता है।
(3) स्तनपान कराने वाली माताएं देर से गर्भवती होती है क्योंकि स्तनपान प्रक्रिया एक प्राकृतिक गर्भनिरोधक विधि की तरह कार्य करती हैं। यदि माताएं लंबे समय तक शिशु को स्तनपान करवाती है तो वे देर से गर्भवती होती है।
(4) स्तनपान से गर्भाशय अपनी पूर्वाकृति को शीघ्रता से प्राप्त कर लेता है क्योंकि इस क्रिया में गर्भाशय की पेशियों का संकुचन उचित ढंग से होता है।
(5) माता को शिशु को दूध पिलाने के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है। अतः पैसे की बचत होती है।
(6) माता जब चाहे तब स्तनपान करवा सकती है।
स्तनपान करवाने से शिशु को लाभ (Advantages of Breast Feeding for Infants)
(1) माता का दूध सुपाच्य होता है।
(2) शिशु के जबड़ों का व्यायाम होता है।
(3) शिशु को संक्रामक रोग होने की संभावना कम होती है। अतः वृद्धि एवं विकास तेज गति से होता है।
(4)मां के स्तनों से प्रारंभ के 2 दिनों में गाढ़ा पीला रंग का तरल पदार्थ निकलता है जिसे”कोलोस्ट्रम” (Colostrum) कहते हैं । इसमें खनिज लवण, वसा एवं प्रोटीन का अनुपात अधिक होता है। यह कोलोस्ट्रम शिशु के पोषण के लिए आवश्यक होता है, क्योंकि इसमें वे सभी पौष्टिक तत्व उपस्थित होते हैं जो शिशु के पोषण में सहयोग देते हैं। इतना ही नहीं यह पाचन शक्ति बढ़ाता है तथा शिशु में रोग- रोधक क्षमता (Immunity Power) बढ़ाता है।
(5) माता के दूध पर चलने वाले बच्चे हीष्ट-पुष्ट एवं स्वस्थ होते हैं।
(6) स्तनपान से शिशु की आंतों में एक विशेष प्रकार के जीवाणुओं की वृद्धि होती है, जो विटामिन | बी | का निर्माण करती हैं। यह विटामिन | बी | भोजन के अवशोषण में मदद करता है।
(7) शिशु के पाचन तंत्र के अनुसार ही माता के दूध का संगठन होता है। प्रारंभ में यह पतला होता है, क्योंकि शिशु का पाचन तंत्र अपरिपक्व होता है। किंतु जैसे-जैसे शिशु शरीर की परिपक्वता होते जाती है, दूध के रासायनिक संगठन एवं स्वरूप में परिवर्तन होता जाता है।
(8) मां का दूध हर एक मौसम में उचित तापक्रम पर उपलब्ध होता है।
(9) माता का दूध साफ, स्वच्छ, कीटाणु-रोगाणु रहित होता है। यह स्तन से सीधे ही शिशु के मुंह में चला जाता है। इसलिए इसमें किसी भी प्रकार के संक्रमण की कोई संभावना नहीं होती है।
(10) 6 माह तक के शिशु के पोषण के लिए माता का दूध पर्याप्त होता है। परंतु 6 माह के बाद केवल माता के दूध से शिशु का पोषण नहीं हो पाता है। अतः उसे पूरक आहार (Supplementary Food) देना आवश्यक होता है।
माता के स्तनों से दूध कम स्रावित होने के कारण (Reasons for Reducing Milk Output from Mother | s Breast):
भारतीय परिस्थितियों में सामान्यतः धात्रीवस्था में 400-800मिली. दूध प्रतिदिन स्रावित होता है। एक स्वास्थ माता जो प्रतिदिन संतुलित एवं पौष्टिक भोजन ग्रहण करती हैं उसके स्तनों से 600-700मिली. दूध रोज स्रावित होता है। परंतु कुपोषण तथा अन्य कारणों से दूध कम मात्रा में स्रावित होता है। माता के स्तनों से कम मात्रा में दुग्ध स्रावित होने के मुख्य कारण निम्नलिखित है।
(1) माता की उम्र (Age of Mother):
यदि माता की उम्र 35 वर्ष से अधिक होती है तो उसके स्तनों से दूध कम मात्रा में निकलता है। इसका कारण यह हो सकता है कि उम्र अधिक हो जाने से पेशियों का लचीलापन कम हो जाता है जिसके फलस्वरूप दुग्ध वाहिनी नलिकाओं (Lactial Ducts) का पूरा विकास नहीं हो पाता है।
(2) माता का स्वास्थ्य (Health of Mother):
यदि माता कुपोषित होती है, रोगी, निर्बल या अत्यधिक कमजोर होती हैं तो भी उसके स्तनों से दूध की मात्रा कम निकलता है। कम वजन वाली (Underweight) माता के स्तनों से भी कम मात्रा में दूध निकलता है।
(3) माता की मानसिक स्थिति (Mental Status of Mother):
कई माताएं ऐसी होती हैं जो अत्याधुनिक विचारों वाली होती हैं तथा पश्चिमी सभ्यता से पूरी तरह प्रभावित होती हैं। उनका ऐसा मानना होता है कि स्तनपान कराने से उनके स्तनों की आकृति खराब हो जाएगी। उन्हें शिशु को गोद में लिटाकर दूध पिलाना पड़ेगा जिससे उनके वस्त्र गंदे हो जाएंगे। ऐसी मानसिकता वाली महिलाओं के स्तनों से भी कम मात्रा में दूध स्रावित होता है।
(4) माता का आहार (Food of Mother):
यदि माता पूर्ण पौष्टिक एवं संतुलित आहार ग्रहण करती हैं तो उसके स्तनों से अधिक मात्रा में दूध निकलता है तथा दूध की गुणवत्ता भी अच्छी होती है क्योंकि उस दूध में सभी पौष्टिक तत्व विद्यमान होते हैं। इसके ठीक विपरीत यदि माता कुपोषित होती है, असंतुलित अपूर्ण आहार ग्रहण करती है तो कम मात्रा में दूध स्रावित होता है। साथ ही दूध में उन पौष्टिक तत्वों की भी कमी होती है जिन पौष्टिक तत्वों की कमी माता के शरीर में होती है।
(5) धात्री अवस्था का बढ़ता समय (Increasing Period of Lactation):
शिशु जन्म से लेकर 6 माह तक माता के स्तनों से जो दूध निकलता है। वह शिशु पोषण के लिए सर्वथा उपयुक्त होता है परंतु इसके पश्चात उसकी मात्रा कम होती जाती है, जिससे शिशु का पेट नहीं भरता है। यदि शिशु को ऊपरी आहार नहीं खिलाया जाता है तो वह कमजोर हो जाता है।
माता के स्तनों से स्रावित दूध की मात्रा: (मिली.) में
अवधि
दूध की मात्रा (मिली) में
6 माह तक
600-700
1 वर्ष तक
500-525
डेढ़ वर्षा तक
350-440
2 वर्ष तक
300-400
3 वर्ष तक
250-300
तत्पश्चात दूध का निष्कासन स्वत: ही बंद हो जाता है।
(6) माता के चूचुक का दोषपूर्ण होना (Defect of Mother | s Nipple)
कई बार माता के स्तनों से तो दूध की मात्रा तो खूब स्रावित होते हैं परंतु उसके चूचूक अंदर की ओर धासे होते हैं। इसलिए वह स्तनपान नहीं करवा पाती है। ऐसी स्थिति में माता के स्तन के ऊपर एक कृत्रिम निप्पल लगाई जाती है। परंतु उससे दूध चूसने में शिशु को काफी मेहनत करनी पड़ती है। दूध चूसने में कठिनाई होती है। परिणामत: धीरे-धीरे शिशु का माता के दूध के प्रति आकर्षण ही समाप्त हो जाता है।
(7) प्रोलैक्टिन हार्मोन के अल्प स्रावण से (Hypoactivity of Prolactin Hormone):
मां के स्तनों से दूध का स्रावण अग्र पीयूष ग्रंथि (Anterior Pituitary Gland) से निकलने वाला हार्मोन प्रोलैक्टिन से प्रभावित होता है। यदि ये हार्मोन अल्प मात्रा में स्रावित होते हैं तो दूध का निर्माण भी कम मात्रा में होता है। थाएराक्सिन तथा कार्टिसोन (Cortisone) हार्मोन से भी प्रोलैक्टिन हार्मोन प्रभावित होता है।
(8) शिशु के मुंह की विकृति (Defects of Infant | s Mouth):
कई बार यह भी होता है कि माता के शरीर में दूध की कमी नहीं होती है। परंतु यदि बालक शारीरिक रूप से अपरिपक्व, कम वजन तथा कमजोर होता है अथवा उसके मुंह में किसी तरह की विकृति होती है तो वह दूध जूस नहीं पाता है, जैसे होंठ कटा होना, तलुआ फटा होना, जीभ का विकृत होना आदि।
(9) कामकाजी महिला (Working Women):
धात्री माता यदि घर से बाहर नौकरी करने या मजदूरी करने जाती है तथा शिशु को घर पर छोड़ जाती है व 7-8 दिन के लिए घर से बाहर रहती है तब भी वह शिशु को स्तनपान नहीं करवा पाती है। ऐसी परिस्थिति में भी दूध की मात्रा धीरे-धीरे कम होती जाती है।
धात्रीवस्था में पौष्टिक तत्वों की मांग (Nutritional Requirement | s During Lactation Period):
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के अनुसार धात्री माता के स्तनों से 850 ml तक दूध का स्रावण होना चाहिए। इससे 600 k.cal ऊर्जा, 10.2 gm प्रोटीन,.25-3.1 mg लोहा, 290 mg कैल्शियम, 22-44 mg विटामिन सी, 420 microg. विटामिन ए, 1.2 mg. थायमिन,.52 mg. राइबोफ्लेविन,1.6 mg. नियासिन,9.0 माइक्रोग्राम फोलिक अम्ल तथा.2 माइक्रोग्राम विटामिन बी12 प्राप्त होता है। अतः धात्री माता को अधिक पौष्टिक तत्वों की जरूरत होती है क्योंकि उपरोक्त पौष्टिक तत्व माता के दूध से ही प्राप्त होती है।
तालिका:
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा धात्री माता के लिए दैनिक प्रस्तावित पौष्टिक तत्वों की मात्रा,ICMR. 1993
(Table: Daily Recommended Allowances for Lactating mother, ICMR. 1993)
पौष्टिक तत्व
कम क्रियाशील
0-6 माह
6-12 माह
कैलोरी (k. cal.)
7875+550
1875+400
प्रोटीन (gm)
50+25
50+18
वसा (gm)
45
45
कैल्शियम (gm)
1
1
लोहा (mg)
30
30
विटामिन ए
β कैरोटीन (µg)
3800
3800
रेटिनॉल (µg)
950
950
राइबोफ्लेविन (mg)
1.1+.3
1.1+.2
थायमिन (mg)
.9+.3
.9+.2
नियासिन (mg)
12+4
12+3
फोलिक अम्ल (µg)
150
150
विटामिन b12 (µg)
1.5
1.5
विटामिन सी (mg)
80
80
पौष्टिक तत्व
माध्यम क्रियाशील
0-6 माह
6-12 माह
कैलोरी (k. cal.)
2225+550
222+400
प्रोटीन (gm)
50+25
50+18
वसा (gm)
45
45
कैल्शियम (gm)
1
1
लोहा (mg)
30
30
विटामिन ए
β कैरोटीन (µg)
3800
3800
रेटिनॉल (µg)
950
950
राइबोफ्लेविन (mg)
1.3+.3
1.3+.2
थायमिन (mg)
1.1+.3
1.1+.2
नियासिन (mg)
14+4
14+3
फोलिक अम्ल (µg)
150
150
विटामिन
b12 (µg)
1.5
1.5
विटामिन सी (mg)
80
80
पौष्टिक तत्व
अधिक क्रियाशील
0-6 माह
6-12 माह
कैलोरी (k. cal.)
2925+550
2925+400
प्रोटीन (gm)
50+25
50+18
वसा (gm)
45
45
कैल्शियम (gm)
1
1
लोहा (mg)
30
30
विटामिन ए
β कैरोटीन (µg)
3800
3800
रेटिनॉल (µg)
950
950
राइबोफ्लेविन (mg)
1.5+.3
1.3+.2
थायमिन (mg)
1.2+.3
1.2+.2
नियासिन (mg)
16+4
16+3
फोलिक अम्ल (µg)
150
150
विटामिन b12 (µg)
1.5
1.5
विटामिन सी (mg)
80
80
ICMR के भोज्य विशेषज्ञ समिति (Nutrition Expert Committee) के अनुसार भारत तथा अन्य विकासशील राष्ट्रों के धात्री माता के स्तनों से 600 ml दूध निकलता है जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के भोज्य विशेषज्ञ समिति (WHO Expert Committee) की प्रस्तावना की तुलना में 200 ml कम है। अतः विकासशील देशों के धात्री माताओं के पोषण मांग को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है, तभी शिशु का पोषण उचित प्रकार से हो सकेगा। उपरोक्त तालिका में धात्री माता की पोषण मांगों को दर्शाया गया है।
कैलोरी (Calorie):
1988 से पहले ICMR की यह मान्यता थी कि धात्रीवस्था में धात्री माता को प्रथम 0-6 माह तक 1000 कैलोरी की अतिरिक्त आवश्यकता होती है। परंतु 1989 में ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने इसमें सुधार किया तथा यह प्रस्तावना की की प्रथम 6 माह तक धात्री माता को साधारण स्त्री से 550किलोकैलोरी तथा 7-12 माह तक 400किलोकैलोरी ऊर्जा की अतिरिक्त आवश्यकता होती है। तत्पश्चात धात्री माता को कोई कैलोरी की अतिरिक्त मांग नहीं होती है और उसे शिशु को स्तनपान कराना बंद कर देना चाहिए।
प्रोटीन (Protein):
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 0-6 माह तक के लिए धात्री माता के लिए साधारण स्त्री की अपेक्षा 25 ग्राम तथा 7-12 माह तक के लिए 18 ग्राम अतिरिक्त प्रोटीन की प्रस्तावना की है। प्राणिज भोज्य पदार्थ जैसे दूध, अंडा, मांस, मछली प्रोटीन प्राप्ति के उत्तम साधन है तथा इनसे उच्च कोटि का प्रोटीन प्राप्त होता है। अतः इसका सेवन किया जाना चाहिए। सभी प्रकार की दालें, सोयाबीन प्रोटीन का अच्छा स्रोत है । अतः भोजन में इनका उपयोग अवश्य किया जाना चाहिए।
लोहा(Iron):
माता के दूध में .03-.36 mg/ 100 ml लोहा उपस्थित रहता है। 850 ml दूध में .25 mg से 3.1 mg लोहा उपस्थित रहता है।
मां का दूध लोहा प्राप्ति का निकृष्ट साधन है इसलिए इसकी मात्रा बढ़ाए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है ICMR 1998 में लौह लवण बढ़ाए जाने की कोई सिफारिश नहीं की है। इन्हें लोहा साधारण स्त्री इतना ही चाहिए।
कैल्शियम (Calcium):
850 ml दूध से 290 mg कैल्शियम की प्राप्ति होती है। दूध में कैल्शियम की यह मात्रा माता के शरीर से ही प्राप्त होती हैं। अतः माता के आहार में कैल्शियम की मात्रा अधिक होनी चाहिए।
FAO / WHO के भोज्य विशेषज्ञ समिति ने धात्री माता के लिए 500 से 600 mg अतिरिक्त कैल्शियम की प्रस्तावना की है।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 600 mg प्रतिदिन अतिरिक्त कैल्शियम की अनुशंसा की है।
विटामिन | ए | (Vitamin | A | ):
WHO के पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, धात्री माता के 850 ml दूध से 420 माइक्रोग्राम विटामिन | ए | की प्राप्ति होती है। अतः माता के भोजन में विटामिन | ए | की मात्रा 450 माइक्रोग्राम बढ़ाई जानी चाहिए।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने साधारण स्त्री की अपेक्षा धात्री स्त्री के लिए 350 µg अतिरिक्त विटामिन | ए | तथा 1400 µg अतिरिक्त β कैरोटीन की प्रस्तावना की है।
राइबोफ्लैविन (Riboflavin):
850 ml मां के दूध से.32 mg राइबोफ्लैविन की प्राप्ति होती है। इसलिए माता के आहार में राइबोफ्लैविन की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए ताकि इसकी पूर्ति हो सके। ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 0 से 6 माह तक के धात्रीवस्था के लिए .3 mg तथा 7-12 माह तक के लिए .2 mg राइबोफ्लैविन की दैनिक मांग की प्रस्तावना की है।
थायमिन (Thiamine):
FAO/WHO के भोज विशेषज्ञों के अनुसार प्रति 1000 k.cal के लिए.4 mg थायमिन की आवश्यकता होती है। चूंकि धात्रीवस्था में कैलोरी मांग लगभग 1000 cal बढ़ जाती है। अतः .4 mg अतिरिक्त थायमिन की आवश्यकता होती है।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 1989 में 0-6 माह तक के लिए धात्री माता के लिए +.3 mg अतिरिक्त थायमिन की तथा 7-12 माह तक के लिए +.2 mg अतिरिक्त थायमिन की आवश्यकता बतायी है क्योंकि 6 माह में धात्री माता की कैलोरी मांग 550 कैलोरी तथा 7-12 माह में 400कैलोरी बढ़ जाती है। इसलिए थायमीन की आवश्यकता इसी के अनुसार बढ़नी चाहिए।
नियासिन (Niacin):
FAO/WHO के भोज्य विशेषज्ञों के अनुसार 6.6 mg/100 k.cal के लिए नियासिन की आवश्यकता होती है। इसलिए आहार में नियासिन की मात्रा भी बढ़ाई जानी चाहिए।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 1993 में 0-6 माह तक दूध पिलाने वाली माता के लिए साधारण स्त्री की अपेक्षा 4 mg तथा 7-12माह के लिए 3 mg अतिरिक्त नियासिन की प्रस्तावना की है।
फोलिक अम्ल (Folic Acid):
विकासशील देश की धात्री माताओं के शरीर में फोलिक अम्ल की काफी कमी होती है। अतः यह कमी माता के दूध में भी हो सकती हैं। फोलिक अम्ल के अभाव से रक्त अल्पता (Anemia) रोग हो जाता है।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों ने 1993 में साधारण स्त्री की अपेक्षा धात्री माता को 50 µg अतिरिक्त फोलिक अम्ल की प्रस्तावना की है।
विटामिन | बी 12′ (Vitamin | B 12 | ):
पर्निशियस रक्तअल्पता (Pernicious Anemia) से बचाव के लिए माता के आहार में विटामिन | बी12′ होना अत्यावश्यक है।
WHO के भोज्य विशेषज्ञों के अनुसार 850 ml माता के दूध में .2 µg विटामिन | B 12 | उपस्थित रहता है। दूध में विटामिन | B 12 | माता के शरीर से प्राप्त होता है। NRC, USA के अनुसार धात्री माता के आहार में 1.0 µg अतिरिक्त विटामिन | बी12′ होना चाहिए।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों के .5 µg अतिरिक्त विटामिन | बी12′ की आवश्यकता होती है।
विटामिन | सी | (Vitamin | C | Ascorbic Acid):
WHO के अनुसार माता के 850 ml दूध में 22 से 44 mg विटामिन | सी | उपस्थित रहता है। इसलिए माता के आहार में इसकी मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए।
ICMR के भोज्य विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिदिन धात्री माता के आहार में 40 mg तक विटामिन की आवश्यकता होने चाहिए। इसलिए इन्होंने (ICMR) 40 mg अतिरिक्त विटामिन | सी | की प्रस्तावना की है।
धात्री माता के लिए 1 दिन का संतुलित आहार- उच्च दामों पर, माध्यम दामों पर तथा कम दामों पर निम्नानुसार प्रदर्शित किया गया है।
इसे मात्र एक नमूना समझा जाना चाहिए।
निम्न आय वर्ग की धात्री माता के लिए 1 दिन की आहार तालिका
(One Day Diet Plan for a Lactating Mother: Low Income Group)
समय
आहार
मात्रा
सुबह 6:00 बजे
चाय (कम दूध वाली तथा गुड डालकर)
मठरी
1 कप
2
नाश्ता 8.30 बजे
पालक मिला हुआ रोटी,
दही, (गुड डाल कर)
धनिया पत्ती की चटनी
2
1 कटोरी
1 चम्मच
11:00 बजे
मौसम की सब्जियों का सूप
1 छोटा गिलास
दोपहर का खाना 1.30 बजे
दाल (मूंग),
चावल
मौसम की सब्जियों का सलाद
रोटी
भिंडी की सूखी सब्जी
रायता (दही, प्याज डालकर)
1 कटोरी
1 प्लेट
1 प्लेट
2-3
1 कटोरी
1 कटोरी
शाम की चाय 4.30 बजे
चाय (गुड वाली)
भुना चना या मूंगफली
1 कप
50 ग्राम
रात्रि का भोजन 8.30 बजे
रोटी
आलो, टमाटर की रसेदार सब्जी
टमाटर, प्याज का सलाद
3-4
1 कटोरी
1 प्लेट
सोते समय
दुध
1 कप
मध्यम आय वर्ग की धात्री माता के लिए 1 दिन की आहार तालिका
(One Day Diet Plan for Lactating Mother: Middle Income Group)
समय
आहार
मात्रा
सुबह 6:00 बजे
दूध
1 गिलास
नाश्ता 8.30 बजे
आलू के पराठे
टमाटर की चटनी
दही (शक्कर के साथ)
चाय
2
2 बड़े चम्मच
1 कटोरी
1 कप
11:00 बजे
टमाटर, पालक का सूप
1 कप
दोपहर का खाना 1.30 बजे
रोटी
चावल
आलू मेथी की सूखी सब्जी
अरहर की दाल
गोभी, टमाटर की रसेदार सब्जी
खीर
मौसम की सब्जियों का सलाद
पापड़
कस्टर्ड
2-3
1 प्लेट
1 कटोरी
1 कटोरी
1 कटोरी
1 कटोरी
1 प्लेट
1 प्लेट
1
1 कटोरी
शाम की चाय 4.30 बजे
आमलेट
काफी
1 अंडे का
1कप
रात्रि का भोजन 9.00 बजे
रोटी
मटर पनीर की सब्जी (रसेदार)
बैगन, आलू, टमाटर की सूखी सब्जी
सलाद
पापड़
खीर (चावल की)
2-3
1 कटोरी
1 कटोरी
1 प्लेट
1
1 कटोरी
सोते समय
दूध
1 गिलास
उच्च आय वर्ग की धात्री माता के लिए 1 दिन की आहार तालिका
(One Day Diet Plan for a Lactating Mother: High Income Group)
समय
आहार
मात्रा
सुबह 6:00 बजे
दूध किशमिश डालकर
1 गिलास
नाश्ता 9.00 बजे
आलू पनीर पराठा
दही
अंडा
सेव
2
1 कटोरी
1
1
11:00 बजे
फलों का रस
1 गिलास
दोपहर का खाना 1.30 बजे
रोटी
चावल
मखनिया दाल
मटन करी (सामिष के लिए)
सलाद
2-3
1/2 प्लेट
1 कटोरी
1 कटोरी
1 प्लेट
निरामिष के लिए
मलाई का कोफ्ता
आलू गोभी मटर
गाजर की सूखी सब्जी
मखाने की खीर
पापड़
1 कटोरी
1 कटोरी
1 कटोरी
1
शाम की चाय 4.30 बजे
भुना हुआ काजू
कॉफी
केला
50 ग्राम
1 कप
1
रात्रि का भोजन 9.00 बजे
रोटी
पालक, पनीर
भिंडी की सूखी सब्जी
सलाद
चटनी
पापड़
काजू कतली
2-3
1 कटोरी
1 कटोरी
1 प्लेट
1 चम्मच
1
2 पीस
सोते समय
दूध
1 गिलास
धात्री माता के लिए आहार नियोजन करते समय ध्यान देने योग्य बातें-
(1) दूध, अंडा, मांस, मछली आदि भोज्य पदार्थों की मात्रा अधिक होनी चाहिए क्योंकि इनमें उत्तम प्रकार का प्रोटीन मिलता है। आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
(2) फलों का रस, सब्जियों का सूप, छाछ एवं तरल भोज्य पदार्थों की मात्रा अधिक होनी चाहिए। धात्री माता को अधिक जल पीना चाहिए।
(3) दाल की मात्रा आहार में बढ़ा दी जानी चाहिए।
(4) अनाज की मात्रा भी बढ़ायी जानी चाहिए।
(5) अधिक मिर्च- मसालेदार भोज्य पदार्थ नहीं खाना चाहिए।
(6) गरिष्ठ, तला-भूना एवं बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।
(7) कैल्शियम की प्राप्ति के लिए दूध एवं दूध से बने व्यंजनों को सम्मिलित किया जाना चाहिए।
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