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गर्भावस्था की तीसरी तिमाही : मां के शरीर में आने वाले बदलाव,जटिलताएं और शिशु का विकास
जानिए प्रेग्नेंसी की तीसरी तिमाही में मां के शरीर में क्या बदलाव आते हैं।
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गर्भावस्था के नौ महीने मां और शिशु के लिए बेहद नाजुक होते हैं। इस समय में मां के शरीर में कई तरह के बदलाव आते हैं तो शिशु का विकास चल रहा होता है। प्रेग्नेंसी के नौ महीनों को तीन तिमाही में बांटा गया है जैसे कि प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही (शुरुआती तीन महीने), गर्भावस्था की दूसरी तिमाही (इसके बाद के अगले तीन महीने) और तीसरी तिमाही (प्रेग्नेंसी के आखिरी तीन महीने)। यहां हम आपको प्रेग्नेंसी की तीसरी तिमाही में मां के शरीर में आने वाले बदलावों प्रेग्नेंसी से जुड़ी जटिलताओं और शिशु के विकास के बारे में बताने जा रहे हैं।
कब शुरू होती है तीसरी तिमाही
गर्भावस्था 40 सप्ताह की होती है और 6 महीने के बाद 28वें हफ्ते से लेकर 40वें हफ्ते तक गर्भावस्था रहती है। प्रेगनेंट महिला के लिए तीसरी तिमाही शारीरिक और भावनात्मक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होती है। 37वें हफ्ते तक शिशु का संपूर्ण विकास हो चुका होता है और अब वो जन्म लेने के लिए तैयार होता है।
तीसरी तिमाही में शरीर में आते हैं ये बदलाव
तीसरी तिमाही में प्रेगनेंट महिला को दर्द और सूजन की समस्या अधिक हो सकती है।
इस दौरान महिलाओं को डिलीवरी को लेकर भी चिंता होने लगती है। इसके अलावा तीसरी तिमाही में कई और भी चीजें होती हैं, जैसे कि :
शिशु का बहुत ज्यादा मूवमेंट होना
कभी-कभी गर्भाशय का टाइट होना
बार-बार पेशाब आना
एड़ियों, उंगलियों या चेहरे पर सूजन आना
सीने में जलन
ब्रेस्ट को छूने पर दर्द होना जिसमें से पतला दूध भी आ सकता है
सोने में दिक्कत होना
अगर आपको नीचे बताए गए लक्षण महसूस हो रहे हैं तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं :
दर्द की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि होना
कभी भी ब्लीडिंग शुरू हो जाना
शिशु की एक्टिविटी में अचानक कमी आना
अत्यधिक सूजन
तेजी से वजन बढ़ना
तीसरी तिमाही में शिशु का विकास
लगभग 32वें सप्ताह के आसपास शिशु की हड्डियांं पूरी तरह से बन चुकी होती हैं। अब बच्चा आंखें खोलने और बंद भी करने लग सकता है और उसे रोशनी महसूस होने लगती है। शिशु का शरीर खनिज पदार्थों जैसे कि आयरन और कैल्शियम को स्टोर करने लगता है।
36वें हफ्ते तक शिशु का सिर नीचे योनि की ओर आ जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो डॉक्टर बच्चे की पोजीशन को बदलने या सिजेरियन ऑपरेशन करवाने की सलाह देते हैं।
37वें हफ्ते के बाद शिशु को फुल टर्म माना जाता है और उसके अंग खुद काम करने के लिए तैयार होते हैं। अब बच्चा 19 से 21 इंच तक लंबा होता है और उसका वजन लगभग 6 से 9 पाउंड हो सकता है।
डॉक्टर को कब दिखाएं
तीसरी तिमाही में आपको जल्दी डॉक्टर के पास चेकअप करवाते रहना चाहिए। 36वें हफ्ते के आसपास शिशु के लिए हानिकारक बैक्टीरियम की जांच के लिए ग्रुप बी स्ट्रेप टेस्ट करवाने की कह सकते हैं। अगर टेस्ट पॉजीटिव आता है तो डॉक्टर एंटीबायोटिक देंगे।
डॉक्टर वजाइनल एग्जाम करेंगे। डिलीवरी के दौरान जन्म नलिका को खोलने के लिए गर्भाशय ग्रीवा पतली और मुलायम हो जाती है।
गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में आने वाली जटिलताएं
प्रेग्नेंसी के 20वें हफ्ते के बाद प्रेगनेंट महिलाओं को इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है। इसे तुरंत इलाज की जरूरत होती है और अगर समय पर सही इलाज न मिल पाए या एक्लेमप्सिया या दौरे पड़ सकते हैं या किडनी फेल हो सकती है और कुछ दुर्लभ मामलों मे मां और शिशु की मृत्यु तक हो सकती है।
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इंट्रायूटरिन ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन
कुछ दुर्लभ मामलों में भ्रूण का विकास रुक सकता है। इस स्थिति को इंट्रायूटरिन ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन कहते हैं। कई बार अनुवांशिक कारणों से भी शिशु का आकार छोटा हो सकता है। डायबिटीज, एनीमिया, कुपोषण, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी से जुड़ी समस्या जैसे कुछ कारणों की वजह से ऐसा हो सकता है। अगर शिशु गर्भ में विकास करना बंद कर देता है तो डॉक्टर तुरंत सिजेरियन डिलीवरी की सलाह देते हैं।
प्लेसेंटा एब्रप्शन
कुछ दुर्लभ मामलों में यहां तक कि प्रसव पीड़ा शुरू होने से पहले ही प्लेसेंटा और गर्भाशय अलग हो सकते हैं। इस स्थिति को प्लेसेंटल एब्रप्शन कहते हैं। ये बहुत ही गंभीर स्थिति है जिसमें गर्भस्थ शिशु की मृत्यु भी हो सकती है।
प्लेसेंटा प्रीविया
गर्भ में शिशु को प्लेसेंटा के जरिए ही भोजन और पोषण मिलता है। जन्म के बाद शिशु के साथ ही प्लेसेंटा शरीर से बाहर आ जाती है। हालांकि, प्लेसेंटा प्रीविया में शिशु के जन्म से पहले ही प्लेसेंटा बाहर आ जाती है और गर्भाशय ग्रीवा खुल जाता है।
इसके अलावा तीसरी तिमाही के दौरान अनिद्रा, जेस्टेशनल डायबिटीज, सांस लेने में दिक्कत, डिप्रेशन और डीप वेन थोम्बोसिस की दिक्कत भी हो सकती है।
गर्भावस्था के इस चरण को आसान और सुखदायी बनाने के लिए संतुलित आहार लें और नियमित डॉक्टर के पास चेकअप करवाने जाती रहें। इससे मां और शिशु दोनों ही स्वस्थ रहेंगे।
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