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देखभाल और शिक्षा के साथ-साथ सामुदायिक सेवाओं के समर्थन से, डाउन सिंड्रोम वाले बच्चे अर्ध-आत्मनिर्भर रूप से जी सकते हैं। यदि गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक नहीं हुई है, तो आप हांग कांग में कानूनों के तहत गर्भपात करने की संभावना के बारे में भी अप
ने डॉक्टर से सलाह ले सकती हैं।
पेरेंट्स को इन चीज़ों पर देना चाहिए धैर्यपूर्वक ध्यान
1 विकास:
डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कुछ छोटे आकार के होते हैं। उनका विकास भी धीमी गति से होता है। छोटे आकार के होने के बावजूद उनका वज़न काफी तेज़ी से बढ़ता है। पेरेन्ट्स को यह ध्यान रखना होता है कि बच्चों का वज़न ज्यादा न बढ़ने पाए। इसलिए उन्हें बच्चों को शारीरिक व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उन्हें अधिक कैलोरीयुक्त भोजन पर नियंत्रण रखना चाहिए।
इन बच्चों के विकास पर नियमित रूप से 2,4, 6, 9 12, 15, 18 और 24 महीने की आयु में और फिर वयस्कता के दौरान साल में एक बार अवश्य निगरानी करनी चाहिए।
2 टीकाकरण
इन बच्चों की इम्युनिटी काफी कमज़ोर होती है, इसलिए उन्हें कुछ ऐसे रोगों से बचाव के टीके, सलाह-मश्विरा और नियमित अंतराल से लेने चाहिए जिससे बचाव हो सके। इनमें हर साल दी जाने वाली फ्लू वैक्सीन भी शामिल है।
3 हृदय
अपने बच्चे की दिल के रोगों की जांच भी करवाएं और यदि कोई विकार सामने आए, तो नियमित इको तथा चेक अप जरूरी है। डाउन सिंड्रोम से प्रभावित करीब पचास फीसदी बच्चों में हृदय विकार होते हैं। लेकिन ऐसे कुछ विकारों में इलाज संभव होता है।
4 हार्मोन
डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों में थायराइड हार्मोन की कमी हो सकती है। जन्म के समय, 6 महीने, 12 महीने और इसके बाद हर साल टीएसएच जांच करानी चाहिए। यदि जरूरी हो तो हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी भी शुरू की जा सकती है।
कुछ बच्चों को टाइप1 डायबिटीज़ भी हो सकता है। इंसुलिन थेरेपी से लक्षणों और जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
5 सुनना
ये बच्चे श्रवण विकारों से भी ग्रस्त हो सकते हैं। इसलिए जन्म पर, 6 माह के होने पर और उसके बाद हर साल कानों की जांच भी अवश्य करवाएं। करीब 80 प्रतिशत बच्चों में सुनने की किसी न किसी प्रकार की समस्या होती है और उन्हें हियरिंग एड्स की आवश्यकता हो सकती है।
6 नेत्र ज्योति
अधिकांश बच्चों में दृष्टि संबंधी विकार, जैसे नज़दीक या दूर की नज़र में दोष होना या एस्टिगमेटिज़्म हो सकता है। इसके लिए नियमित रूप से आंखों की जांच करवाना आवश्यक है।
होम देखभाल के उपाय अगर आप डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे के पेरेंट्स हैं, तो ये 13 जरूरी बातें हैं आपके लिए
अगर आप डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे के पेरेंट्स हैं, तो ये 13 जरूरी बातें हैं आपके लिए
डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे के लिए तो उसका जीवन जटिल होता ही है, पर इससे भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण है पेरेंट्स के लिए ऐसे बच्चों को अच्छी परवरिश देना। यहां आपको बहुत सारे धैर्य और जागरुकता की जरूरत है।
कुछ बच्चों में लर्निंग संबंधी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
डाउन सिंड्रोम (Down Syndrome) आजीवन जारी रहने वाली स्वास्थ्य स्थिति है और यह जन्मजात होती है। डाउन सिंड्रोम से प्रभावित लोगों में एक क्रोमोसोम अतिरिक्त होता है। इन बच्चों को जीवनभर मेडिकल तथा लर्निंग से जुड़ी समस्याएं पेश आती हैं।
इस सिंड्रोम से पीड़ित बच्चों को नियमित रूप से हेल्थकेयर की जरूरत पड़ती है। ऐसे बच्चों को पालना किसी भी पेरेन्ट के लिए वाकई चुनौतीपूर्ण होता है। डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों के पेरेन्ट्स को भली-भांति और सेहतमंद तरीके से बच्चों की देखभाल के लिए निम्न क्षेत्रों में ध्यान देना चाहिए:
पेरेंट्स को इन चीज़ों पर देना चाहिए धैर्यपूर्वक ध्यान
1 विकास:
डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कुछ छोटे आकार के होते हैं। उनका विकास भी धीमी गति से होता है। छोटे आकार के होने के बावजूद उनका वज़न काफी तेज़ी से बढ़ता है। पेरेन्ट्स को यह ध्यान रखना होता है कि बच्चों का वज़न ज्यादा न बढ़ने पाए। इसलिए उन्हें बच्चों को शारीरिक व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उन्हें अधिक कैलोरीयुक्त भोजन पर नियंत्रण रखना चाहिए।
इन बच्चों के विकास पर नियमित रूप से 2,4, 6, 9 12, 15, 18 और 24 महीने की आयु में और फिर वयस्कता के दौरान साल में एक बार अवश्य निगरानी करनी चाहिए।
2 टीकाकरण
इन बच्चों की इम्युनिटी काफी कमज़ोर होती है, इसलिए उन्हें कुछ ऐसे रोगों से बचाव के टीके, सलाह-मश्विरा और नियमित अंतराल से लेने चाहिए जिससे बचाव हो सके। इनमें हर साल दी जाने वाली फ्लू वैक्सीन भी शामिल है।
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3 हृदय
अपने बच्चे की दिल के रोगों की जांच भी करवाएं और यदि कोई विकार सामने आए, तो नियमित इको तथा चेक अप जरूरी है। डाउन सिंड्रोम से प्रभावित करीब पचास फीसदी बच्चों में हृदय विकार होते हैं। लेकिन ऐसे कुछ विकारों में इलाज संभव होता है।
4 हार्मोन
डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों में थायराइड हार्मोन की कमी हो सकती है। जन्म के समय, 6 महीने, 12 महीने और इसके बाद हर साल टीएसएच जांच करानी चाहिए। यदि जरूरी हो तो हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी भी शुरू की जा सकती है।
कुछ बच्चों को टाइप1 डायबिटीज़ भी हो सकता है। इंसुलिन थेरेपी से लक्षणों और जटिलताओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
5 सुनना
ये बच्चे श्रवण विकारों से भी ग्रस्त हो सकते हैं। इसलिए जन्म पर, 6 माह के होने पर और उसके बाद हर साल कानों की जांच भी अवश्य करवाएं। करीब 80 प्रतिशत बच्चों में सुनने की किसी न किसी प्रकार की समस्या होती है और उन्हें हियरिंग एड्स की आवश्यकता हो सकती है।
6 नेत्र ज्योति
अधिकांश बच्चों में दृष्टि संबंधी विकार, जैसे नज़दीक या दूर की नज़र में दोष होना या एस्टिगमेटिज़्म हो सकता है। इसके लिए नियमित रूप से आंखों की जांच करवाना आवश्यक है।
7 विकास
डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त लगभग सभी बच्चों में बौद्धिक विकास अवरुद्ध होता है, लेकिन इसकी डिग्री अलग-अलग हो सकती है। इसलिए विकास संबंधी सेवाओं की मदद लें। आरंभिक हस्तक्षेप के प्रोग्राम लाभकारी हो सकते हैं।
8 गर्दन की स्थिरता
डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त कुछ बच्चों में स्पाइन या नैक बोन्स की समस्या हो सकती है। हर दिन व्यायाम उनके लिए जरूरी होता है। यदि निम्न में से कोई समस्या दिखे, तो अपने बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाएं-
1 गर्दन में कड़ापन या दर्द होना
2 मल/पेशाब के पैटर्न में बदलाव
3 चलने में बदलाव
4 बांह और पैरों के इस्तेमाल में बदलाव
5 सिर का झुकना
6 बांह या पैरों का सुन्न पड़ना
9 नींद संबंधी समस्या
डाउन सिंड्रोम से प्रभावित बच्चों को रात में सोने में परेशानी हो सकती है। खासतौर से कम मांसपेशियों वाले बच्चों में यह समस्या ज्यादा होती है। इसलिए 4 साल की उम्र में स्लीप स्टडी करवाएं।
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