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जॉन्डिस (पीलिया) होने के कारण
वैसे कारण जिनका संबंध गर्भावस्था से है:

हाइपरमेसिस ग्रेविडरम– यह एक ऐसी कंडीशन है जिसमें होने वाली माँ को बहुत ज्यादा मतली और उल्टी होती है, इलेक्ट्रोलाइट इम्बैलेंस और वजन घटाने लगता है।

इंट्राहेपेटिक कोलेस्टेसिस– इसमें आपको गंभीर रूप से खुजली होती है, क्योंकि पित्त के नॉर्मल फ्लो में बांधा उत्पन्न होती है।

प्री-एक्लेमप्सिया– एक ऐसी कंडीशन जिसमें आपका ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ा रहता है और पेशाब में प्रोटीन होता है।

हेल्प (HELLP) सिंड्रोम- यह एक लीवर डिसऑर्डर है, जिसे प्री-एक्लेमप्सिया का एक गंभीर रूप माना जाता है और इससे आपकी जान को भी खतरा हो सकता है।

एक्यूट फैटी लीवर- लीवर डिसऑर्डर लीवर में अत्यधिक फैट जमने के कारण होता है।


एक गर्भवती महिला में जॉन्डिस के संकेत और लक्षण

लीवर संबंधी बीमारी से जुड़े कुछ कॉमन संकेत और लक्षण:

आँखों का पीला पड़ना
त्वचा में पीलापन
गहरे रंग का पेशाब
खुजली
हल्के रंग का मल त्याग
कमजोरी
भूख में कमी
सरदर्द
मतली और उल्टी
बुखार
लीवर के आसपास सूजन होना
पैर, टखने, और पंजों में सूजन


गर्भावस्था के दौरान जॉन्डिस का निदान

गर्भावस्था के दौरान लीवर की बीमारी का निदान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है और यह लैब की जाँच पर निर्भर करता है। इसके संकेत और लक्षण ज्यादातर बहुत विशिष्ट नहीं होते हैं और इसमें उल्टी, और पेट में दर्द आदि लक्षण शामिल हो सकते हैं। जॉन्डिस का साइड इफेक्ट्स माँ और बच्चे दोनों पर पड़ सकता है जिसके लिए कई सारे टेस्ट कराने आवश्यकता पड़ सकती है। यहाँ जॉन्डिस का निदान करने के लिए कुछ मुख्य तरीके बताए गए हैं:

क्लिनिकल जाँच
जाँच के दौरान स्किन चेंजेस दिखाई देना जैसे हथेली का लाल पड़ना और त्वचा पर घाव आदि। ये परिवर्तन गर्भवती महिलाओं में एस्ट्रोजन लेवल हाई होने के कारण होते हैं और यह लगभग 60% हेल्दी प्रेगनेंसी में होते हैं।

लैब टेस्ट के परिणामों में अब्नोर्मलिटी होना
लैब टेस्ट जिसमें सीरम में एल्ब्यूमिन (एक प्लाज्मा प्रोटीन) लेवल कम होता है, एएलपी या एल्कलाइन फॉस्फेट का उच्च होना, प्रोथ्रोम्बिन टाइम (पीटी) का उच्च होना समस्या की ओर इशारा करता है।

सोनोग्राफी या इमेजिंग
निदान के लिए अल्ट्रासोनोग्राफी चुनना एक बेहतर विकल्प है, क्योंकि इसमें रेडिएशन नहीं होता है, जिससे फीटस को कोई खतरा हो। मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह टोमोग्राफी (सीटी) और एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलेंग्जोपैंक्रीएटोग्राफी (ईआरसीपी) की तुलना में ज्यादा सुरक्षित होता है, जो लेकिन इसमें बच्चे को रेडिएशन से नुकसान होने का खतरा होता है।

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