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प्रेग्नेंसी यानी गर्भावस्था कंफर्म होते ही सलाह मिलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दोस्तों, रिश्तेदारों और इंटरनेट से मिल रही सैंकड़ों सलाह कई बार आपके कन्फ्यूजन को बढ़ा देती है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि मां बनने वाली महिला को यह पता हो कि उसे कब क्या करना है?
गर्भावस्था में महिलाएं कई तरह की समस्याओं से गुजरती हैं। ऐसे में उन्हें कई बार दर्द निवारक दवाइओं को का इस्तेमाल करना पड़ता है लेकिन इन दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल से महिला और उसके शिशु को नुकसान हो सकता है
प्रेग्नेंसी कंफर्म होते ही सलाह का सिलसिला शुरू हो जाता है। इधर-उधर से आने वाली सलाहों से कई बार कन्फ्यूजन बढ़ जाता है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि मां बनने वाली महिला को यह पता हो कि उसे कब क्या करना है? क्या नहीं? डॉक्टरों के मुताबिक, गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीने बहुत मायने रखते हैं। अगर इस दौर में महिला सावधानी से रहे, तो उनका बच्चा न प्रीमैच्योर होता है, न ही शारीरिक रूप से विकलांग। इन्हीं शुरुआती 3 महीनों के बारे में डॉक्टरों से बातचीत के बाद जानकारी दे रहे हैं परीक्षित निर्भय:
डॉक्टरों के मुताबिक, कई महिलाएं गर्भावस्था के शुरुआती तीन महीने यानी फर्स्ट ट्राइमेस्टर को बेहद हलके में लेती हैं, जबकि यह समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी दौरान गर्भ में भ्रूण का विकास होना शुरू होता है। आपका शरीर कई तरह के शारीरिक और हार्मोनल बदलावों से गुजरता है। ये महीने सबसे ज्यादा चुनौती-भरे भी होते हैं, क्योंकि इस दौर में होने वाले बदलाव आपके लिए बिल्कुल नए होते हैं। खाने के टेस्ट और स्किन में भी बदलाव आने लगते हैं। मानसिक रूप से चिड़चिड़ापन भी स्वाभाविक है। इस वक्त पति को खासतौर पर धैर्य रखना चाहिए और पत्नी को सहारा देना चाहिए। इन्हीं महीनों में अबॉर्शन की आशंका सबसे ज्यादा होती है।
इनका रखें सबसे ज्यादा ख्याल
डॉक्टरों का कहना है कि प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में ज्यादा भीड़भाड़, प्रदूषण और रेडिएशन वाली जगह पर जाने से बचना चाहिए। ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर ट्रैवलिंग करने से भी बचें। मॉर्निंग सिकनेस से बचने के लिए नींबू-पानी या अदरक की चाय पी जा सकती हैं। दिनभर में चार या पांच बार तरल चीजें, जैसे छाछ, नींबू-पानी, नारियल पानी, फलों का जूस या शेक पीएं। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होगी। इन तीन महीनों में बच्चे के अंग बनने शुरू होते हैं। ऐसे में खाने की मात्रा से ज्यादा उसकी क्वॉलिटी पर ध्यान देना जरूरी है।
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तैयार करें डाइट चार्ट
शुरुआती तीन महीनों में प्रोटीन, कैल्शियम और आयरन से भरपूर चीजें ज्यादा खानी चाहिए। अपने खाने में दाल, पनीर, अंडा, नॉनवेज, सोयाबीन, दूध, दही, पालक, गुड़, अनार, चना, पोहा, मुरमुरे को शामिल करें। फल और हरी पत्तेदार सब्जियां भी खूब खाएं। शरीर में पानी की कमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए, क्योंकि डिलिवरी के वक्त काफी खून की जरूरत पड़ती है। बच्चा भी फ्लूइड में ही रहता है। हर 2 से 3 घंटों में नियमित मात्रा में कुछ ना कुछ जरूर खाते रहें। बच्चे के सही विकास के लिए आपको अपना वजन भी पहले तीन महीनों में आधा से लेकर 2 किलो तक बढ़ाना चाहिए।
ओमेगा होना चाहिए आहार में
बच्चे के मस्तिष्क, तंत्रिका प्रणाली और आंखों के विकास के लिए अपने आहार में ओमेगा-3 फैटी एसिड के सेवन को भी बढाएं। बच्चे के दिमाग के विकास के लिए ओमेगा-3 और ओमेगा-6 बहुत जरूरी है। फिश लिवर ऑयल, ड्राइफ्रूट्स, हरी पत्तेदार सब्जियों और सरसों के तेल में यह अच्छी मात्रा में मिलते हैं। आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां खाना भी शुरू कर दें। इससे शरीर में खून की कमी नहीं होती है।
शुरुआती 3 महीनों में इनसे बचें
- कई बार महिलाएं डॉक्टर की सलाह लिए बिना कुछ दवाइयां खाना भी शुरू कर देती हैं। लेकिन दवा के गर्भनाल के माध्यम से बच्चे के खून में प्रवेश करने की आशंका रहती है। इसलिए पहले तीन महीनों में डॉक्टर की सलाह के बिना कोई भी दवा ना खाएं।
- इस दौरान कच्चे मांस, कच्चे अंडे और पनीर के सेवन से भी पहरेज करें, क्योंकि इनमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया आपके शिशु की सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
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- बड़े शहरों में प्रदूषण की समस्या बेहद गंभीर है। हवा में फैले हानिकारक कणों के चलते गर्भपात की आशंका भी बनी रहती है।
- शराब और सिगरेट का सेवन न करें। सिगरेट पीने वालों से भी दूर रहें। शराब गर्भनाल के माध्यम से बच्चे के खून में प्रवेश करके उसके शारीरिक और मानसिक विकास में कई तरह की बाधाएं पैदा कर सकती है।
- तनाव भी आपके गर्भ में पल रहे शिशु के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है। गर्भावस्था की शुरुआत में कई कारणों के चलते कई महिलाएं तनाव में रहने लगती हैं, जिसका बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इसके चलते कई बार गर्भपात भी हो जाता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान जितना हो सके, खुश रहें।
- अच्छा म्यूजिक सुनें, अच्छी किताबें पढ़ें, अपने आप को व्यस्त रखें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार एक्सरसाइज करें।
- गर्भावस्था के दौरान डाइटिंग न करें। इससे शरीर में आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन, कई तरह के खनिजों और पोषक तत्वों की कमी हो जाती है।
- इस दौरान हॉट टब और सॉना बाथ का उपयोग भी न करें, क्योंकि इससे आपके शरीर का तापमान अचानक बढ़ सकता है। इससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है, जो बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
- प्रेग्नेंसी के दौरान किसी खास चीज को खाने का दिल ज्यादा करने लगता है। ऐसे में किसी एक ही चीज को बार-बार खाने के बजाय बाकी चीजों को भी खाने में शामिल करें।
- ज्यादा तला-भुना और मसालेदार खाना न खाएं। इससे गैस और पेट में जलन हो सकती है। जो भी खाएं, फ्रेश खाएं। बाहर के खाने से इंफेक्शन होने का खतरा होता है, इसलिए बाहर खाने से बचें।
गर्भावस्था में दर्द निवारक दवा लेना बच्चे के लिए खतरनाक
गर्भावस्था में महिलाएं कई तरह की समस्याओं से गुजरती हैं। ऐसे में उन्हें कई बार दर्द निवारक दवाइओं को का इस्तेमाल करना पड़ता है लेकिन इन दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल से महिला और उसके शिशु को नुकसान हो सकता है
एक अध्ययन में पता चला है कि अगर महिला गर्भावस्था के पहले 24 सप्ताह में आईब्यूफेन का इस्तेमाल करती हैं तो इससे आगे चल कर कन्या भ्रूण की प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।
एक समय में एक से ज्यादा या अलग-अलग तरह की दर्दनिवारक दवाएं लेने से महिलाओं के बेटों में नपुंसकता का खतरा सात गुना तक बढ़ जाता है।
पैरासिटामॉल, एस्प्रिन, आईब्यूफेन जैसी दवाओं का लम्बे समय तक इस्तेमाल से भ्रूण के प्रजनन अंगों का विकास प्रभावित हो सकता है।
दर्दनिवारक दवाओं से भ्रूण के हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, जिससे उसमें विकृतियां हो सकती हैं। भविष्य में टेस्टीकल कैंसर का खतरा भी हो सकता है।
गर्भावस्था के 4 से 6 महीने के बीच केवल एक दर्दनिवारक दवा लेने से भी सामान्य महिलाओं के मुकाबले इन महिलाओं के बच्चों में विकृति का खतरा दोगुना हो जाता है। पैरासीटामॉल से भ्रूण के विकास में दोगुनी बाधा होती है।
3 महीनों में जरूरी टेस्ट
प्रेग्नेंसी कन्फर्म होते ही सबसे पहले किसी अच्छी गायनी डॉक्टर के पास जाकर सलाह लें और रजिस्ट्रेशन कराएं। सेहत और मेडिकल हिस्ट्री के मुताबिक डॉक्टर आपको कुछ टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं।
- हिमोग्लोबिन, कैल्शियम, ब्लड शुगर, यूरीन और एचआईवी टेस्ट आपको जरूर कराना चाहिए। ये टेस्ट हर तीन महीने में कराए जाते हैं।
- अगर किसी तरह की कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं है, तो आमतौर पर बच्चे की ग्रोथ का पता लगाने के लिए डॉक्टर तीन बार अल्ट्रासाउंड टेस्ट कराते हैं। अल्ट्रासाउंड टेस्ट दूसरे महीने में बच्चे की धड़कन जानने के लिए, चौथे महीने में बच्चे का विकास देखने के लिए और आखिरी महीने में बच्चे की स्थिति देखकर डिलिवरी प्लान करने के लिए।
- प्रेग्नेंसी के दौरान मिर्गी, हाइपोथायरॉइड और थैलसीमिया के लिए भी जांच कराई जाती है। अगर पैरंट्स में से किसी में थैलसीमिया के लक्षण हैं, तो बच्चे के भी इससे पीड़ित होने की आशंका 25 फीसदी बढ़ जाती है। अगर जांच में बच्चा इंफेक्टेड पाया जाता है, तो डॉक्टर की सलाह लेकर अबॉर्शन कराना ही बेहतर होता है।
- शुरू के तीन महीने में मंथली चेकअप काफी होता है। कोई परेशानी होने पर 15 दिनों में भी जांच की जाती है। बच्चे के 28 हफ्ते का होने पर दो हफ्ते में एक बार चेकअप जरूरी होता है।
इन बातों का रखें खास ख्याल
- भारी वजन न उठाएं
- ज्यादा डांस न करें
- सीढ़ियां नहीं कूदें
- हील न पहनें
- ज्यादा ड्राइविंग न करें
- लंबी यात्रा न करें
- रस्सी न कूदें
- कमर से झुकने के बजाय घुटने मोड़कर बैठें
गर्भावस्था में दर्द निवारक दवा लेना बच्चे के लिए खतरनाक
गर्भावस्था में महिलाएं कई तरह की समस्याओं से गुजरती हैं। ऐसे में उन्हें कई बार दर्द निवारक दवाइओं को का इस्तेमाल करना पड़ता है लेकिन इन दर्द निवारक दवाओं के इस्तेमाल से महिला और उसके शिशु को नुकसान हो सकता है
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