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शरीर में आत्मा कहाँ विद्यमान है ?
ब्लॉग द्वारा Ravi Kant
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व्यूज
आध्यात्मिक डायरी में जोड़ें।
शरीर में आत्मा कहाँ विद्यमान है
कृपया अंत तक अवश्य पढ़ें तथा विश्वास रखें कि शीर्षक का उत्तर आपको अवश्य मिलेगा.
सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार कण-कण में ईश्वर अथवा सृष्टि विद्यमान है. यदि हर कण में ईश्वर विद्यमान है तो हमें मंदिरों में ईश्वर के दर्शन हेतु क्यों अपने शरीर को कष्ट देकर जाना पड़ता है ! कण तो हर जगह हैं. हमारे पैरों के नीचे, हमारे आसपास की वस्तुओं में, यहाँ तक कि हम स्वयं भी कण-कण के जुड़े होने के कारण ही एक शरीर रूप में विद्यमान हैं. इस लेख में मैं अभी ग्रंथों एवं सम्बंधित श्लोकों को उद्धृत नहीं करूँगा क्योंकि वे अभी मेरे पास (जिस स्थान पर मैं यह लेख लिख रहा हूँ, उस स्थान पर) उपलब्ध नहीं हैं तथा इन कठिन श्लोकों एवं उनमें प्रयुक्त क्लिष्ट संस्कृत शब्दावली का अर्थ अधिकांश लोगों को समझ नही आ सकता है. शास्त्रार्थों का गूढ़ अध्ययन कर आये विभिन्न धर्मों एवं पंथों के विद्वान् भी कठिन शब्दावली का अर्थ अपनी समझ के अनुसार करते हैं तथा उनकी विवेचना करने पर अर्थ का अनर्थ साक्षात दिखता भी है. तर्क समझना कठिन होता है किन्तु कुतर्क तत्काल एवं आसानी से मानने योग्य प्रतीत होते हैं. सनातन धर्म के सुनियोजित विखंडन हेतु तर्क अथवा शास्त्रार्थ करने आये विभिन्न धर्मों एवं पंथों के लोग एकमत होकर भावार्थ का अनर्थ कर देते हैं तथा समाज, जो कि सनातन अथवा हिन्दू होने की सतही परंपरा या सही शब्दों में कहें तो फॉर्मेलिटी ही निर्वाह कर रहा है, तत्काल अपने ग्रंथों के विरुद्ध विद्वान् हो जाता है एवं अन्य को भी यही उपदेश प्रसारित करने लगता है. अच्छी बातें, सत्य या नियम कठिन होते हैं, इनका स्वयं पालन करना एवं दूसरों को भी इनके लिए बाध्य करना भी कठिन होता है. बुरी बातें, असत्य तथा नियमों का उल्लंघन आसान होता है तथा इनमें आनंद भी तत्काल मिलता है. इसलिए इनका प्रचार या कहें दूसरों को प्रेरित करना हर किसी के लिए आसान होता है. हम स्वयं तो संस्कृत जानते नहीं, धर्मग्रन्थ पढ़ते नहीं, और यदि पढ़ते भी हों तो उनका शाब्दिक अर्थ ससंदर्भ समझते नहीं, अतः दुष्प्रचार से तत्काल प्रभावित होकर असत्य को ही सत्य मान लेते हैं. विधर्मी अथवा सनातन धर्म के सुनियोजित विरोधी हमारे धर्मश्लोकों, नीतिश्लोकों एवं ब्रह्मवाक्यों के अंश ही प्रचारित करते हैं तथा अपने धर्मग्रंथों, ऋषि मुनियों का उपहास करते हैं अथवा वास्तविक मूल्यों/ अर्थ की अपेक्षा अलग ही अर्थ से लोगों को भ्रमित करते हैं. इसका सटीक उदाहरण है महात्मा गाँधी द्वारा अहिंसा के उपदेश के लिए प्रयुक्त नीतिवाक्य – “अहिंसा परमोधर्मः”. मेरा विश्वास है तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री के तत्कालीन वृत्तांत जो सत्यापित करते हैं कि इस श्लोक के छुपाये गए अंश – “धर्महिंसा तथैव च” तथा कुछ अन्य वित्तीय कारणों से अंग्रेजों को भारत को स्वतंत्र करना पड़ा था. कहने का अर्थ यह है कि सनातन अथवा हिन्दू धर्म ने तो तत्काल “अहिंसा परमोधर्मः” आत्मसात कर लिया और अहिंसा को अपनी नपुंसकता ढकने का एक बहाना या ढाल बना लिया जबकि हिन्दू विरोधियों (जिनमें वे नाम से हिन्दू किन्तु उनका वास्तविक धर्म कुछ और है) तथा छद्मधर्मनिरपेक्षता की पताका उठाये लोगों ने सनातन धर्म तथा धर्मगुरुओं पर शैक्षणिक, सामाजिक एवं न्यायिक रूप से निर्मम प्रहार किये हैं. बाकी धर्मों के अनुयायी अपने धर्मग्रन्थ एवं आचरण अन्धरूप से मानते हैं जबकि हम हिन्दू अथवा सनातन धर्म के अनुयायी इसे सिर्फ रिवाज के स्तर पर ही मना कर अपने को हिन्दू कहते नहीं लजाते !! विडम्बना ही है !!
हमारा धर्म एवं धर्मग्रन्थ कितने वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं, शायद यह वर्णन करना आवश्यक नहीं. पृथ्वी, सूर्य एवं ब्रह्माण्ड की आयु, सूर्य से पृथ्वी की दूरी, ध्वनि तथा प्रकाश की गति, गुरुत्व, पृथ्वी, चन्द्र तथा अन्य ग्रहों की घूर्णन एवं परिक्रमा की गति, नक्षत्रों की स्थिति एवं असंख्य ऐसी वैज्ञानिक गणनाएँ केवल सनातन धर्मग्रंथों में मिलती हैं. विज्ञान परमाणु के तीन अवयवों (इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोटॉन) के भेद तक प्रमाणिक अध्ययन कर पाया है जबकि सनातन धर्मग्रन्थ अणु के छठे उपभेद अथवा सूक्ष्म अवयव अर्थात इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोटॉन के चार उपभेद अथवा सूक्ष्म अवयव नीचे तक का वर्णन करते हैं.
हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार हर कण में ईश्वर के अंश विद्यमान हैं. यह अंश साकार ईश्वर के परे शक्ति अथवा ऊर्जा रूप में स्थित है. जिन वस्तुओं, कणों को हम निर्जीव मानते हैं जैसे पत्थर, रेत, जल की बूंद इत्यादि, उनमें भी आत्मा विद्यमान है. हमारे सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार आत्मा के भी उपभेद अथवा सूक्ष्म अवयव हैं. इनमें से आत्मा के दो उपभेद जागृत तथा सुषुप्तावस्था में हर कण में विद्यमान हैं. जिन्हें हम जीवित मानते हैं, वे आत्मा की जागृतावस्था में होते हैं तथा पत्थर, रेत, जल की बूंद तथा अन्य हर निर्जीव मानी जानी वाली वस्तु में यही आत्मा सुषुप्तावस्था में विद्यमान रहती है. अब प्रश्न यह है कि हर कण में आत्मा होने का प्रमाण क्या है ? यदि आप मानें कि एक शरीर में एक ही आत्मा रहती है जिसके शरीर त्यागने से जीवित तत्काल निर्जीव में परिवर्तित हो जाता है तो मैं इसका विरोध करता हूँ. यदि पेड़-पौधों को भी एक शरीर मानें तो यह देखिये कि एक पेड़ के किसी भी अंग अथवा टहनी/ टुकड़े को उसके अनुकूल परिस्थितियों में स्थापित किया जाये तो पुनः एक या कई पेड़-पौधे उग जाते हैं !! यहाँ आत्मा एक ही कहाँ रही ? पेड़ पौधों में नेत्र नहीं होते किन्तु यदि किसी बेल (क्रीपर) को देखें तो वह बिना नेत्र ही स्वतः जहाँ भी रस्सी अथवा ऊपर चढ़ने का साधन उपलब्ध हो, उसकी तरफ मुड़ जाती है और अंततः उसके सहारे विस्तार तथा जीवनक्रम बढ़ाने की क्रिया में रत हो जाती है. यह उसके हर अंश, हर कण, हर अणु में स्थित आत्मा की प्रेरणा से ही होता है.
विज्ञान का छात्र होने के नाते पढ़ा था कि अमीबा, हाइड्रा तथा अनंत सूक्ष्मदर्शी जीव होते हैं जो एक ही जीव से विभाजित हो कर स्वतंत्र जीव के रूप में जीवित रहते हैं और अपना जीवनक्रम इसी आधार पर चलाते बढाते रहते हैं. यहाँ भी आत्मा एक ही कहाँ रही ? मानव में शुक्राणु में एक आत्मा होती है. डिम्ब अथवा स्त्री के अंडाणु में स्वतंत्र एवं अलग आत्मा विद्यमान होती है. दोनों के संयोग से मानव शरीर की संरचना प्रारंभ होती है. किन्तु मानव शरीर के प्रत्येक अंग के प्रत्येक अणु में स्वतंत्र आत्मा होती है जिसे संचालित करने की ऊर्जा, क्षमता तथा प्रेरणा मस्तिष्क में स्थित ब्रह्माण्ड (का अंश) अथवा सूक्ष्म ऊर्जा जिसे हम भौतिक अथवा वैज्ञानिक रूप से आत्मा मानते हैं, उसके पास रहती है. इसे दूसरे सरल शब्दों में इस प्रकार से समझ सकते हैं कि सूर्य अग्नि तथा अथाह ऊर्जा का एक पिण्ड है जिसके हर बिंदु में अनंत ऊर्जा विद्यमान है. किन्तु यह अनंत ऊर्जा सूर्य के मूलतत्व क्रोड अथवा कोर के बिना शून्य हो जाती है. सूर्य अथवा किसी भी तारे की कोर अपनी मृत्यु के पश्चात अनंत ऋणात्मक ऊर्जा तथा परम घनत्व का पिण्ड बन जाता है जिसे हम वैज्ञानिक रूप से ब्लैकहोल (ब्लैक होल) के नाम से जानते हैं. वह समस्त उत्सर्जित ऊर्जा को पुनः अवशोषित कर पुनः ऊर्जा का स्रोत बनने की प्रक्रिया में रत हो जाता है. इसी प्रकार से मानव शरीर स्थित ब्रह्माण्ड से अनंत ऊर्जा जिससे शरीर के अन्य अवयव संचालित होते हैं के शरीर से निर्गम के पश्चात अन्य अणु भी अपनी ऊर्जा त्याग कर सजीव से निर्जीव होने लगते हैं अर्थात चेतनावस्था से सुषुप्तावस्था को प्राप्त हो जाते हैं. इसी स्थिति को हम मृत्यु घोषित करते हैं. हमारा सूक्ष्म शरीर यदि ईश्वर में लीन नहीं हो पाया तो पुनः ऊर्जा अवशोषित करने की क्रिया में लग जाता है और पर्याप्त ऊर्जा समेटने के पश्चात पुनर्जन्म के माध्यम से स्थूलशरीर के रूप में फिर मानव अथवा किसी अन्य रूप में जन्म लेता है. यही ज्ञान हमारे धर्मग्रन्थ हमें देते हैं कि जीवनकाल में अच्छे एवं पुण्य कार्यों के माध्यम से साकारात्मक ऊर्जा अर्जित कर के हम अनंत ऊर्जा के अथाह स्रोत ईश्वर में लीन हो सकते हैं. यही हमारे मानव स्वरुप में जन्म लेने का उद्देश्य भी है.
प्रिय मित्रों एवं बहनों, सनातन धर्म विस्तृत है तथा हर वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है. इसे सिर्फ अंधभक्ति का साधन न मान कर इस ज्ञान को अनंत ऊर्जा के भण्डार ईश्वर से मिलन का साधन होने का विश्वास रखिये. अपनी मातृभाषा, अपनी देवभाषा (संस्कृत) तथा अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन कीजिये. अपने जीवन का सही अभिप्राय या उद्देश्य न भूलिए. कण कण में ईश्वर है, अतः दूसरों को भी उसी ईश्वर का अंश मानकर हरएक को उचित महत्त्व दीजिये. अपना जीवन सार्थक कीजिये.
|| जय भारत जय भारती ||
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