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प्रसव के बाद अत्यधिक निराशा अनुभव करना एक तरह का डिप्रेशन होता है, जो अक्सर महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद हो सकती है।

आम तौर पर बच्चे के जन्म के पहले चार से छे हफ्तों के बाद महिलाओं में होने वाली आम समस्या है। हालांकि कुछ मामलों में कई महीनों तक ऐसी कोई निराशा नहीं होती।

प्रसव के बाद की निराशा के कई लक्षण हो सकते हैं जैसे मूड खराब रहना, कुछ भी करने की इच्छा नहीं करना या फिर सिर्फ नींद नहीं आना। हालांकि ज्यादातर महिलाओं को खुद नहीं पता होता कि उनके साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

स्वभाव में बदलाव महसूस करना, चिड़चिड़ापन या फिर बेचैनी महसूस करना बेहद आम अनुभव हैं। इसे बेबी ब्लूज़ (baby blues) भी कहते हैं। आमतौर पर यह समस्या कुछ ही हफ्तों में पूरी तरह खत्म हो जाती है। मगर अगर कुछ महिलाओं को ये लक्षण लगातार महसूस होते रहते हैं तो इसे बच्चे के जन्म के बाद का अवसाद माना जाता है।

महिला के पार्ट्नर, परिवार और दोस्तों की ज़िम्मेदारी है कि वे इन लक्षणों को जल्दी से जल्दी पहचान लें और किसी अनुभवी पेशेवर से सलाह करें।

जन्म के बाद अवसाद के लक्षणों के बारे में और ज्यादा जानकारी लेने के लिए पढ़ें।

यह समझना बहुत जरूरी है कि बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में अवसाद एक बीमारी है। इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे की देखभाल नहीं करती या उससे प्यार नहीं करती।
प्रसव के बाद अवसाद का इलाज

बच्चे के जन्म के बाद तनाव या निराशा से महिला को अकेलापन, परेशानी या डरने जैसी भावनाएं भी महसूस हो सकती हैं। मगर इस बीमारी के कई तरह के इलाज किए जाते हैं।

ऐसा भी हो सकता है कि जब तक आप इस अवसाद को पहचान कर इसका इलाज शुरू करें तब तक महिला इस अस्थाई परेशानी से मुक्त हो चुकी हो।

अगर आपको या आपके साथी को जन्म के बाद तनाव के लक्षण दिखाई देते हैं तो इसका इलाज जरूरी है।

हो सकता है कि ये बीमारी खुद ही ठीक ना हो सके और इसका असर बच्चे की देखभाल पर भी पड़ना शुरू हो जाए।

बच्चे के जन्म के बाद अवसाद के इलाज में ये शामिल किया जा सकता है।

खुद सलाह लेना

बातचीत से उपचार करना जैसे कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी

तनाव दूर करने की दवाइयाँ लेना

प्रसवोत्तर अवसाद के उपचार के बारे में और पढ़ें।
मुझे प्रसव के बाद अवसाद क्यूँ है?

प्रसव के बाद तनाव का कारण अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है। मगर माना जाता कि इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है। बल्कि कई सारी दिक्कतों के कारण यह अवसाद पैदा होता है। इसके पीछे ये कारण हो सकते हैं:

नवजात शिशु की देखभाल से शारीरिक और भावनात्मक तनाव
गर्भधारण के फौरन बाद होने वाले शारीरिक और हार्मोनल बदलाव। तुलना की जाए तो कुछ महिलाओं के हार्मोन्स बाकी महिलाओं से ज्यादा संवेदनशील हो सकते हैं
निजी दिक्कतें जैसे आर्थिक समस्या, व्यक्तिगत सामाजिक परिस्थितियाँ जैसे पैसे की चिंता, रिश्तेदारों के साथ तनाव या फिर समाज का खराब बर्ताव

महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद अवसाद होने का खतरा और भी ज्यादा बढ़ सकता है अगर:

पहले भी अवसाद या मूड में बदलाव जैसी दिक्कतें रही हैं
पहले बच्चे के जन्म के समय के बाद भी अवसाद का इतिहास रहा है
गर्भावस्था के दौरान तनाव या अवसाद का अनुभव

पढ़ें, बच्चे के जन्म के बाद तनाव के अन्य कारण
कौन प्रभावित है

प्रसव के बाद अवसाद बेहद सामान्य है मगर कुछ लोगों को इस बारे मे पता ही नहीं लगता और इस तरह के मामलों की पहचान ही नहीं होती।

माना जाता है कि हर सात में से एक महिला को बच्चे के जन्म के तीन महीने के अंदर कुछ स्तर के तनाव का अनुभव होता है।

हर तरह के समूह में कम उम्र में मां बनने वाली माताओं में इस तरह के तनाव होने की दर सबसे ज्यादा होती है।
अवसाद

अवसाद या तनाव में आपको हद से ज्यादा मायूसी, उदासी या बेचैनी का अनुभव होता है और काफी लंबे अरसे तक ऐसा ही लगता रहता है।
लक्षण

बच्चे के जन्म के बाद अवसाद कई महिलाओं पर अलग तरह से असर डालता है। ज्यादातर मामलों में जन्म के कुछ ही दिनों या महीनों के बाद इस तरह के लक्षण दिखने लगते हैं और कई महीनों तक बने रहते हैं। मगर कुछ ज्यादा गंभीर मामलों में ये हालात एक साल से भी ज्यादा वक्त तक बने रहते हैं।

प्रमुख लक्षण

लगातार उदासी या मूड खराब रहना
आस-पास की दुनिया में दिलचस्पी खत्म हो जाना या फिर जो काम पहले अच्छे लगते थे अब उनमें अब दिल नहीं लगना
हर वक्त थकान महसूस करना या कमज़ोरी महसूस करना

अन्य लक्षणों में यह भी हो सकते हैं:

अनिद्रा, बार-बार नींद टूटना, रात में नींद नहीं आना और दिन भर नींद आते रहना
एकाग्र नहीं हो पाना, कोई फैसला नहीं कर पाना
आत्मविश्वास कम होना
भूख की कमी या भूख बढ़ना (हर वक्त खाते रहना)
बहुत जल्दी गुस्सा आना या ज्यादा उदासी महसूस करना (ऐसे मरीजों को परेशान नहीं किया जा सकता)
हर वक्त अपनी गलती महसूस करना, ग्लानि अनुभव करना
खुदकुशी या खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आना

प्रसव के बाद अवसाद आपकी रोज़ाना की जिंदगी में भी दिक्कतें पैदा कर सकता है। कुछ महिलाएं अपने ही बच्चे की देखभाल नहीं कर पातीं। या फिर घर से निकलने और दोस्तों के साथ दोबारा जुड़ने के लिए बेताब हो जाती हैं

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