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एलर्जी को जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे पूरी तरह से नियंत्रित रखा जा सकता है। एलर्जी का इलाज भी है, लेकिन यह पता करना महत्वपूर्ण है कि किस चीज से एलर्जी हो रही है। यदि यह पता चल जाए तो उसे छोड़ देना चाहिए। एलर्जी वंशानुगत और व्यक्तिगत होता है। इसके अलावा खाने-पीने, त्वचा में कुछ लगाने, ठंड, धूल, धुआं, रंग और महक से भी एलर्जी की परेशानी होती है। दमा भी एलर्जी के कारण ही होता है। देश में 38 करोड़ लोग एलर्जी से पीड़ित हैं। पर्यावरण में प्रदूषण से एलर्जी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एलर्जी की वजह से चर्म रोग भी बढ़ रहा है। सबसे अधिक एलर्जी औद्योगिक प्रदूषण के चलते बढ़ रही है। इसके अलावा गंदगी और कूड़ा-कचरा भी इसकी वजह है। ऐसी जगहों पर मास्क लगाकर जाना चाहिए। यदि आईजीई की मात्रा 200 यूनिट से अधिक है तो व्यक्ति को एलर्जी से पीड़ित माना जाता है। इसका लेवल बढ़ने पर दमा का लक्षण या फिर त्वचा में लक्षण दिखाई देने लगता है। एलर्जी को नियंत्रित नहीं किया गया दमा या हपनी के मरीजों की तकलीफ बढ़ जाती है। ऐसे में मरीज के सीने का आकार बैरल के तरह हो जाता है। यह कहना है शहर के वरीय चेस्ट और एलर्जी रोग विशेषज्ञ डॉ. टीआरबीपीएन सिंह का। वे शनिवार को दैनिक भास्कर के हेल्थ काउंसिलिंग में पाठकों को सलाह दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हपनी के मरीजों को इनहेलर लेने से राहत मिलती है। वैसे इनहेलर लेने से कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता है। डॉ. सिंह ने कहा कि टीबी के मरीजों को दवा का कोर्स नहीं छोड़ना चाहिए। साधारण टीबी में छह महीने और एमडीआर टीबी में 27 महीने का कोर्स नियमित लेना चाहिए। दवा छूटने पर एमडीआर और एक्सडीआर टीबी होने की संभावना बढ़ जाती है। एमडीआर और एक्सडीआर का इलाज बी बहुत महंगा है।

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