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ओसीडी का इलाज कौन करता है
ओसीडी का इलाज सायकायट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) और क्लीनिकल सायकॉलजिस्ट (मनोविज्ञानी) करते है। किस अस्पताल में प्राइवेट के अलावा सभी बड़े सरकारी अस्पतालों में भी इसका इलाज होता है। दिल्ली सरकार का इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूइमन बिहेवियर एंड अलायड साइंसेज (इहबास) में हर तरह की मानसिक बीमारियों के इलाज की सुविधा है। इसके अलावा राम मनोहर लोहिया अस्पताल और एम्स में इसके लिए अलग से विभाग हैं। और भी कर्इ अस्पतालों में काउंसलिंग व इलाज हो सकता है। कितने दिन चल सकता हैइसके लिए कोर्इ लिमिट तय नहीं हो सकती। चूंकि इलाज का मकसद मरीज के बर्ताव में पॉजिटिव बदलाव लाना होता है, जिसमें उसकी अपनी कोशिश और परिवार के सदस्यों का सहयोग सबसे अहम होता है। ऐसा देखा गया है कि शुरूआती दौर में पता लग जाए तो छह-सात महीने की थेरपी में धीरे-धीरे समस्या कंट्रोल में आ जाती है। लेकिन कर्इ मामलों में कर्इ साल तक थेरपी की जरूरत पड़ती है। क्योंकि यह बीमारी कभी भी 100 पर्सेंट ठीक नहीं होती। इसे कंट्रोल में रखने के लिए लगातार कोशिश और सहयोग की जरूरत होती है।

थेरपी है कारगर
ओसीडी के इलाज में जो सबसे प्रभावी थेरपी है, वह है संज्ञानात्मक-व्यावहारिक थेरपी (Cognitive Behavioral Therapy) । कर्इ बार थेरपी के साथ इसमें डिप्रेशन की दवाएं भी दी जाती हैं, हालांकि ओसीडी के इलाज में अकेले दवा कारगर नहीं होती। इस थेरपी के दो हिस्से होते हैं :


1. पहला, अनावरण और प्रतिक्रिया बचाव (Exposure and Response Prevention) : इसमें पीड़ित को बार-बार ऑब्सेशन के सोर्स के संपर्क में लाया जाता है। इसके बाद आपको उस कंपल्सिव बिहेवियर से परहेज करने के लिए कहा जाता है, जिसे आप बार-बार करते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर आप एक कंपलसिव हैंडवॉशर हैं यानी आपको बार-बार हाथ धोते रहने की समस्या है तो आपको पब्लिक टॉयलेट के दरवाजों के हैंडल छूने के लिए कहा जा सकता है और इसके बाद आपको हाथ धोने से रोका जाता है। हालांकि इसके बाद आप चिंता के साथ बैठेंगे, मगर ऐसा करने से बार-बार धोने से जुड़ी आपकी घबराहट धीरे-धीरे अपने आप कम होने लगेगी। ऐसे में आप समझ जाएंगे कि आपको अपनी चिंता दूर करने के लिए बार-बार हाथ धोने की जरूरत नहीं है। इस लेवल पर पहुंचने के बाद आप खुद अपने ऑब्सेसिव ख्याल और कंपलसिव बिहेवियर पर कंट्रोल पा लेंगे।

2. दूसरा, संज्ञानात्मक थेरपी (Cognitive Therapy) : इसके तहत आपके दिमाग में आने वाले बुरे-बुरे ख्यालों को कम करने और अपनी जिम्मेदारियों को बढ़ा-चढ़ाकर समझने के अहसास को काबू में करने की कोशिश की जाती है। ओसीडी में संज्ञानात्मक थेरपी की सबसे ज्यादा भूमिका यह सिखाने की होती है कि आप बिना कंपल्सिव बिहेवियर के अपने ऑब्सेसिव ख्यालों पर किस तरह से स्वस्थ और प्रभावकारी रिएक्शन दें।


ऐसे होता है इलाज
स्टेज 1 री-लेबल : यह स्वीकार करना कि आपके रुटीन और संबंधों में दखल दे रहे ऑब्सेसिव विचार और काम ओसीडी का नतीजा हैं। उदाहरण के लिए, अपने आपको यह कहना सिखाएं कि मुझे नहीं लगता कि मेरे हाथ गंदे हैं। मुझे अपने हाथ गंदे होने का ऑब्सेशन है।
स्टेज 2 उत्तरदायी ठहराना : खुद को यह अहसास कराना कि आपकी परेशानियों की वजह ओसीडी है, जिसके लिए शायद आपके दिमाग में बायोकेमिकल इम्बैलेंस जिम्मेदार है। खुद से कहें, यह आप नहीं कर रहे, बल्कि आपका ओसीडी आपसे करवा रहा है। खुद को बार-बार यह याद दिलाएं कि ओसीडी की वजह से आपको आने वाले ख्याल बेमतलब हैं। दिमाग झूठे मेसेज भेज रहा है।
स्टेज 3 ध्यान केंद्रित करना : अपना ध्यान कहीं और लगाकर ओसीडी के ख्यालों को नजरअंदाज करने की कोशिश करें। ऐसा रोजाना कम-से-कम कुछ देर के लिए जरूर करें। खुद से कहें, मैं ओसीडी के लक्षणों से गुजर रहा हूं, इसलिए मुझे किसी दूसरे काम पर ध्यान देने की जरूरत है।
स्टेज 4 फिर से मूल्यांकन करना : ओसीडी के ख्यालों को अहमियत न दें। ये महत्वपूर्ण नहीं होते। खुद से कहें, यह सिर्फ मेरा बेवकूफाना ऑब्सेशन हैं। इसका कोर्इ मतलब नहीं। इस पर ध्यान देने की कोर्इ जरूरत नहीं। याद रखें, आप इन ख्यालों को आने से नहीं रोक सकते, लेकिन आपको इस पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं होती। आप अगले बिहेवियर की तरफ बढ़ना सीख सकते हैं।


डीबीएस ने जगार्इ नर्इ उम्मीद
डीप ब्रेन स्टिमुलेशन यानी डीबीएस सर्जिकल प्रॉसिजर ने एक नर्इ उम्मीद जगार्इ है। हमारे देश में इस तकनीक से अब तक 3-4 मामले ही किए गए हैं, यही वजह है कि इसके 100 पर्सेंट सफल होने की गारंटी अब तक नहीं ली जाती है। डीबीएस का पार्किंसन में बहुत फायदा देखा गया है। जिनमें पार्किंसन के साथ ओसीडी भी होता है, उनमें डीबीएस से ओसीडी पूरी तरह ठीक हो जाता है। हालांकि प्योर ओसीडी में इसके नतीजे खास अच्छे नहीं हैं। दिल की बीमारियों के इलाज के लिए जैसे पेसमेकर लगाते हैं, वैसे ही इसमें भी चेस्ट में एक पेसमेकर लगाते हैं, जिसके इलेक्ट्रॉड ब्रेन में लगते हैं। इसके अंदर प्रोग्रामिंग की जरूरत पड़ती है। इसके लिए 5 दिन हॉसिपटल में रहना होता है। सर्जरी पर 8-13 लाख रुपये का खर्च आता है।

फैमिली सपोर्ट जरूरी
चूंकि ओसीडी की वजह से अक्सर फैमिली लाइफ और सोशल जिम्मेदारी निभाने में समस्या आती है। ऐसे में इससे निजात पाने में फैमिली थेरपी फायदेमंद साबित हो सकती है। फैमिली थेरपी डिसॉर्डर को समझने के लिए पीड़ित को प्रेरित कर सकती है और परिवार के सदस्यों के बीच होने वाले विवादों को खत्म कर सकती है। यह परिवार के सदस्यों को प्रेरित कर सकती है और सिखा सकती है कि वे ओसीडी से पीड़ित अपने करीबी की किस तरह मदद करें।

- पीड़ित को लेकर नेगेटिव बातें ना करें और न ही आलोचना करें। इससे उसकी समस्या और गंभीर हो सकती है।
- उसका मजाक न बनाएं और न ही उसे जबरन कंपल्सिव बिहेवियर करने से रोकें।
- परिवार और घर का माहौल अच्छा बनाए रखने की कोशिश करें। मरीज को किसी दूसरे काम में बिजी रखें ताकि वह कंपल्सिव बिहेवियर से बचे।
- पीड़ित को खुश रखने की कोशिश करें।

अपनी मदद खुद करें
1. ओसीडी के ख्यालों को नजरअंदाज करने के लिए अपना ध्यान कहीं और लगाएं। मसलन एक्सरसाइज, जॉगिंग, वॉकिंग, स्टडी, म्यूजिक सुनना, इंटरनेट सर्फिंग, विडियोगेम खेलना, किसी को फोन करना आदि। इसका मकसद है खुद को कम-से-कम 15 मिनट तक किसी ऐसे काम में बिजी रखना, जिससे आपको खुशी मिलती हो। ऐसा करने से आप कंपल्सिव बिहेवियर करने से खुद को रोक सकते हैं। यह देखा गया है कि आप जितनी ज्यादा देर तक खुद को ऐसा करने से रोक पाते हैं, उतनी जल्दी आपकी आदतों में बदलाव आता है।
2. जब भी ऑब्सेसिव ख्याल आएं और कंप्लसिव बिहेवियर का मन कहे, आप इसे डायरी में नोट कर लें। ऐसा करने से आपको यह पता लगेगा कि आप इन बेकार की बातों में अपना कितना समय गंवा रहे हैं। एक ही बात बार-बार लिखने से आपकी नजरों में उसकी अहमियत कम होने लगेगी। चूंकि कोर्इ भी बात लिखना उस बारे में सोचने से ज्यादा मुश्किल काम है। ऐसे में थककर आप उसके बारे में सोचने से ही बचेंगे और धीरे-धीरे ये ख्याल आपके दिमाग में आने कम हो जाएंगे।

3. ओसीडी की चिंता का समय तय करें। इसके लिए 10 मिनट का समय और जगह तय करें और अपने सारे ऑब्सेसिव ख्यालों को उस पीरियड के लिए टालें। उदाहरण के तौर पर शाम 8 बजे से 8:10 मिनट तक के समय को वरी पीरियड तय करें और इसके लिए लिविंग रूम की जगह तय करें। इस पीरियड में शांति से बैठें और सिर्फ अपने नेगेटिव विचारों पर ध्यान लगाएं। इन्हें ठीक करने की चिंता बिल्कुल न करें। वरी पीरियड के आखिर में कुछ गहरी सांस लें। ऑब्सेसिव ख्यालों को अपने मन से निकल जाने दें और अपने सामान्य कामों में लग जाएं। ऐसा करके आप दिन के बाकी समय और रात को नींद के दौरान अपने आप को नेगेटिव विचारों से बचा सकते हैं।
4. अपने ओसीडी ऑब्सेशन का टेप बनाएं। इसे टेप रिकॉर्डर, लैपटॉप या स्मार्ट फोन में टेप करें। आपके दिमाग में आने वाले ऑब्सेसिव ख्यालों, लाइनों या कहानियों की गिनती करें। इस टेप को रोजाना 45 मिनट के लिए सुनें। बार-बार एक ही तरह के ऑब्सेशन के बारे में सुनकर आपको यह बात समझ आ जाएगी कि इसकी वजह ओसीडी है और कुछ ही दिनों में आपको ये बातें परेशान करना बंद कर देंगी।
5. अपना ध्यान रखें। एक स्वस्थ और संतुलित लाइफस्टाइल आपको ओसीडी बिहेवियर, डर और चिंताओं से दूर रखने में सहायक साबित होगी। इसके लिए रिलैक्सेशन तकनीक सीखें। ध्यान, योग और डीप ब्रीदिंग तकनीक अपनाएं। ऐसा दिन में कम-से-कम 30 मिनट के लिए करें।

6. बेहतर खान-पान की आदत डालें। खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां आदि शामिल करें। इससे न सिर्फ आपका ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल में रहेगा, बल्कि आपके शरीर में सेरोटोनिन बढ़ेगा, जो एक न्यूरोट्रांसमीटर है और दिमाग को शांत करता है।
7. रेग्युलर एक्सरसाइज करें। एरोबिक एक्सरसाइज से तनाव कम होता है और शारीरिक व मानसिक एनर्जी बढ़ती है। एंडॉर्फिन आपके दिमाग को खुशी का अहसास कराता है। रोजाना 30 मिनट एक्सरसाइज करें। 8. अल्कोहल और निकोटिन से दूर रहें और भरपूर नींद लें। 9. परिवार और दोस्तों के कॉन्टैक्ट में रहें।

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