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डेंसिटोमेट्री (डीओसी) के परिणामों के अनुसार डब्ल्यूएचओ परिभाषित करता है: ऑस्टियोपीनिया उस नुकसान के लिए जिसमें अस्थि खनिज घनत्व (बीएमडी) टी-स्कोर के -1 और -2.5 एसडी के बीच है और ऑस्टियोपोरोसिस: जब बीएमडी -2.5 एसडी से कम हो। ऑस्टियोआर्थराइटिस जोड़ों के अध: पतन को संदर्भित करता है, जबकि ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डी के द्रव्यमान को नुकसान पहुंचता है, जो फ्रैक्चर के जोखिम को बढ़ाता है। ऑस्टियोपोरोसिस, एक साइलेंट बीमारी है, जो वर्षों तक प्रगति कर रहती है और इसका पता तब तक नहीं चलता जब तक फ्रैक्चर न हो।

ओस्टियोपीनिया और ओस्टयोपोरोसिस में अंतर

बता दें कि ओस्टियोपीनिया को ओस्टियोपोरोसिस का पहला चरण मानते हैं। अर्थात हड्डी की शुरुआती क्षति ओस्टियोपीनिया कहलाती है। हालांकि यह समस्या ओस्टियोपोरोसिस समस्या की तरह गंभीर नहीं होती है। ध्यान दें कि ओस्टियोपीनिया के कोई लक्षण नहीं होते हैं। जबकि ऑस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त व्यक्ति कई लक्षणों का शिकार हो सकता है। अगर आंकड़ों के अनुसार दोनों के बीच का अंतर समझें तो जिन लोगों की बोन डेंसिटी - 1 और -2.5 की बीच है उन्हें ओस्टियोपीनिया होता है। जबकि जिन लोगों की बोन डेंसिटी -2.5 से कम है उन्हें ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या है।
किन लोगों को ओस्टियोपीनिया और ऑस्टियोपोरोसिस का रहता है जोखिम?

1 - जो व्यक्ति धूम्रपान का सेवन करते हैं।

2 - जो व्यक्ति शराब का सेवन करते हैं।

3 - जिन व्यक्ति के शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होते हैं।

4 - जो व्यक्ति स्टेरॉयड ऐसी दवाओं का सेवन करते हैं।

5 - जो लोग थायराइड जैसी समस्या का शिकार हो जाते हैं।

6 - मेनोपॉज के दौरान यह समस्या बढ़ सकती है।

7 - ऐसी लाइफ़स्टाइल जिनमें शारीरिक गतिविधियां नहीं है, उनमें इस तरीके की समस्या हो सकती है।

8 - 35 वर्ष से अधिक लोग में इसका खतरा बढ़ सकता है।

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