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जन्म के शुरुआती सालों में जब शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, तो उस दौरान अक्सर कई बार सर्दी-जुकाम, चकत्ते और पेट में गडबड़ी होती है।

यह पहचान पाना भी मुश्किल हो सकता है कि कौन सी स्थिति गंभीर है और कौन सी नहीं, क्योंकि शिशु खुद यह नहीं बता सकता कि उसे कैसा महसूस हो रहा है।

इसलिए जब भी आपको ये लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर से सलाह लें, ताकि किसी अन्य इनफेक्शन या बीमारी का पता चल सके।

हमेशा अपने मन की बात पर यकीन करें। यदि आपको लगे कि शिशु की तबियत ठीक नहीं है, तो शायद आप सही हैं, फिर चाहे शिशु की उम्र कुछ भी हो। यदि आपके शिशु को कोई और लक्षण हो, जिसे लेकर आप चिंतित हों तो बेहतर है कि डॉक्टर से बात की जाए।

वायरल इनफेक्शन का उपचार कैसे किया जाता है?

बहुत से वायरल इनफेक्शन अपने आप ठीक हो जाते हैं, इसलिए उपचार की जरुरत नहीं होती।

वायरल संक्रमणों में एंटिबायोटिक्स काम नहीं करतीं। दवाएं केवल बुखार, बदन दर्द, सर्दी या खांसी जैसे लक्षणों से राहत के लिए दी जाती है और इस दौरान आपके शिशु का इम्यून सिस्टम वायरस से लड़ता रहता है। लक्षणों का उपचार करने से शिशु को बेहतर महसूस होगा।

वायरस का असर तीन दिन से एक हफ्ते तक रहता है, इसके बाद शिशु को अपने आप बेहतर महसूस होने लगेगा। इस दौरान आप उसे पर्याप्त तरल पदार्थ दें और आराम करने दें।

अधिकांश मामलों में एंटिवायरल दवाएं नहीं दी जाती हैं। जो बच्चे अस्पताल में भर्ती होते हैं, केवल उनका उपचार एंटिवायरल से किया जाता है। ऐसा आमतौर पर इसलिए क्योंकि उनके साथ कोई स्वास्थ्य स्थिति जैसे ​हृदय रोग आदि है या फिर उनका जन्म समय से पहले हुआ था या फिर कोई असाध्य रोग है।

हालांकि, यदि बच्चे को वायरल इनफेक्शन की वजह से सैकंडरी या बैक्टीरियल इनफेक्शन हो जाए तो उसे एंटिबायोटिक दवाएं देना जरुरी हो सकता है।

बच्चे को एंटिबायोटिक दवा देने के लिए डॉक्टर के निर्देशों का पूरी तरह पालन करें और कोई भी खुराक न चूकें। यदि आप ये दवा देना जल्दी बंद कर देंगे, तो बैक्टीरिया दोबारा जल्द ही अधिक गंभीर रूप से हमला कर सकता है।

कुछ मामलों में यदि शिशु को गंभीर इनफेक्शन हो जाए, चाहे वायरल या बैक्टीरियल, तो उसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ सकता है।

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