आप दिन में कितनी बार टीबी की दवा लेते हैं?HealthPlanet

Posted on Wed 7th Dec 2022 : 09:34

टीबी(ट्यूबर क्लोसिस)के मरीजों के लिए सप्ताह में तीन दिन के स्थान पर रोज खुराक वाली नई दवा आ गई है। पुरानी दवा में सप्ताह में तीन दिन एक-एक दिन के आड़ में एक बार खुराक लेनी पड़ती थी। नई दवा में रोज खुराक लेनी पड़ेगी। हालांकि कोर्स छह महीने का ही होगा, जैसा कि पुरानी दवा का था। नई दवा के साथ अंबेडकर अस्पताल सहित सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज शुरू कर दिया गया है।

नई दवा में मरीजों के लिए कई तरह की राहत है। पुरानी दवा में एक भी दिन की एक खुराक छूट जाने पर कोर्स अधूरा रह जाता था और नए सिरे से छह महीने का कोर्स करना पड़ता था। नई दवा की खुराक लेने वाले मरीज अगर एकाध दिन खुराक लेना भूल जाएं तो कोर्स में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होगी। इलाज भी प्रभावित नहीं होगा। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइड लाइन के अनुसार सरकारी के अलावा निजी अस्पतालों में नई दवाएं उपलब्ध करा दी गई हैं। टीबी का इलाज सरकारी के साथ-साथ प्राइवेट अस्पतालों में पूरी तरह से मुफ्त में मुहैया कराने के निर्देश हैं। इस दवा से इलाज पूरी तरह से मुफ्त किया जाना है। दवाओं की सप्लाई सीधे स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से कराई जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने कुछ दवा दुकानों को अधिकृत करते हुए वहां फ्री सप्लाई कर रही है। मरीज उन दुकानों में पर्ची दिखाकर मुफ्त में दवा ले सकते हैं। नई दवा के डोज में छोटे बच्चों के लिए घुलने वाली दवा बनाई गई है। नई दवा मरीज के वजन के हिसाब से दी जा रही है। अंबेडकर अस्पताल में टीबी एंड चेस्ट विभाग के एचओडी डॉ. आरके पंडा ने बताया कि नई दवा मरीजों के लिए बेहद असर कारक है।

बदलाव की जरूरत इसलिए

तीन दिन वाले दवा के कोर्स में मरीजों को कई परेशानी हो रही थी। एक दिन भी दिन दवा लेने में चूक होने पर कोर्स अधूरा हो जाता था और मरीजों को उसी समय से नए सिरे से कोर्स पूरा करना पड़ता था। नई गोली में वे सारे कंपोजिशन हैं, जिससे गलती से दवा एक दिन छूट जाने पर दवा का प्रभाव रहेगा। दवा का काेर्स अधूरा नहीं रहेगा।

26 हजार मरीजों का पंजीयन

प्रदेश में टीबी के इलाज के लिए महज 25 हजार 889 लोगों का नाम पंजीयन है। जबकि वास्तविक संख्या एक लाख ज्यादा है। रायपुर जिले में सबसे अधिक 14 हजार 188 मरीज हैं। इनमें केवल 2 हजार 848 का पंजीयन है। दुर्ग जिले में 13 हजार 340 टीबी में केवल 3080 ही इलाज करवा रहे हैं। बिलासपुर में 10 हजार 644 मरीजों में 2 हजार 569 का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है। डॉक्टरों के अनुसार ज्यादातर टीबी मरीजों का प्रारंभिक इलाज नहीं होने के कारण बीमारी बढ़ती ही जा रही है। टीबी का इलाज नहीं होने पर यह एमडीआर टीबी का रूप ले लेता है। यह सबसे घातक है।

टीबी के लिए ज्यादा असरदार
साधारण टीबी के साथ-साथ एमडीआर(मल्टीपल ड्रग रेजिस्टेंस)यानी खतरनाक टीबी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। टीबी से पीड़ित मरीजों के लिए नई दवा बीडा क्वीलिन मुफ्त में दिए जाने के निर्देश हैं, विशेषज्ञों के अनुसार जो मरीज दवा का कोर्स पूरा नहीं करते, उन्हें एमडीआर यानी खतरनाक स्तर का टीबी हो जाता है। इलाज नहीं होने पर यह जानलेवा भी हो जाता है। वर्तमान में 60 से 70% एमडीआर टीबी के मरीज इलाज से स्वस्थ हो जाते हैं। नई दवा से 70 से 90% ठीक होने की संभावना है

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