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शिशु की मालिश किस तरह करनी चाहिए?
शिशुओं को एक ही तरह की दिनचर्या और बार-बार चीजों को दोहराया जाना अच्छा लगता है। इसलिए अगर आप हर बार शिशु की एक ही तरीके से मालिश करेंगी, तो वह समझ जाएगा कि आगे क्या होने वाला है और वह मालिश का और अधिक आनंद लेगा।

शिशु की मालिश की शुरुआत उसके पैरों से करें और फिर शरीर से करते हुए सिर की मालिश से समाप्त करें। टांगों से शुरुआत करना सही रहता है, क्योंकि आपके शिशु को नैपी बदलने के दौरान टांगों को छुए जाने की आदत होती है।

तेल, बेबी मॉइस्चराइजर या क्रीम की कुछ बूंदें अपने हाथ में लें। दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर तेल या क्रीम को थोड़ा गर्म करें।
बेहद सौम्यता से इसे शिशु की त्वचा पर लगाएं। शुरुआत टांगों से करें।
नीचे से मालिश करते हुए टांगों के ऊपर की तरफ जाएं। आप सौम्यता से दूध दुहने के अंदाज में उसकी जांघों से नीचे पैरों की उंगलियों तक जाएं।
यही तरीका उसकी बाजूओं और हाथों पर आजमाएं। उसके कंधों से शुरु करते हुए नीचे उंगलियों तक आएं।
शिशु के पैरों की उंगलियां एक-एक करके अपने अंगूठे और तर्जनी उंगली के बीच लेकर सौम्यता से बाहर की ओर खींचें। यही प्रक्रिया हाथों की उंगलियों पर भी दोहराइए। शिशु की उंगलियों के जोड़ों को चटकाने का प्रयास न करें, इससे उसे दर्द या चोट पहुंच सकती है।
शिशु की छाती और पेट पर घड़ी की सुई की दिशा में गोलाकार में मालिश कीजिए। शिशु के पेट पर हल्के दबाव के साथ की गई गोलाकार मालिश उसके पाचन तंत्र में सुधार ला सकती है।
घुटने के नीचे की तरफ से शिशु की टांगों को पकड़ें और ऊपर की तरफ उन्हें मोड़ते हुए, उसके घुटनों को हल्के से पेट पर दबाएं। इससे उसे पेट के अंदर की गैस को निकालने में मदद मिलेगी।
शिशु की छाती से जांघों तक लंबे हाथ फेरते हुए आगे की मालिश पूरी करें। अपना एक हाथ आड़ा करके शिशु की छाती पर रखें, और लंबा हाथ फेरते हुए नीचे की तरफ आएं। यही समान प्रक्रिया दूसरे हाथ के साथ भी करें और ऐसा कुछ बार दोहराएं।
शिशु की पीठ की मालिश करने के लिए उसे पेट के बल लिटाइए। घड़ी की सुई की दिशा के विपरीत बड़े गोलाकार अंदाज में शिशु के नितंबों से ऊपर पीठ की तरफ जाएं और फिर कंधों तक मालिश करें। शिशु की रीढ़ की हड्डी को न दबाएं, इससे शिशु को तकलीफ पहुंच सकती है।
जैसा कि आपने आगे की तरफ किया था, वैसे ही पीछे भी कंधों से पैरों तक लंबा हाथ फेरते हुए पीठ की मालिश पूरी करें।

चाहे आप जापा बाई को रखें, जिन्हें नवजात और शिशुओं की मालिश का अनुभव हो तो भी हमेशा उस पर नजर रखें कि वह क्या कर रही है। सुनिश्चित करें कि वह शिशु की बहुत जोर लगाकर प्रबलता से मालिश न करे।

आराम से सौम्य ढंग से मालिश करने से शिशु को शायद ही कोई नुकसान पहुंचे। मगर यह धारणा गलत है कि जोर से दबाकर मालिश करना शिशु के विकास के लिए जरुरी है। यदि आप बहुत तेज दबाएंगी तो इससे शिशु को तकलीफ होगी और उसे चोट भी पहुंच सकती है।

शिशु के सिर की मालिश करते हुए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
भारत में, सिर की मालिश किए बिना शिशु की मालिश पूरी नहीं होती। मगर, कुछ शिशुओं को दूसरों की तुलना में सिर की मालिश करवाने में अधिक आनंद आता है।

मगर, यदि आपका शिशु सिर को छुए जाने पर मजा नहीं आता, तो जबरदस्ती उसके सिर की मालिश न करें। उसे थोड़ा बड़ा होने दें, और उसके बाद फिर से प्रयास करें। जैसे-जैसे शिशु को मालिश की आदत होने लगेगी, हो सकता है वह सिर की मालिश करवाने में भी आनंद लेने लगे।

आपको आपको कुछ एहतियात बरतने होंगे और नवजात शिशु के सिर को बेहद सौम्यता के साथ छूना होगा, क्योंकि उसकी खोपड़ी की हड्डियां अभी तक जुड़ी नहीं होंगी। आप उसके सिर पर नरम स्थान देखेंगी, जो कि कभी-कभी फड़कते भी हैं। इन्हें कलांतराल (फॉन्टानेल) कहा जाता है।

शिशु के सिर पर ऐसे दो कलांतराल होते है, बड़ा कलांतराल सिर के ठीक ऊपर की तरफ होता है, और एक छोटा सिर के पीछे की ओर होता है। पीछे का नरम स्थान शिशु के करीब छह सप्ताह का होने तक बंद हो जाता है, जबकि आगे वाला कलांतराल शिशु के करीब 18 महीने का हो जाने पर बंद होता है।

शुरुआती छह हफ्तों में शिशु के सिर की मालिश करते हुए इस पर कोई दबाव न डालें। बस हल्के से थपथपाते हुए तेल उसके सिर पर सभी जगह लगा दें। तेल को अपने आप ही सोखने दें। शिशु का सिर जब थोड़ा कठोर होने लगे, तो आप अपनी उंगलियों से हल्का दबाव डालते हुए गोलाकार तरीके से उसके सिर की मालिश कर सकती हैं। लेकिन, ध्यान रखें कि शिशु के सिर के ठीक ऊपर वाले कलांतराल पर कभी भी दबाव न डालें, क्योंकि यह स्थान अभी भी नरम होता है।

जैसे-जैसे शिशु के सिर की हड्डियां बढ़ती हैं और एक साथ जुड़ने लगती हैं, तो शिशु के सिर के ये नरम स्थान स्वयं बंद होकर कठोर होने लगते हैं।

जब तक आपका शिशु अपना सिर खुद उठा पाने में सक्षम नहीं हो जाता, तब तक उसके सिर पर तेल, पीठ के बल लेटी अवस्था में ही लगाएं। इस तरीके से अगर तेल टपकता भी है, तो वह शिशु के मुंह पर आने की बजाय पीछे की ओर ही गिरेगा। जब शिशु सिर का नियंत्रण करने लग जाए, तो आप उसे पेट के बल उल्टा लिटा कर सिर पर तेल लगा सकती हैं। यह अवस्था शायद आपको उसकी मालिश करने में और सुविधाजनक लगे।

अगर, आपके शिशु के सिर पर पपड़ी (क्रेडल कैप) जमी हुई है, तो तेल लगाते समय उसे हटाने का प्रयास न करें। शिशु के बढ़ने के साथ-साथ यह भी अक्सर हट जाती है। पपड़ी को खींचकर हटाने से शिशु को चोट पहुंने का खतरा रहता है और सिर के घावों में संक्रमण भी हो सकता है। शिशु के सिर पर पपड़ी (क्रेडल कैप) के बारे में यहां और जानें।

शिशु के सिर को गोल बनाने के लिए मालिश के दौरान उसे दबाना सुरक्षित नहीं है। बहुत ज्यादा दबाव डालने पर शिशु को असहजता हो सकती है या इससे चोट भी लग सकती है। नवजात शिशु के सिर के आकार के बारे में यहां विस्तार से पढ़ें!

मालिश शुरु करने से पहले मुझे क्या तैयारी करनी होगी?
मालिश के लिए ऐसे स्थान का चयन करें, जो कि शिशु की मालिश के लिए सुरक्षित हो। यह स्थान आपके लिए भी आरामदायक होना चाहिए, ताकि आप अपना पूरा समय लेकर शिशु की अच्छी तरह मालिश कर सकें।
जब तक शिशु खुद पलट नहीं सकता या अधिक हिलता-डुलता नहीं, तब तक आपको केवल उसे एक स्थिर सतह पर लिटाने की जरुरत होती है। ध्यान रखें कि पूर समय आप शिशु के साथ ही रहें। जब शिशु खुद पलटना शुरु कर देता है, तो उसे ऐसी जगह पर लिटाएं, जहां से उसके गिरने का खतरा न हो। शिशु पलक झपकते ही पलट जाते हैं और जब शिशु के शरीर पर तेल लगा हो, तो उसके फिसलने का खतरा ज्यादा हो जाता है।
बिस्तर पर बीच में या फिर जमीन पर मालिश करना सही रहता है। मालिश करने से पहले शिशु के नीचे एक साफ तौलिया या चादर बिछा दें। अपने शिशु को कभी भी अकेला न छोड़ें।
यह बात ध्यान रखें कि शिशु, विशेषकर नवजात शिशु अपने शरीर का तापमान नियंत्रित करने में इतने सक्षम नहीं होते, इसलिए मालिश शुरु करने से पहले कमरे का तापमान आरामदेह होना चाहिए, न ज्यादा ठंडा और न ज्यादा गर्म। अगर आप चाहें तो शिशु को बनियान पहना कर ही मालिश कर सकती हैं। या फिर आप उसके पूरे कपड़े उतारकर उसे इसका मजा लेने दें।

शिशु की कितनी बार मालिश करनी चाहिए?
बहुत सी मांएं शिशु की रोजाना मालिश करना पसंद करती हैं। कुछ नहलाने से ठीक पहले मालिश करती हैं, वहीं कुछ अन्य शिशु को नहलाने के बाद उसकी मालिश करना पसंद करती हैं। कुछ परिवारों में शिशु के पहले तीन महीनों में दिन में दो बार मालिश की जाती है। मगर, शिशु की मालिश कितनी बार की जानी चाहिए, इसकी कोई आदर्श संख्या नहीं है।

मालिश कितनी बार की जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपके पास कितना समय है और शिशु मालिश का कितना आनंद ले रहा है। अगर आप दफ्तर जाती हैं, तो आपके लिए शिशु की रोजाना मालिश करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
अगर, आप शिशु की मालिश कभी-कभार ही कर पाती हैं, तो भी उसे मालिश के फायदे मिलेंगे।

शिशु की मालिश कितनी देर तक करनी चाहिए?
आपके शिशु के बड़े होने के साथ-साथ मालिश के समय में भी बदलाव आता जाएगा। कुछ शिशुओं को शुरुआत से ही मालिश करवाना पसंद आता है, ऐसे में आप शिशु के पूरे शरीर की मालिश अच्छी तरह कर सकती हैं। इसमें करीब 20 मिनट से आधे घंटे का समय लग सकता है।
अगर, आपके शिशु को शुरुआत में मालिश करवाना पसंद नहीं आता, तो आप थोड़ी देर ही उसकी मालिश करें। एक बार जब शिशु घुटनों के बल या फिर खड़े होकर चलने लगता है, तो हो सकता है वह इतने लंबे समय तक लेटना न चाहे। ऐसे में पांच से 10 मिनट की मालिश काफी होगी।

मालिश के दौरान शिशु के संकेतों को पहचानना भी मालिश का एक जरुरी पहलू है। आपका शिशु संकेतों के जरिये बता देगा कि मालिश कब बंद करती है और आपका किस तरह हाथ फेरना उसे अच्छा लग रहा है और किस तरह नहीं। यदि शिशु मालिश के दौरान रोने लग जाए, तो वह आपको बता रहा है कि अब वह और मालिश करवाना नहीं चाहता।

अगर आप मालिश के बाद शिशु को नहलाना चाहती हैं, तो उस समय की भी गिनती करें। आप नहीं चाहेंगी कि आपका शिशु नहाने से पहले ही बहुत भूखा हो जाए या थक जाए, वरना उसको नहलाना मुश्किल हो सकता है।
शिशु की मालिश करने के लिए सबसे बेहतर समय क्या है?
पारंपरिक तौर पर शिशुओं की मालिश उन्हें नहलाने से ठीक पहले की जाती है, और यह आमतौर पर सुबह के समय ही होता है। हालांकि, आप शिशु की मालिश दिन में किसी भी समय कर सकती हैं, जब वह भूखा या थका हुआ न हो। इस तरह वह मालिश का ज्यादा आनंद ले सकेगा।

आप उसकी मालिश और नहाने के समय के अनुसार उसके स्तनपान, सोने और जगने की दैनिक दिनचर्या निर्धारित कर सकती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि प्रतिदिन वही चीजें, उसी क्रम में और दिन के उसी समय की जाएं, जैसे वे रोजाना की जाती हैं।

शिशुओं को पूर्वानुमानित चीजें पसंद आती हैं, इसलिए प्रतिदिन समान चीजें, समान क्रम में करें। इससे शिशु अधिक सुरक्षित व खुशी महसूस करते हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर आप पहले मालिश करती हैं, इसके बाद शिशु को नहलाती है, फिर स्तनपान करवाकर अंत में उसे सुला देती हैं, तो आपका शिशु भी इस दिनचर्या को समझ जाएगा और रोजना उन्हीं चीजों की उम्मीद करेगा।

हालांकि, नवजात शिशु के साथ इतनी लंबी प्रक्रिया अपनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि उन्हें जल्दी ही दोबारा भूख लग सकती है, या थकान महसूस हो सकती है। शुरुआत में नवजात शिशु की मालिश और नहाने का समय कम रखें। शिशु जब बड़ा होने लगता है और ज्यादा समय जगा रहने लगे, तब आप इस प्रक्रिया का पालन करने के लिए पूरा समय ले सकती हैं।

क्योंकि मालिश शिशु को आराम देती है, इसलिए आप मालिश को रात को सोने के समय की दिनचर्या का हिस्सा भी बना सकती हैं। सोने से पहले शिशु की मालिश दिन भर की उत्तेजना के बाद उसे तनावमुक्त और शांत करने और सोने के लिए तैयार करने में मदद करती है।

अगर, आपका शिशु रात में काफी ज्यादा रोता है, तो शाम को मालिश करने से इसमें कमी आ सकती है। मगर, आमतौर पर शिशु जब रोना शुरु करने वाला हो, उससे पहले ही उसकी मालिश शुरु कर दें।

धीरे-धीरे जब आप शिशु के सोने, जगने और रोने के समय को बेहतर समझने लगेंगी, तो आप उसकी मालिश और नहलाने के लिए उचित समय भी ढूढ़ पाएंगी। इस मामले में शिशु के संकेतों के अनुसार चलें।

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