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पेट में हो रहा है दर्द असलियत में लेबर पेन है या फॉल्स अलार्म, यहां जानें दोनों का अंतर
प्रेग्नेंसी की आखिरी तिमाही यानी 6 से 9 महीने के दौरान जब शरीर डिलिवरी के लिए तैयार हो रहा होता है उस दौरान कई बार पेट में दर्द और संकुचन होता है और लगता है कि लेबर पेन शुरू हो गया। लेकिन डॉक्टर के पास जाओ तो पता चलता है कि ये फॉल्स अलार्म है। तो दोनों के बीच अंतर को कैसे पहचानें, यहां जानें।
प्रेग्नेंसी के पूरे 9 महीने का सफर भले ही आसानी से कट जाए लेकिन आखिरी के कुछ दिन जैसे-जैसे डिलिवरी की ड्यू डेट नजदीक आने लगती है तो उन दिनों को काटना मुश्किल हो जाता है। ऐसा लगता है कि बस अब किसी तरह बच्चा जल्द से जल्द बाहर आ जाए। यह समय एक तरफ जहां बच्चे को देखने की खुशियों से भरा होता है, वहीं दूसरी तरफ आपके मन में लेबर पेन का डर भी होता है। इस दौरान प्रेग्नेंट महिला के साथ-साथ उसके घरवाले भी अलर्ट मोड में रहते हैं और जरा सा पेट में दर्द हुआ नहीं कि किसी भी तरह का रिस्क लेने की बजाए तुरंत डॉक्टर के पास पहुंच जाते हैं। इनमें से ज्यादातर मौकों पर तो यह दर्द लेबर पेन से जुड़ा होता है लेकिन कई बार यह फॉल्स अलार्म भी हो सकता है।


लेबर पेन के दौरान पेट में होता है संकुचन
अगर आप रियल लेबर पेन और फॉल्स लेबर पेन के बीच क्या अंतर है इस बारे में खुद को एजुकेट कर लेंगी, इससे जुड़ी जानकारी इकट्ठा कर लेंगी तो आपके साथ-साथ घरवालों की भी काफी एनर्जी बच जाएगी और आपको बार-बार हॉस्पिटल के चक्कर नहीं लगाने पड़ेगें। तो आखिर कैसे पहचानें कि आपके पेट में हो दर्द असलियत में लेबर पेन है या नहीं, कॉन्ट्रैक्शन्स यानी संकुचन हकीकत में हो रहे हैं या फिर ये सिर्फ एक फॉल्स अलार्म है जिसे ब्रैक्सटन हिक्स क्रॉन्टैक्शन्स भी कहते हैं। दोनों के बीच क्या अंतर है और इसे कैसे पहचानें, यहां जानें।

सी-सेक्शन (सिजेरियन) डिलिवरी से जुड़ी ये 7 बातें हैं झूठ, जानें उनका सच

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हकीकत: सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलिवरी से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक यही है कि इस दौरान किसी तरह का दर्द नहीं होता। आप नॉर्मल डिलिवरी करवाएं या फिर सी-सेक्शन, बच्चे को जन्म देने में दर्द होता ही है। डॉक्टरों की मानें तो चूंकि ऑपरेशन के दौरान आपको ऐनेस्थिसिया दिया जाता है इसलिए उस दौरान आपको भले ही दर्द महसूस ना हो लेकिन एक बार ऐनेस्थिसिया का असर खत्म हो जाता है उसके बाद आपको दर्द, तकलीफ और असहजता महसूस होती है जो करीब 10-15 दिनों तक रहता है।
2-

हकीकत: गाइनैकॉलजिस्ट डॉ जयंती कामत कहती हैं कि बहुत से लोगों के मन में ये भ्रम होता है कि चूंकि सी-सेक्शन में ऑपरेशन से बच्चे का जन्म हुआ है इसलिए महिला की डिलिवरी तो हुई ही नहीं। लेकिन ये बात पूरी तरह से गलत है क्योंकि जब बच्चा महिला के शरीर से बाहर आया तो महिला की डिलिवरी हुई। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि डिलिवरी वजाइना के जरिए नॉर्मल तरीके से हुई या फिर यूट्रस में चीड़ा लगाकर ऑपरेशन के जरिए।
3-

हकीकत: इसमें कोई शक नहीं कि सी-सेक्शन या सिजेरियन डिलिवरी एक बड़ी सर्जरी होती है जिसमें पेट का ऑपरेशन करके यूट्रस से बच्चे को बाहर निकाला जाता है। इन दिनों सी-सेक्शन के इतने ज्यादा केसेज हो रहे हैं कि डॉक्टर्स भी इस दौरान पूरी सावधानी बरतते हैं और यह पूरी तरह से सेफ भी है। डिलिवरी के बहुत से केसेज में तो सी-सेक्शन बेहद जरूरी हो जाता है और यह मां और बच्चे दोनों की लाइफ बचाने का काम करता है। अगर डॉक्टर आपको इससे जुड़े सभी तरह के रिस्क के बारे में पहले ही बता देते हैं तो सी-सेक्शन डिलिवरी सेफ मानी जाती है।
4-

हकीकत: आपकी डिलिवरी कैसे हुई है, नॉर्मल या ऑपरेशन से इस बात का आपकी ब्रेस्टफीडिंग करवाने की क्षमता पर किसी तरह का कोई असर नहीं होता। इन दिनों ज्यादातर हॉस्पिटल्स में सी-सेक्शन डिलिवरी के लिए जनरल ऐनेस्थिसिया की जगह एपिड्यूरल ऐनेस्थिसिया दिया जाता है। इसलिए सी-सेक्शन के बाद आप भी नॉर्मल डिलिवरी वाली महिलाओं की ही तरह बच्चे को ब्रेस्टफीड करवा सकती हैं।
5-

हकीकत: आमतौर पर महिलाओं के मन में यही डर रहता है कि अगर एक बार उनकी सिजेरियन डिलिवरी हो गई तो उसके बाद दूसरी डिलिवरी भी उनकी सी-सेक्शन ही होगी। लेकिन यह बात भी पूरी तरह से सच नहीं है। सिजेरियन के बाद वजाइनल बर्थ करना है या नहीं इसका फैसला कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। जैसे- सी-सेक्शन के दौरान कितने टांके लगे थे, कितनी बार सी-सेक्शन हो चुका है, किसी तरह की कोई मेडिकल कंडिशन है या नहीं आदि। लेकिन ये नामुमकिन नहीं है। सी-सेक्शन के बाद भी नॉर्मल डिलिवरी हो सकती है।
6-

हकीकत: नॉर्मल डिलिवरी के बाद मां की रिकवरी जल्दी हो जाती है लेकिन सी-सेक्शन में चूंकि मेजर सर्जरी होती है और टांके लगे होते हैं इसलिए रिकवरी में थोड़ा ज्यादा समय लगता है। लेकिन सिजेरियन डिलिवरी करवाने की वजह से मां या बच्चे की सेहत पर किसी तरह का कोई असर नहीं पड़ता। हालांकि सी-सेक्शन के बाद अगर नई मां अपनी रिकवरी का पूरा ध्यान न रखे तो उन्हें आगे चलकर सेहत से जुड़ी कुछ दिक्कतें हो सकती हैं।
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हकीकत: ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि चूंकि महिला ने नैचरल तरीके से बच्चे को जन्म नहीं दिया है और ऑपरेशन से डिलिवरी हुई है इसलिए मां और बच्चे के बीच बॉन्डिंग डिवेलप नहीं हो पाती। लेकिन यह बात सच नहीं है। सी-सेक्शन के बाद भी मां की बच्चे के साथ बॉन्डिंग उतनी ही स्ट्रॉन्ग होती है जितनी नॉर्मल डिलिवरी में।


फॉल्स लेबर पेन (ब्रैक्सटन हिक्स क्रॉन्टैक्शन्स) में कैसा दर्द होता है?
- कॉन्ट्रैक्शन्स रेग्युलर नहीं होता यानी थोड़ी देर के लिए होता है और फिर गायब हो जाता है
- कॉन्ट्रैक्शन्स भले ही आपको असहज महसूस करवाएं लेकिन इसमें बहुत ज्यादा तेज और असहनशील दर्द नहीं होता
- चलने, उठने-बैठने या पानी पीने पर दर्द कम हो जाता है
- अगर आपको लेबर पेन नहीं हो रहा और ये दर्द फॉल्स है तो आपको सिर्फ पेट के निचले हिस्से में दर्द महसूस होगा, लोअर बैक (कमर) में नहीं
- जैसे-जैसे कॉन्ट्रैक्शन्स होंगे गर्भ में पल रहे बच्चे की मूवमेंट भी बढ़ जाएगी

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लेबर पेन से पहले शरीर में दिखते हैं ये लक्षण

आपका शरीर करीब एक महीने पहले से रियल लेबर की तैयारियां करने लगता है। इस दौरान सर्विक्स यानी गर्भाशय का मुंह खुलना शुरू हो जाता है, बच्चा पेल्विसस की तरफ नीचे की ओर बढ़ने लगता है, पेल्विस और रेक्टम पर प्रेशर बढ़ने लगता है, एक अजीब सा सेंसेशन फीले होने लगता है, कॉन्ट्रैक्शन्स की मात्रा बढ़ने लगती है। इस तरह के लक्षण शरीर में नियमित रूप से दिखने लगते हैं जिससे शरीर रियल लेबर को लेकर प्रिपेयर होने लगता है।
सी-सेक्शन (सिजेरियन) डिलिवरी से जुड़ी ये 7 बातें हैं झूठ, जानें उनका सच

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हकीकत: सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलिवरी से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक यही है कि इस दौरान किसी तरह का दर्द नहीं होता। आप नॉर्मल डिलिवरी करवाएं या फिर सी-सेक्शन, बच्चे को जन्म देने में दर्द होता ही है। डॉक्टरों की मानें तो चूंकि ऑपरेशन के दौरान आपको ऐनेस्थिसिया दिया जाता है इसलिए उस दौरान आपको भले ही दर्द महसूस ना हो लेकिन एक बार ऐनेस्थिसिया का असर खत्म हो जाता है उसके बाद आपको दर्द, तकलीफ और असहजता महसूस होती है जो करीब 10-15 दिनों तक रहता है।
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हकीकत: गाइनैकॉलजिस्ट डॉ जयंती कामत कहती हैं कि बहुत से लोगों के मन में ये भ्रम होता है कि चूंकि सी-सेक्शन में ऑपरेशन से बच्चे का जन्म हुआ है इसलिए महिला की डिलिवरी तो हुई ही नहीं। लेकिन ये बात पूरी तरह से गलत है क्योंकि जब बच्चा महिला के शरीर से बाहर आया तो महिला की डिलिवरी हुई। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि डिलिवरी वजाइना के जरिए नॉर्मल तरीके से हुई या फिर यूट्रस में चीड़ा लगाकर ऑपरेशन के जरिए।
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हकीकत: इसमें कोई शक नहीं कि सी-सेक्शन या सिजेरियन डिलिवरी एक बड़ी सर्जरी होती है जिसमें पेट का ऑपरेशन करके यूट्रस से बच्चे को बाहर निकाला जाता है। इन दिनों सी-सेक्शन के इतने ज्यादा केसेज हो रहे हैं कि डॉक्टर्स भी इस दौरान पूरी सावधानी बरतते हैं और यह पूरी तरह से सेफ भी है। डिलिवरी के बहुत से केसेज में तो सी-सेक्शन बेहद जरूरी हो जाता है और यह मां और बच्चे दोनों की लाइफ बचाने का काम करता है। अगर डॉक्टर आपको इससे जुड़े सभी तरह के रिस्क के बारे में पहले ही बता देते हैं तो सी-सेक्शन डिलिवरी सेफ मानी जाती है।
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हकीकत: आपकी डिलिवरी कैसे हुई है, नॉर्मल या ऑपरेशन से इस बात का आपकी ब्रेस्टफीडिंग करवाने की क्षमता पर किसी तरह का कोई असर नहीं होता। इन दिनों ज्यादातर हॉस्पिटल्स में सी-सेक्शन डिलिवरी के लिए जनरल ऐनेस्थिसिया की जगह एपिड्यूरल ऐनेस्थिसिया दिया जाता है। इसलिए सी-सेक्शन के बाद आप भी नॉर्मल डिलिवरी वाली महिलाओं की ही तरह बच्चे को ब्रेस्टफीड करवा सकती हैं।
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हकीकत: आमतौर पर महिलाओं के मन में यही डर रहता है कि अगर एक बार उनकी सिजेरियन डिलिवरी हो गई तो उसके बाद दूसरी डिलिवरी भी उनकी सी-सेक्शन ही होगी। लेकिन यह बात भी पूरी तरह से सच नहीं है। सिजेरियन के बाद वजाइनल बर्थ करना है या नहीं इसका फैसला कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है। जैसे- सी-सेक्शन के दौरान कितने टांके लगे थे, कितनी बार सी-सेक्शन हो चुका है, किसी तरह की कोई मेडिकल कंडिशन है या नहीं आदि। लेकिन ये नामुमकिन नहीं है। सी-सेक्शन के बाद भी नॉर्मल डिलिवरी हो सकती है।
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हकीकत: नॉर्मल डिलिवरी के बाद मां की रिकवरी जल्दी हो जाती है लेकिन सी-सेक्शन में चूंकि मेजर सर्जरी होती है और टांके लगे होते हैं इसलिए रिकवरी में थोड़ा ज्यादा समय लगता है। लेकिन सिजेरियन डिलिवरी करवाने की वजह से मां या बच्चे की सेहत पर किसी तरह का कोई असर नहीं पड़ता। हालांकि सी-सेक्शन के बाद अगर नई मां अपनी रिकवरी का पूरा ध्यान न रखे तो उन्हें आगे चलकर सेहत से जुड़ी कुछ दिक्कतें हो सकती हैं।
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हकीकत: ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि चूंकि महिला ने नैचरल तरीके से बच्चे को जन्म नहीं दिया है और ऑपरेशन से डिलिवरी हुई है इसलिए मां और बच्चे के बीच बॉन्डिंग डिवेलप नहीं हो पाती। लेकिन यह बात सच नहीं है। सी-सेक्शन के बाद भी मां की बच्चे के साथ बॉन्डिंग उतनी ही स्ट्रॉन्ग होती है जितनी नॉर्मल डिलिवरी में।


रियल लेबर पेन में कैसा दर्द होता है?
- फॉल्स लेबर के दौरान अगर आप अपनी पोजिशन बदल दें या चलने-फिरने लगें तो दर्द कम हो जाता है या बंद हो जाता है जबकी रियल लेबर पेन के दौरान आप कैसी भी ऐक्टिविटी कर लें दर्द बढ़ता ही जाता है।
- रियल लेबर पेन की शुरुआत लोअर बैक यानी कमर में उठने वाले दर्द से होती है जो धीरे-धीरे पेट के निचले हिस्से तक पहुंचती है और कई बार तो पैर में दर्द होने लगता है।

- कई बार तो लेबर पेन के साथ डायरिया भी शुरू हो जाता है।
- लेबर पेन का कोई सेट पैटर्न नहीं है लेकिन आमतौर पर कॉन्ट्रैक्शन्स बढ़ते जाते हैं, दर्द लगातार होता रहता है और कम होने की बजाए बढ़ता जाता है।
- प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाला बच्चा फ्लूइड से भरे मेम्ब्रेन से घिरा रहता है जिसे ऐमिनोएटिक सैक भी कहते हैं। लेबर पेन की शुरुआत के दौरान यह मेम्ब्रेन फट जाता है जिसे वॉटर ब्रेक होना भी कहते हैं और फिर फ्लूइड बाहर आने लगता है।
सी-सेक्शन (सिजेरियन) डिलिवरी से जुड़ी ये 7 बातें हैं झूठ, जानें उनका सच

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हकीकत: सिजेरियन या सी-सेक्शन डिलिवरी से जुड़ा सबसे बड़ा मिथक यही है कि इस दौरान किसी तरह का दर्द नहीं होता। आप नॉर्मल डिलिवरी करवाएं या फिर सी-सेक्शन, बच्चे को जन्म देने में दर्द होता ही है। डॉक्टरों की मानें तो चूंकि ऑपरेशन के दौरान आपको ऐनेस्थिसिया दिया जाता है इसलिए उस दौरान आपको भले ही दर्द महसूस ना हो लेकिन एक बार ऐनेस्थिसिया का असर खत्म हो जाता है उसके बाद आपको दर्द, तकलीफ और असहजता महसूस होती है जो करीब 10-15 दिनों तक रहता है।

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