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डाउंस सिंड्रोम क्या है?
डाउंस सिंड्रोम एक आनुवांशिक स्वास्थ्य स्थिति है। गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हमारी कोशिकाओं में वे डीएनए पैकेज हैं, जिनमें हमारे वंशाणु होते हैं। डाउंस सिंड्रोम तब होता है, जब निषेचन के समय शिशु हर कोशिका में सामान्य से एक ज्यादा गुणसूत्र के साथ अपनी जिंदगी शुरु करता है।

जिन शिशुओं को डाउंस नहीं होता, उनमें हर कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं, 23 उसे माँ से और 23 पिता से मिलते हैं।

डाउंस सिंड्रोम वाले शिशु में कुछ या सभी कोशिकाओं में एक विशेष गुणसूत्र - गुणसूत्र 21 - की अतिरिक्त प्रति होती है। इससे हर कोशिका में कुल 47 गुणसूत्र हो जाते हैं। अतिरिक्त गुणसूत्र होने का असर शरीर के सभी हिस्सों पर पड़ सकता है, जिससे शिशु के विकास में बाधा उत्पन्न होती है।

परिणाम के तौर पर डाउंस सिंड्रोम के साथ जन्मे शिशुओं में विशिष्ट शारीरिक लक्षण होते हैं और उनमें कुछ हद तक सीखने की अक्षमता होती है।

डाउंस सिंड्रोम तीन तरह का होता है:

ट्राइसमी 21, डाउंस सिंड्रोम का सबसे आम प्रकार है (करीब 94 प्रतिशत शिशु इस स्थिति के साथ जन्म लेते हैं)। ट्राइसमी 21 में शरीर की हर कोशिका में एक अतिरिक्त गुणसूत्र 21 होता है।

ट्रांसलोकेशन, जिसमें गुणसूत्र 21 के कुछ अतिरिक्त तत्व अन्य गुणसूत्र से जुड़ जाते हैं। डांउस सिंड्रोम वाले करीब चार प्रतिशत शिशुओं में इस तरह की स्थिति होती है।

मोजैक, जिसमें शरीर की केवल कुछ कोशिकाओं में ही अतिरिक्त गुणसूत्र 21 होता है। डाउसं सिंड्रोम वाले करीब दो प्रतिशत शिशुओं में इस तरह की स्थिति होती है।


सामान्यत: तीनों तरह के डाउंस सिंड्रोम में लगभग समान लक्षण होते हैं।

यह स्थिति आप जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक आम है। भारत में जन्मे हर 800 से 1000 शिशुओं में से करीब एक को यह स्थिति प्रभावित करती है।

डाउंस सिंड्रोम के साथ जन्मे शिशुओं में सीखने की अक्षमता होती है, मगर यह कितनी ज्यादा या कम है, यह बच्चे पर निर्भर करता है। इन शिशुओं को कुछ विशेष स्वास्थ्य समस्याएं होने का भी खतरा रहता है। हालांकि, सभी शिशुओं के साथ ऐसा हो, यह जरुरी नहीं। कुछ शिशु एकदम स्वस्थ भी होते हैं।

यदि आपके शिशु को डाउंस सिंड्रोम है, तो उसे निम्नांकित कुछ या सभी शारीरिक लक्षण हो सकते हैं:

शिथिल मांसपेशियां व जोड़ (वह पिलपिला सा लग सकता है)
एक सिलवट जो उसकी हथेलियों के पार जाती है।
आंखें जो ऊपर या बाहर की तरफ तिरछी हो जाती हैं।
छोटा मुंह, जिससे उसकी जीभ थोड़ी बड़ी लग सकती है
सिर का आकार पीछे से सपाट होना
जन्म के समय औसत से कम वजन
समतल, सपाट चेहरा और छोटी नाक
चौड़े हाथ और छोटी उंगलियां, कनिष्ठा उंगली जो अंदर की तरफ मुड़ती है
पैर की पहली और दूसरी उंगली के बीच बड़ा अंतर (सैंडल गैप)
नाटा और गठीला शरीर

कुछ शिशु डांउस सिंड्रोम के साथ पैदा क्यों होते हैं?
यह स्पष्ट नहीं है कि कुछ शिशुओं का जन्म डाउंस सिंड्रोम के साथ क्यों होता है। अधिकांश मामले आनुवांशिक नहीं होते और निषेचन के समय संयोगवश ऐसा होता है।

100 में से एक शिशु यह स्थिति अपने माता या पिता से पाता है, चाहे फिर माता या पिता को खुद डाउंस सिंड्रोम न हो। ऐसा ट्रांसलोकेशन टाइप सिंड्रोम वाले कुछ मामलों में होता है, सभी में नहीं।

अधिक उम्र हो जाने पर गर्भधारण करने से डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु के जन्म की संभावनाएं अधिक होती हैं। हालांकि, यह बात जानकर आपको आश्चर्य होगा कि डाउंस सिंड्रोम के साथ जन्मे अधिकांश शिशुओं की माँओं की उम्र 35 साल से कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि युवा महिलाएं औसतन अधिक जननक्षम होती हैं। अधिक उम्र की महिलाओं में गर्भधारण की संभावनाएं कम होती हैं, इसलिए उनमें डाउंस सिंड्रोम वाले शिशु को जन्म देने की संख्या कम होती है।

यदि आपके शिशु को डाउंस सिंड्रोम है, तो खुद को इसका दोषी न मानें। गर्भावस्था से पहले या बाद में आपने ऐसा कुछ नहीं किया, जिसकी वजह से शिशु के साथ ऐसा हुआ।
क्या डाउंस सिंड्रोम का पता जन्म से पहले चल सकता है?
हां। सभी गर्भवती महिलाओं को न्यूकल ट्रांसलुसेंसी (एनटी) स्कैन करवाने के लिए कहा जाता है, ताकि शिशु में डाउंस सिंड्रोम होने की आशंका का आंकलन किया जा सके। यह पहली तिमाही में होने वाले विस्तृत स्कैन का हिस्सा होता है।

यदि स्कैन के परिणामों से पता चले कि शिशु को डाउंस सिंड्रोम होने की उच्च संभावना है, तो डॉक्टर आपको डायग्नोस्टिक जांच करवाने की सलाह दे सकती हैं, जिससे एक निश्चित उत्तर मिल जाएगा। इसके लिए दो डायग्नोस्टिक टेस्ट एमनियोसेंटेसिस और कोरियोनिक विलस सैम्पलिंग (सीवीएस) उपलब्ध हैं।

इन जांचों में डॉक्टर एक बारीक सुईं आपके गर्भ में डालेंगी और कोशिकाएं निकालेंगी, ताकि प्रयोगशाला में उनकी जांच हो सके। इन जांचों में इनफेक्शन या गर्भपात होने की थोड़ी-बहुत संभावना होती है। यदि आपको ये टेस्ट करवाने के लिए कहा गया है, तो डॉक्टर आपको इनसे जुड़े जोखिम और फायदों के बारे में विस्तार से बताएंगी, ताकि आप सही निर्णय ले सकें।

डाउंस सिंड्रोम के लिए होने वाले स्क्रीनिंग टेस्ट्स के बारे में हमारा यह लेख पढ़ें।

जन्म के बाद डाउंस सिंड्रोम का पता करने के लिए शिशु के डॉक्टर ध्यानपूर्वक शिशु में इस स्वास्थ्य स्थिति के शारीरिक लक्षणों को देखेंगे। वे आपके शिशु के खून का नमूना लेगें, ताकि जिस अतिरिक्त गुणसूत्र की वजह से डाउंस होता है, उस गुणसूत्र का पता चल सके।
क्या मेरे शिशु को स्वास्थ्य समस्याएं होंगी?
यदि आपका शिशु स्वस्थ है, तो उसकी जरुरतें अन्य शिशुओं की जैसी ही होंगी। इस चरण पर आपको कुछ अलग या विशेष करने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, कुछ शिशुओं में डाउंस सिंड्रोम की वजह से निम्नांकित कुछ या सभी स्वास्थ्य स्थितियां हो सकती हैं:

मांसपेशियों, जोड़ों, हड्डियों और हरकतों से जुड़ी समस्याएं
देखने और सुनने में परेशानी
संक्रमणों के प्रति अतिसंवेदनशीलता
पाचन से जुड़ी समस्याएं
फेफड़ों में विकार
दिल से जुड़े दोष


डाउंस सिंड्रोम वाले लोगों को ल्युकेमिया और खून संबंधी अन्य विकार होने का जोखिम औसत से अधिक होता है।

उन्हें आंतों में भी समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि डुओडीनल अट्रेसिया नामक स्थिति, जिसमें छोटी आंत का पहला हिस्सा पूरी तरह या फिर आंशिक रुप से अवरुद्ध हो सकता है।

यह महत्वपूर्ण है कि बच्चे को जिंदगीभर अच्छी स्वास्थ्य देखभाल मिले, ताकि समस्याओं का समय पर पता चल सके और उनका समाधान किया जा सके। उसकी नियमित स्वास्थ्य जांच होनी चाहिए, जिसमें सुनने और देखने से जुड़ी जांचें भी शामिल हैं।

अगर जरुरत हो तो सीखने की अक्षमता पर काम करने वाली टीम शिशु की देखभाल कर सकती है। यह टीम पेशेवरों का एक समूह होगा, जिसमें डॉक्टर, नर्स, काउंसलर, थेरेपिस्ट और अध्यापक शामिल होंगे।
शिशु का भविष्य कैसा रहेगा?
डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त सभी बच्चों को किसी न किसी हद तक सीखने से जुड़ी अक्षमता होती ही है। हालांकि, यह हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है। अधिकांश बच्चे चलना, बात करना, शौचालय का इस्तेमाल, लिखना व पढ़ना सीख लेते हैं, मगर वे यह अपनी ही गति के अनुसार करेंगे।

शिशु अपने सामर्थ्य का पूरा इस्तेमाल कर सकें, यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि अच्छी चिकित्सकीय देखभाल के अलावा उसे सही सामाजिक व शैक्षिक सहयोग मिले। हो सकता है उसे अतिरिक्त सहायता की जरुरत हो, जैसे कि स्पीच थैरेपी, फिजियोथैरेपी और विशेष शिक्षा।

यदि आपके शिशु में सीखने से जुड़ी दिक्कतों का पता चले तो आपको उसके लिए विशेष शिक्षा केंद्रों या स्कूलों को चुनना पड़ सकता है। कई सामान्य स्कूलों में आजकल विशेष शिक्षा के लिए अलग विभाग होता है, जिसमें प्रशिक्षित स्पेशल एजुकेटर होते हैं।

हर बच्चे की तरह, डाउंस सिंड्रोम वाले शिशु को भी अपने परिवार से प्यार और सम्मान की जरुरत होती है और उसे विकसित होने के लिए सहयोग चाहिए होता है। डांउस सिंड्रोम वाले लोग वयस्कता मे भी पूरी और सक्रिय जिंदगी जी सकते हैं।

डाउन सिंड्रोम फेडरेशन आॅफ इंडिया के अनुसार डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त व्यक्ति, जिसका स्वास्थ्य अच्छा है वह 55 साल या इससे अधिक तक जी सकता है। डाउंस सिंड्रोम वाले जिन लोगों के साथ स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं, उनका जीवन इससे कम अवधि का होता है। उदाहरण के तौर पर डाउंस सिंड्रोम वाले 40 से 50 प्रतिशत शिशुओं में दिल से जुड़ी जन्मजात समस्याएं होती हैं, जो कि शुरुआती दो सालों में मृत्यु का सबसे आम कारण होती हैं।

हाल ही में हुए एक भारतीय अध्ययन के मुताबिक जन्मजात हृदय रोग जीवन के पहले दो सालों में मौत का खतरा पांच गुणा बढ़ा देते हैं।

डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त वयस्कों को विशेष सहयोग की जरुरत हो सकती है। उदाहरण के तौर पर काउंसलर और पेशेवर थैरेपिस्ट स्वावलंबी जीवन जीने में मदद कर सकते हैं।
हमें कहां से मदद मिल सकती है?
आप मदद के लिए हमेशा अपने शिशु के डॉक्टर के पास जा सकती हैं। वे आपको मदद के लिए विशेषज्ञ डॉक्टर के पास जाने के लिए कह सकते हैं। हो सकता है अस्पताल में विशेषज्ञों की टीम आपके शिशु को देख रही हो। कुछ क्षेत्रों में बच्चों के विकास संबंधी क्लिनिक होते हैं, जहां एक ही जगह पर सभी विशेष मदद मिल सकती हैं।

डाउंस सिंड्रोम से ग्रस्त शिशु के पालन-पोषण एक चुनौती हो सकता है। आपको शायद ऐसा होने की कभी उम्मीद नहीं थी। आपको कई मुश्किल भरे दिनों से गुजरना पड़ेगा, वही कुछ समय अच्छा भी होगा। मगर, आपको अन्य परिवारों से काफी सहयोग मिल सकता है, जिन्होंने डाउंस से ग्रस्त अपने बच्चों को सकारात्मक अनुभव के साथ बड़ा किया है।

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