क्या बड़े बच्चे स्वस्थ होते हैं?HealthPlanet

Posted on Fri 11th Nov 2022 : 09:30

नवजात शिशु और बाल स्‍वास्‍थ्‍य
नवजात शिशुओं की मृत्‍यु पर रोक लगाएं और हर बच्‍चे का जीवन सुनिश्चित करें
नीले रंग की पृष्ठभूमि में खेलती एक बच्ची

दुनियाभर में एक साल में पैदा होने वाले कुल 2.5 करोड़ बच्चों का लगभग पांचवां हिस्सा भारत में जन्म लेता है। इन शिशुओं में से हर मिनट एक शिशु की मृत्यु हो जाती है।

सभी मातृ मृत्युओं में से लगभग 46 प्रतिशत और नवजात शिशुओं की 40प्रतिशतमृत्यु, प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद 24 घंटे के अंदर होती है। नवजात शिशुओं की मृत्यु के प्रमुख कारणों में समय से पहले प्रसव (35 फीसदी), नवजात शिशु को संक्रमण (33 फीसदी), प्रसव के दौरान दम घुटना (20 फीसदी) और जन्मजात विकृतियां (9 फीसदी) हैं।

फिर भी, प्रसव के दौरान और प्रसव के बाद होने वाली मृत्यु को कुशल प्रसव सहायक और आपातकालीन प्रसूति देखभाल की सुविधाओं से काफी हद तक रोका जा सकता है। शिशु के जन्म लेने के बाद,तुरन्त और केवल स्तनपान कराने से तथा खसरा एवं टीके से रोकी जा सकने वाली अन्य बीमारियोंके टीके लगाने से जीवित रहने की दर तेजी से बढ़ती है।

उद्धरण : भारत में लगभग 35लाख बच्चे आसामयिक (सही समय से पहले) जन्म लेते हैं, 15लाख बच्चे विकार लेकर पैदा होते हैं, और हर साल 10 लाख बच्‍चों को विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों (एसएनसीयू) से छुट्टी दी जाती है। ऐसे नवजात शिशुओं को मृत्यु, स्टंटिंग और विकास में देरी का बहुत अधिक जोखिम होता है।

भारत ने नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कम करने में उन्नति की है।नवजात शिशुओं की मृत्यु में भारत की हिस्‍सेदारी, जो1990 में विश्‍वभर में नवजात शिशुओं की मृत्यु का एक तिहाई थी, आज कुल एक चौथाई से भी कमहै। 1990 की तुलना में 2016 में भारत में हर माह,नवजात शिशुओं की मृत्यु में लगभग 10लाख की कमी और मातृ मृत्यु मेंदस हजार की कमी आई है। यह अधिक से अधिक महिलाओं का प्रसव स्वास्थ्य सुविधाओं में कराने का ही परिणाम है।

महजएक दशक पहले, दस में से छह महिलाओं का प्रसव उनके अपने घरों में किया जाता था जिसमें किसी कुशल प्रसवपरिचर की मदद नहीं ली जाती थी – जिससे वे और उनका नवजात शिशु,दोनों को जोखिम होता था। आज, यह संख्या तीन गुना कम हो गई है और दस में से आठ महिलाओं का प्रसव स्वास्थ्य सुविधा में किया जाने लगा है।

परंतु,सेवा प्रदान करने की गुणवत्ता उसके कवरेज में बढ़ोत्‍तरीके मुताबिक नहीं बढ़ी है।देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं की कम गुणवत्ता का परिणाम है किसंस्थागत प्रसव में से सिर्फ 42 फीसदी मामलों में, स्तनपान जल्‍द शुरू किया जाता है, मृत शिशुओं का जन्‍म स्तर अधिक है (14 मृत शिशु(स्टिलबॉर्न) प्रति 1000 प्रसव) और एसएनसीयू में बहुत-सी मौतें दम घुटने की वजह से हो जाती हैं।

कवरेज में वृद्धि भी समान नहीं रही है; 50 लाख (21 प्रतिशत) महिलाएं – जिनमें से अधिकांश आदिवासी हैं, सबसे गरीब परिवारों से हैं और प्राय: दुर्गम क्षेत्रों में रहती हैं, अभी भी प्रसव अपने घरों में ही कर रही हैं।

उद्धरण : नवजात शिशु के जीवन के पहले 28 दिन, मां और शिशु की जटिलताओं की रोकथाम और प्रबंधन के लिए अति महत्वपूर्ण होते हैं, जो अन्यथा घातक साबित हो सकते हैं।

यद्यपि भारत ने बाल मृत्यु दर में कमी लाने में महत्वपूर्ण प्रगति कीहै, पर अब सबसे अधिक वंचित समूहों तक पहुंच बनाने पर ध्‍यान दिया जाना चाहिए;बालिकाओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। जहां देश में एसएनसीयू के तेजी से बढ़ते स्तर से शिशु मृत्यु दर में कमी आईहै, वही इससे नवजात कन्‍या की देखभाल करने में सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं भी सामने आई हैं। कई मामलों में, विशेष रूप से बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, नवजातकन्या को उचित देखभाल के अधिकार से वंचित किया जाता है। सेवाएं नि:शुल्‍क उपलब्ध होने के बावजूद, एसएनसीयू में आधे से भी कम (41 प्रतिशत) प्रवेश लड़कियों के हैं। 2017 में, पूरे भारत में 750 से अधिक एसएनसीयू में पहले के अपेक्षा 180,000 कम नवजात लड़कियोंको भर्ती कराया गया था। हालाँकि, प्रमाणों से पता चलता है कि नवजात लड़कियांजैविक रूप से अधिक मजबूत होती हैं,लेकिन वे व्यापक स्तर पर लड़कों को प्राथमिकता दिए जाने के कारण सामाजिक रूप से कमज़ोर रहती हैं–नवजात और पांच वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की मृत्यु दर से यह पता चलता है।

उद्धरण: भारत दुनिया का एकमात्र ऐसाबड़ा देश है जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों की मृत्यु दर 11 प्रतिशत अधिक है, जबकि वैश्विक स्तर पर लड़कियों की मृत्‍यु दर लड़कों की मृत्‍यु दर की तुलना में 10 प्रतिशत कम है।

नवजात शिशुओं के लिए यूनिसेफ के कार्यक्रमों में देखभाल की असमानताओं को कम करना, स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना और प्रतिरोध एवं ज़ोखिम अनुरूप योजना बनाना शामिल है। सबसे वंचित समुदायों में पर्याप्त निवेश और दृढ़ अगुवाई लाखों छूटीमाताओं और उनके नवजात शिशुओं को बचा सकते हैं।

यूनिसेफ का दोनों लिंगों के नवजात शिशुओं की मृत्‍यु में समान कमी लाने पर ज़ोर भारत सरकार की इंडियान्‍यूबोर्न एक्‍शन प्‍लान (India New-born Action Plan) के अनुरूप है, जिसमेंयूनिसेफ एक प्रमुख भागीदार है। इस कार्य-योजना का उद्देश्य शिशुओं की रोकी जा सकने वाली मृत्‍यु, स्टिलबॉर्न के जन्‍म में कमी लाना और शिशु मृत्‍यु दर व स्टिलबॉर्न दर को 2030 तक ‘इकाई अंक’ तक लाना है।

प्रसव का दिन,माँ और शिशु दोनों के लिए ज़ोखिम भरा होता है।लगभग आधी मातृ-मृत्यु और 40प्रतिशत शिशु-मृत्यु और स्टिलबॉर्न शिशुओं के जन्‍म इस ही दिन होते हैं। अत:,यूनिसेफ के कार्यक्रमों में प्रसव के दिन को प्राथमिकता दी गई है। इस दिन स्वास्थ्य, पोषण और वॉश कार्यक्रमों का एक साथ हस्तक्षेप किया गया है जिससे मातृ-मृत्यु, स्टिलबॉर्न शिशुओं के जन्‍म और शिशुमृत्युमें निवेश पर तीन गुणा फायदा होता है।

यूनिसेफ सामाजिक और व्यवहारगत परिवर्तन पहलों के माध्यम से सुविधाओं की मांग बढ़ाने पर जोर देता है जिनमें संस्थागत प्रसव और स्वास्थ्य सुविधाओं में स्वास्थ्य लाभ पा रही महिलाओं को वहांरह ने को बढ़ावा दिया जाता है। उनके वहां रहने के दौरान, परिवार नियोजन, जल्दी और केवल स्तनपान कराने, हाथ धोने और शिशु की देखभाल संबंधी महत्वपूर्ण बातों को बार-बार प्रोत्साहित किया जाता है।गर्भवती महिलाओं की स्वास्थ्य सुविधाओं में गुणवत्ता और सम्मान जनक देखभाल तक पहुँच में सुधार करने के प्रयासों और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा (आशा कार्यकर्ता) माँ और नवजात शिशु,दोनों के लिए अनुवर्ती घर-आधारित शिशु देखभाल दौरे जारी रखकर और देखभाल सुनिश्चित करके, सामुदायिक हस्तक्षेप का समर्थन किया जाता है।

सुविधा-आधारित शिशु देखभाल के लिए विषय गत तकनीकी बढ़त के रूपमें, यूनिसेफ पूरे भारत में एसएनसीयू में सुधार करने और विश्व स्तर पर रोग ग्रस्‍त शिशुओं के लिए सबसे बड़े रियल टाईम ऑनलाइन डाटा बेस बनाने में महत्‍वपूर्ण कार्य कर रहा है। यूनिसेफ को भारत में 115 में से 39 आकांक्षी जिलों में मुख्य साझेदार की भूमिका भी सौंपी गई है। सामाजिक क्षेत्रों में कमजोर संकेतक होने से, इन आकांक्षी जिलों की संबंधित मंत्रालयों के साथ समन्वय में नीति आयोग द्वारा एकीकृत कार्रवाई के लिए पहचान की गई है।

यूनिसेफ कंगारू केयर प्रक्रिया को बड़े स्तर पर व्यापक करने के प्रयासों में भी नज़दीकी से जुड़ा है और गुणवत्ता में सुधार की पहलों, कुशल प्रसव परिचारक के लिए क्षमता निर्माण के प्रयासों, आवश्‍यक नवजात शिशु देखभाल तथा रोगग्रस्‍त शिशुओं की देखभाल के लिए भी सहायता प्रदान कर रहा है।

यूनिसेफ योजना बनाने, बजट, नीति निर्माण, क्षमता निर्माण, निगरानी और सुविधाओं की मांग उत्पत्ति में सहायता करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (एमओएचएफडब्‍ल्‍यू), महिला और बाल विकास मंत्रालय (डब्‍ल्‍यूसीडी), नीति आयोगऔर राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करता है। शिशुओं की उत्‍तरजीवि‍ता के एजेंडे को आगे ले जाने के लिए यूनिसेफ नेशनल नियोनैटोलॉजी फोरम, फेडरेशन ऑफ ओब्स्टेट्रिक्स और गाइनोकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया, एवं इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, मेडिकल कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों, नागरिक समाज तंत्रों, द पार्लियामेंटेरिअंस ग्रुप फॉर चिल्ड्रन, मीडिया और निजी क्षेत्र जैसे पेशेवर संगठनों के साथ कार्यनीतिक साझेदारी करता है।

वैश्विक स्तर पर यूनिसेफ #EveryChildALIVE पर फोकस कर रहा है, जो विशेषत:नवजात शिशुओं पर केंद्रित एकअभियान है जिसमें बालिका शिशुओं पर विशेष ध्यान देते हुए, शिशुओं की रोकी जा सकने वाली मृत्‍यु का अंत करने में यूनिसेफ भारत के प्रयासों में मददगार है और उन्‍हें गति प्रदान करता है।

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wordpress 3 years ago 5 Answer
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