खुजली वाली त्वचा किन बीमारियों से होती है?HealthPlanet

Posted on Fri 9th Dec 2022 : 09:03

त्वचा के रोग बहुत आम हैं

आँतों और फेफड़ों जैसे त्वचा का भी लगातार कीटाणुओ, परजीवियों, एलर्जी करने वाले तत्वों और चोट से सामना होता रहता है। इसलिए त्वचा के रोग बहुत आम हैं। गॉंव में त्वचा के संक्रमण और रोग बहुत ज़्यादा होते है। पामा, स्कैबीज़, दाद, जूँ आदि से प्रभावित होना, पायोडरमा और कुष्ठरोग काफी आम है। कही कही स्कैबीज़, दाद और जुँए इतने आम हैं कि लोग इन पर ध्यान भी नहीं देते। इसके अलावा त्वचा पर चोटें लगना और एलर्जी भी काफी आम है। त्वचा के ज़्यादातर संक्रमण तो रहने के हालात सुधरने से ही कम हो सकते हैं। नहाने धोने के लिए पर्याप्त पानी मिलना, पहनने के लिए ज़्यादा कपड़े मिलना, बेहतर घर और स्वच्छता के बारे में बेहतर समझ बनना महत्वपूर्ण है। चूँकि त्वचा के रोग आसानी से दिखाई देते हैं, इनसे डर और घृणा होती है। इनमें से कई बीमारियों बार-बार होती है। इन बीमारियों में स्टीरॉएडस का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल होता है क्योंकि स्टीरॉइड जल्दी से आराम पहुँचाते हैं। स्टीरॉइड जो उस समय तो बीमारी में अस्थाई आराम दिला देते है, परन्तु दीर्घ काल के लिए असल में बीमारी बढ़ा देते हैं।

त्वचा रोगो के उपयुक्त निदान और इलाज तभी सम्भव है अगर हमारे पास पर्याप्त जानकारी और अनुभव हो। स्कैबीज और दाद जैसी आम बीमारियों का भी अक्सर ठीक से निदान और उपचार नहीं हो पाता। ज़ाहिर है त्वचा की अलग अलग बीमारियों के लिए अलग-अलग इलाजों की ज़रूरत होती है। जैसे कि स्कैबीज, फफूँद रोधी दवाई से ठीक नहीं हो सकता और एलर्जी रोगाणु नाशक दवाइयों से ठीक नहीं हो सकती।
त्वचा की परतें

त्वचा की दो परतें होती हैं। बाहय एपीडर्मिस में कोशिकाओं की पॉंच तहे होती हैं। ये कोशिकाएँ घिसती रहती हैं अत - शरीर से इनका बार-बार बदलते रहना ज़रूरी होता है। एपीडर्मिस में न तो खून की पहुँच होती है और न ही तंत्रिकाएँ। एपीडर्मिस पोषक तत्वों को ग्रहण करने के लिए और तंत्रिका कार्यों के लिए नीचे की परत यानि डर्मिस पर निर्भर रहती है।

एपीडर्मिस और मैलेनिन

एपीडर्मिस में मैलेनिन नाम का एक रंजक होता है और त्वचा का रंग इसी रंजक के कारण होता है। जितनी ज़्यादा मैलेनिन की मात्रा होती है त्वचा का रंग उतना ही ज़्यादा गहरा होता है। त्वचा में कितना मैलेनिन होगा ये व्यक्ति के गुणसूत्रों से तय होता है। सूर्य की रोशनी से कुछ हद तक ही मैलेनिन की मात्रा बढ़ती है। इसलिए एक ठण्डे देश में रह रहे किसी काले व्यक्ति की त्वचा गोरी नहीं हो सकती हालॉंकि त्वचा का रंग थोड़ा हल्का हो सकता है। इसी तरह गर्म देश में रह रहा एक गोरे व्यक्ति की त्वचा का रंग काला नहीं हो सकता, थोड़ा गहरा ज़रूर हो सकता है। साधारणतय सभी प्रजातियों में औरतों में पुरूषों के मुकाबले औरतोँ में कम मैलेनिन होता है। त्वचा का रंग कैरोटनि से भी नियंत्रित होता है। कैरोटेन त्वचा के नीचे स्थित वसा की परत में पाया जाता है। इससे रंग में थोड़ा सा पीलापन आ जाता है। दूसरी परत के खून के संचरण से भी त्वचा को रंग और चमकीलापन मिलता है।

डर्मिस

डर्मिस में कोशिकाएँ और रेशे दोनों होते है। इसमें धमनियों और खून की सूक्ष्म नलियों का जाल, तंत्रिकाएँ, पसीने की ग्रंथियॉं, और तेल स्त्रावित करने वाली तेलीय ग्रंथियॉं, बालों और पेशियों के जाल सभी होते हैं। इन सभी के कुछ न कुछ खास काम होते हैं। पसीने की ग्रंथियॉं शरीर में पानी की मात्रा और तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। कुछ ग्रंथियॉं एक तेलीय पदार्थ स्त्रवित करती है। यह त्वचा पर फैल जाता है और उसको सूखने व चटखने से बचाता है। साबुन इस परत को हटा देते हैं और त्वचा को सूखा देते हैं। तंत्रिकाएँ दवाब, गर्मी, सर्दी और दर्द की संवेदना को ग्रहण करती है।

अलग-अलग जगहों जैसे हथेलियॉँ, तलवे, चेहरे और शरीर के आगे व पीछे के भाग की त्वचा की मोटाई अलग-अलग होती है। इन सब जगहों में त्वचा की संवेदनशीलता भी अलग-अलग होती है। हमें शरीर के सामने के हिस्से में मच्छर के काटने का अहसास शरीर के पिछले भाग की तुलना में ज़्यादा जल्दी व ज़्यादा तीव्रता से होता है क्योंकि यहॉं की त्वचा के तंत्रिकाएँ ज़्यादा होती हैं।
खुजली वाली बीमारियाँ

खुजली के कई कारण होते है खुजली त्वचा की आम शिकायत होती है जो कि स्कैबीज, जुओ, दाद, पायोडरमा, तेज गर्मी, कीड़े के काटने, एलर्जी या त्वचा के सूख जाने से हो सकती है।

इलाज खुजली के कारण पर निर्भर करता है। हम कुछ समय के लिए खुजली को किसी एन्टीहिस्टेमिन दवा (जैसे सीपीएम) द्वारा नियंत्रित कर सकते हैं। सीपीएम सस्ता होता है, असरकारी भी होता है परन्तु इससे थोड़ी सुस्ती सी आने लगती है। अन्य दवाइयों जैसे सैट्रीजीन या टरुफेनडीन से सुस्ती नहीं होती पर ये थोड़ी महॅंगी होती है।
स्कैबीज़ (बड़ी खुजली)

खाज यानी स्कैबीज़ एक छोटे से कीड़े से होता है। यह त्वचा में घुस जाता हे और वहॉं अपनी संख्या बढ़ाता है। ये कीड़ा मुलायम गीली त्वचा में घुस जाता है। बीमारी सीधे सम्पर्क, कपड़ो या बिस्तर से फैलती है। यह एक छूत का रोग है और बहुत ही तेजी से एक व्यक्ति में फैलता है।

चिकित्सीय लक्षण

इसमें मुख्य शिकायत खुजली की होती है। खुजली शाम के समय शुरू होती है और आमतौर पर दिन के समय में कम होती है। शरीर पर केवल कुछ ही कीड़े होने पर भी खुजली होती है। स्कैबीज़ अक्सर हाथ से शुरू होती है। बाद में ये कीड़े कलाइयों, कोहनियों, बगलों, धड़, कमर, जनन अंगो और औरतों में स्तनों में भी पहुँच जाते हैं। वयस्कों में चेहरा और खोपड़ी आमतौर पर इसके प्रकोप से बच जाते हैं। आपके त्वचा पर बिल दिख सकते है। परन्तु कीड़े बहुत छोटे होते हैं और त्वचा के अन्दर घुसे रहते है। घावों में खासतौर पर शाम को बहुत भयंकर खुजली होती है।

स्कैबीज़ के घाव सूखे हुए होते है। अगर उनमें बैक्टीरिया से कोई संक्रमण हो जाए तो वो काफी खराब से दिखने लगते हैं क्योकि उनमें पीप होती है। संक्रमण से बुखार भी हो जाता है। स्कैबीज़ एक सामाजिक समस्या है और आमतौर पर साफ रहन-सहन के अभाव में हो जाती है। व्यक्तिगत सफाई का अभाव, पानी की कमी, थोड़ी सी जगह में बहुत से लोगों का रहना, बिस्तरे व कपड़े मिल-बॉंट कर इस्तेमाल करना और स्वास्थ्य पर ध्यान न देना स्कैबीज़ के फैलाने के मुख्य कारण है। साफ है कि अस्पताल में एक या दो रोगियों को इलाज करना काफी नहीं है। हमें पूरे समूह का ही इलाज करना पड़ेगा यही तरीका पूरे समुदाय में स्कैबीज़ के चक्र को तोड़ सकेगा।

इलाज

सफाई और स्कैबीज़ की दवा (परमेथ्रीन ५%) का एक घोल त्वचा पर लगाना असरकारी होता है। यह दवा लगाते हुए आँखें को बचाना चाहिए। दवाई शरीर पर ८-१२ घण्टे लगी रहने दें और फिर धो लें। कपड़ो व बिस्तरों को साफ करने को लेकर भी सलाह दें या तो कपड़े पानी में 15 मिनट के लिए उबाले जा सकते हैं या फिर दिन भर धूप में रखे जा सकते हैं या फिर इन्हें गामा बीएचसी पाउडर छिडककर बाद में धो ले। सम्पर्क में आने वाली अन्य चीज़ों का शोधन भी इसी तरह करें नहीं तो स्कैबीज़ दो सप्ताह में फिर से हो जाएगी।

परमेथ्रीन मल्हम मेहंगा होता है, इसलिए अधिकांश मरीजों को अभी भी लिंडेन लोशन से ही इलाज कराया जाता है| इसे आँख और मुँह के आस पास न लगाएँ| गर्भवती महिला और शिशुओं में परमेथ्रीन ज्यादा बेहतर होता है|

खुजली का इलाज

खुजली के इलाज के लिए सीपीएम की गोलियॉं लें (देखें दवाइयों वाली सारणी)। स्कैबीज़ में संक्रमण होने पर पॉंच दिनो का एन्टीबैक्टीरियल दवाइयों का कोर्स दे। जैसे कोट्रीमाक्साजोल या एमोक्सीसिलीन या टैट्रासाइक्लीन और उसके बाद परमेथ्रीन लगाएँ। बच्चों का इलाज भी इसी तरह करें परन्तु उन्हे टैट्रासाइक्लीन न दे।

आयुर्वेद

द्वद्रुहर लेप या महा-मारीच्यादी तेल लगाने से त्वचा को फायदा होता है। आरोग्यवर्धिनी और मंजिष्ठा दवाइयॉं साथ-साथ देने से फायदा होता है। स्कैबीज़ के इलाज के लिये नीम का तेल भी फायदेमन्द होता है।
जूँएँ

जूँएँ ऐसे कीड़े हैं जो शरीर के बालों वाले भाग में रहना पसन्द करते हैं। इसिलिये ये सिर के बालों, पलकों के बालों या जघन के बालों में पाये जाते है। ये बालों में अण्डे देते हैं और इन अण्डों से फिर और जूँएँ निकल आते हैं। जूँएँ खून पर पलते हैं और त्वचा से इसे चूसते हैं। इससे खुजली और बेआरामी होती है। आमतौर पर रात के समय खुजली ज़्यादा होती है और जिस व्यक्ति के जूँएँ हो रहे हो उसका कॅंगा और कपड़े इस्तेमाल करने से अन्य व्यक्ति को फैलते हैं। एक जूँआ भी काफी खुजली कर सकता है। आमतौर पर शरीर पर होने वाले जूँएँ जघन में होने वाले जूँओं से अलग होते हैं।

इलाज

पर्मेथ्रीन १% लोशन लगाना जूँओं का सबसे अच्छा इलाज है। इसे रात को लगाएँ। सुबह मरे हुए जूँओं को निकालने के लिए एक महीन कॅंघे का इस्तेमाल करें। उसेक बाद सिर धो लेने से बची हुए दवाई निकल जाती है। हर सप्ताह दवाई लगाएँ जब तक कि सारे जूँएँ न निकल जाएँ। जूँओं से ग्रसित कपड़ो को बीएचसी पाउडर लगाकर झाड़ कर बाद में धो लें या कपडे उबाल लें व धूप में सुखा लें। पर्मेथ्रिन उपलब्ध न हो तो लिंडेन लोशन लगाया जा सकता है।

घरेलू इलाज

शरीफा के बीज़ों का पाउडर बालों के तेल में मिलाकर लगाने से जूओं से मुक्ति मिल सकती है। आमतौर पर एक बार लगाने पर ही फायदा हो जाता है। परन्तु एक हफ्ते बाद यह इलाज दोहराया जा सकता है। शरीफा की पत्तियों का लेप भी रात भर के लिए बालों में लगाने से फायदा हो सकता है। एक और घरेलू इलाज है तेल में मिलाकर कपूर लगाना। दूसरे दिन बाल धोकर काढ़ने से मरे हुए जूँएँ और लीखें निकल जाती हैं।

पलकों के जूँएँ

अगर पलकों के बालों में जूँएँ हो जाएँ तो इसके लिए खास ध्यान देने की ज़रूरत होती है। इस हालत में हम बीएचसी (लिंडेन) नहीं लगा सकते हैं। बारीक चिमटी की मदद से जूँएँ निकाले। पिलोकार्पिन मलहम लगाने से जूँओं की पकड़ कमजोर पड़ जाती है और उन्हें निकालना आसान हो जाता है।
दाद

दाद एक फफूँद का संक्रमण है जिसमें गोल-गोल दाग हो जाते हैं। दाद शरीर के किसी भी हिस्से पर यहॉं तक कि खोपड़ी पर भी हो सकते है। इसमें बहुत खुजली होती है।

कारण और फैलाव

बडी खुजली की तरह यह संक्रमण भी अस्वच्छ हालातों में सम्पर्क होने से होता है।

चिकित्सीय लक्षण

दाद में भी भयंकर खुजली होती है। दाद के दाग गोलाकार होते हैं और उनके बीच में एक साफ दिखने वाला हिस्सा होता है। बाहर का घेरा शोथग्रस्त (खुरदुरा, लाल) दिखता है और उसमें लगातार खुजली होती है।

इलाज

दाद के लिए सबसे असरकारी फफूँद रोधी दवा मिकानाजोल मलहम है। इसके अलावा निस्टेटिन, हेमाइसिन और सेलीसिलिक एसिड का भी इस्तेमाल होता है। विटफील्ड मलहम में सैलीसिलिक अम्ल और बैन्जाइक अम्ल होते हैं। यह एक सस्ती और असरकारी दवा है। दाद के निशान न रहने के कम से कम दो हफ्ते बाद तक दवा का इस्तेमाल करना हैं। अगर दाद उपरी दवा से ठीक नहीं होते हैं तो फफूँद रोधी गोली (जैसे ग्रिसियोफल्विन) खानी पड़ती है। आयुर्वेद में लताकरन्ज के तेल का इस्तेमाल फायदेमन्द बताया गया है। आँतों की सफाई भी मददगार हो सकती है। मेदक का इस्तेमाल किया जा सकता है जैसे कि त्रिफला चूरण या अरण्ड का तेल। अमलतास की पत्तियों का लेप दिन में दो बार करना भी एक इलाज है। खाने में नमक कम हो।

त्वचा के एक और फफूँद वाले संक्रमण में खुजली नहीं होती, इसे टीनिया वर्सीकोलर कहते हैं। इसमें पीठ के ऊपरी हिस्से व छाती में हल्के धब्बे पड़ जाते हैं। यह फफूँद एक ऐसा संक्रमण है जो बहुत चिरकारी होता है और जिस पर किसी भी दवा का आसानी से असर नहीं पड़ता। इसके चार हफ्तों के लिए क्लोट्रिमझोल मलहम लगाएँ। दिन में दो बार मल्हम को अच्छी तरह चमडीपर घिस कर लगाएँ।
नाखूनों में फफूँद का संक्रमण

एक तरह की फफूँद नाखूनों पर असर डालती है। इस बीमारी में भी दवाई आसानी से असर नहीं करती खुजली और नाखूनों के आस पास का रंग उड़ जाना इस बीमारी के प्रमुख लक्षण हैं छ: माह तक ग्रिसियोफल्विन की गोलियॉं लेने से बीमारी में फायदा होता हैं। लेकिन यह डॉक्टरी सलाह के अनुसार ही करे।
मदुरा पैर

यह एक फफूँद का संक्रमण है जिसमें त्वचा और उसके नीचे के ऊतकों पर असर होता है। इसमें आमतौर पर पैर पर असर होता है। यह भारत के कुछ हिस्से और अन्य उष्ण देशों में होता है। नंगे पैर चलना इस बीमारी का सबसे आम कारण है। फफूँद से त्वचा और उसके नीचे के ऊतकों में लगातार शोथ होता रहता है। यह एक दर्दरहित गॉंठ के रूप में शुरू होता है। धीरे-धीरे और गॉंठे बन जाती हैं और उसमें से स्राव निकलने लगता है इससे छोटे-छोटे छेंद (साइनस) हो जाते हैं। इन साइनसों में से फफूँद के कण निकलने लगते हैं। पैर फूलने लगता है और यह चक्र कई सालों तक चलता रहता है। पुराने छेंद ठीक हो जाते हैं और नए बन जाते हैं। पैर भारी हो जाता है और व्यक्ति बड़ी मुश्किल से चल पाता है। इलाज मुश्किल है। किसी त्वचारोग विशेषज्ञ को दिखाया जाना चाहिए।
पायोडरमा

पायोडरमा त्वचा में बैक्टीरिया से होने वाला संक्रमण है। स्कैबीज़ और एलर्जी की तरह पहले से हुए घावों में पीप बन सकती है। यह पूरी तरह से अपने आप भी बन सकती है। पामा याने स्कैबीज़, एलर्जी से होने वाला एक्ज़ीमा, जख्म आदि सभी में बैक्टीरिया से सम्पर्क होने से हो सकता है। पायोडरमा बच्चों में काफी आम है।

चिकित्सीय लक्षण

संक्रमण हो जाने पर त्वचा सूज जाती है, लाल हो जाती है और उसमें खुजली होती है। त्वचा के घावों में से पीप निकलने लगती है। उस क्षेत्र की गिल्टियॉं सूज जाती हैं और उनमें दर्द होता है।

इलाज

घावों पर संक्रमणरोधी दवा लगाएँ। जेंशन वायोलेट काफी सस्ता होता है। लेकिन फ्रेमासेटीन या नाईट्रोफ्यूरेंनटोएन मलहम ज्यादा असरकारी होता हैं। नीम का तेल भी फायदेमन्द होता है। यह एक असरकारी इलाज है खासकर उस समय जब पीप निकल रही हो। आमतौर पर इलाज एक सप्ताह चलता रहना चाहिए।

मुँह से खाने वाली दवाई

अगर गिल्टियों में सूजन हो या ऐसा लगे है कि संक्रमण फैल रहा है तो रोगाणु नाशक दवाइयॉं (जैसे ऍमॉक्सिसिलिन या कोट्रीमोक्साजोल) पॉंच से सात दिनो तक प्रयोग करे। इसके साथ एस्परीन और आईब्रूफेन दर्द और सूजन को कम करते हैं।
एलर्जी

मनुष्य का शरीर रोज़ ही कई चीज़ों से सम्पर्क में आता है। इनमें से कुछ चीज़ें एलर्जी करने वाली हो सकती है। एलर्जी असल में शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का इन चीज़ों के लिए प्रतिक्रिया है। इन तत्वों को ऐलजेंस या एन्टीजेन कहते है। धूल, कण, परागकण, खाने की कोई चीज़ या कभी-कभी सूरज की रोशनी भी एलर्जी पैदा कर सकती है। लगभग कोई भी चीज़ एलर्जी कर सकती है और इससे शरीर का कोई भी भाग प्रभावित हो सकता है। त्वचा उनमें से एक है।

एलर्जिक त्वचाशोथ या एक्ज़ीमा

एलर्जिक डर्मेटाईटिस (एक्ज़ीमा) एक बहुत ही आम बीमारी है। यह दो तरह की हो सकती है। सम्पर्क एक्ज़ीमा और एक्ज़ीमा (यानि किसी भी तरह के एलर्जी करने वाले तत्वों जैसे खाने की चीज़ों या धूल आदि के लिए शरीर की प्रतिक्रिया।)

हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग चीज़ें एलर्जी करने वाली साबित हो सकती है। कुछ लोगों को किसी पदार्थ जैसे कॉंग्रेस घास या पार्थीनियम से जबरर्दस्त एलर्जी हो सकती है। लेकिन कई और लोग इसे आसानी से सह सकते हैं। हर मामले में एलर्जी करने वाले कारक की जॉंच करना मुश्किल होता है। कुछ चीज़ें अक्सर ही एलर्जी का कारण बनती रहती है चांदनी घास एक बहुत ही आम एलर्जी करने वाली चीज़ है, ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यह इस देश के लिए नई है। चांदनी घास साठ और सत्तर के दशक में विदेशों से गेहूँ के आयात के साथ भारत में आई थी।

एलर्जी समय के चलते कम या ज़्यादा हो सकती है। यह भी ज़रूरी नहीं है कि एक व्यक्ति हमेशा ही किसी पदार्थ के प्रति एलर्जिक रहे। आज जो पदार्थ किसी के लिए एलर्जीक न भी हो तो कल वो एलर्जीक हो सकता हे। इसी तरह आज शरीर को जिस चीज से एलर्जी होती है कल उससे ऐलर्जी होना बन्द भी हो सकती है। क्योंकि कुछ अवधी में शरीर उसे सहना सीख सकता है। एलर्जी की समस्या कई अन्य कारकों के कारण तीव्र भी हो सकती है और बार-बार होने वाली भी। एलर्जी की गम्भीरता भी अलग-अलग होती है और यह कभी-कभी जानलेवा भी हो सकती है जेसे कि पैंसलीन दिए जाने पर बहुत तीव्र प्रतिकिया होना। कई दवाइयों से गम्भीर एलर्जिक प्रतिकिया हो सकती है। कई एक सब्जियों से चिरकारी एलर्जिक डरमेटाइटिस हो सकती है। विभिन्न फूलों के परागकण, भूॅसी धूल, सूरज की रोशनी, कीड़े मारने की दवाइयॉं, खाने की चीज़ें और कपड़े एलर्जी करने वाली आम चीज़ें हैं।

चिकित्सीय लक्षण

एलर्जिक त्वचा शोथ डर्मेटाईटिस त्वचा का शोथ है और इससे आमतौर पर बेहद खुजली होती है। कई बार यह संक्रमण वाले डर्मेटाईटिस जैसा लग सकता है। संक्रमण वाले एलर्जिक डर्मेटाईटिस में गिलटियॉं हो सकती है। चिरकारी डरमेटाइटिस से त्वचा मोटी हो सकती है व काली पड़ सकती है। एलर्जी होकर खतम भी हो सकती है और इसकी गम्भीरता भी कई कारकों पर निर्भर करती है। ऍलर्जिक त्वचा शोथ के कुछ प्रकार यहॉं दिये है।

अर्टीकेरिया - पित्ती

पूरे शरीर पर लाल दाने होने और उनमें खुजली होने की हालत को अर्टीकेरिया या पित्ती कहते है। यह किसी दवा के लिए प्रतिक्रिया या कोई और एलर्जी हो सकती है।

सेबोरेहिक डर्मेटाइटिस

यह वो बीमारी है जिसमें शरीर के कुछ भाग बहुत से तेलीय पदार्थ स्रवित करने लगते है। यह केवल खोपड़ी, चेहरे, कानो के ऊपर, स्तनों के नीचे, कन्धों के बीच में, बगलों या जॉंघों में होता है।

नवजात शिशुओं में एक्ज़ीमा

यह चेहरे और धड़ पर चकत्तो के रूप में देखा जा सकता है। नैपकीन से होने वाले चकत्ते भी इसके उदाहरण है।

बच्चों में होने वाला एक्ज़ीमा

बहुत से बच्चों को एक्ज़ीमा हो सकता है। पैरों और कोहनियों में चकत्ते हो सकते है। यह आमतौर पर बच्चे के पॉंच साल का होने तक ठीक हो जाते हैं।

इलाज

गम्भीर और गहन एलर्जी में तुरन्त और किसी कुशल व्यक्ति द्वारा एन्टीएलर्जिक दवाइयों (जैसे सीपीएम और स्टीरॉएड) के इन्जैक्शन ज़रूरी होता है। कम गम्भीर (हल्की) एलर्जी के लिए ज़रूरी होता है कि एलर्जी को दबाया जाएँ। एलर्जी वाली जगह पर स्टीरॉएड युक्त मलहम और साथ में अँटी हिस्टेमिन (जैसे सीपीएम) की गोलियॉं देना इलाज में शामिल है। परन्तु इस इलाज से केवल अस्थाई आराम हो सकता है। स्टीरॉएड अगर दो तीन दिनों से ज़्यादा लम्बे समय तक दिए जाएँ तो इनसे नुकसान हो सकता है। खुजली को सीपीएम की गोलियों से ठीक करें। हल्की फुलकी एलर्जी का इलाज ज़रूरी नहीं है।

प्राकृतिक उपाय

कीड़े के काटने पर उस स्थान पर खेत की मिट्टी का लेप करें।

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