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जैसा कि इसके नाम से ही सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ है, इस टेसà¥à¤Ÿ में बà¥à¤²à¤¡ में मौजूद रोगाणॠका संवरà¥à¤§à¤¨ (कलà¥à¤šà¤°) किया जाता है. सामानà¥à¤¯ शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ में कहें तो à¤à¤• तरह से रोगाणà¥à¤“ं की खेती की जाती है, जिसमें उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ वृदà¥à¤§à¤¿ करने का पूरा मौका दिया जाता है. इससे मरीज के बà¥à¤²à¤¡ में मौजूद रोगाणà¥à¤“ं जैसे बैकà¥à¤Ÿà¥€à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ या फंगस आदि के पà¥à¤°à¤•ार का पता लगाना आसान हो जाता है. इसके बाद सेंसिटिविटी टेसà¥à¤Ÿà¤¿à¤‚ग की जाती है जिससे पता चलता है कि संबंधित रोगाणॠपर कौन सी à¤à¤‚टीबायोटिक असर करेगी और कौन सी नहीं. इससे डॉकà¥à¤Ÿà¤° को उचित दवा चà¥à¤¨à¤¨à¥‡ में मदद मिलती है और मरीज का इलाज आसान हो जाता है.
बà¥à¤²à¤¡ कलà¥à¤šà¤° à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ परीकà¥à¤·à¤£ है जो रकà¥à¤¤ में कीटाणà¥à¤“ं (जैसे बैकà¥à¤Ÿà¥€à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ या कवक) की तलाश करता है । यदि कीटाणॠपाठजाते हैं, तो परीकà¥à¤·à¤£ से डॉकà¥à¤Ÿà¤°à¥‹à¤‚ को यह जानने में à¤à¥€ मदद मिल सकती है कि संकà¥à¤°à¤®à¤£ के इलाज के लिठकौन सी दवाà¤à¤‚ सबसे अचà¥à¤›à¤¾ काम करेंगी।
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