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जनà¥â€à¤® से मृतà¥â€à¤¯à¥ तक जरà¥à¤°à¥€ हैं ये संसà¥â€à¤•ार, जानिठकौन से
सनातन धरà¥à¤® सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ धरà¥à¤® है। सनातन धरà¥à¤® के लिठहमारे ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿ और महातà¥à¤®à¤¾à¤“ं नें तप और शोध किà¤à¥¤ सनातन में जीवन को धरà¥à¤® के साथ जोड़ने के लिठइंसान के पैदा होने से पहले से लेकर मृतà¥à¤¯à¥ तक 16 संसà¥à¤•ार...
जनà¥â€à¤® से मृतà¥â€à¤¯à¥ तक जरà¥à¤°à¥€ हैं ये संसà¥â€à¤•ार, जानिठकौन से
सनातन धरà¥à¤® सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ धरà¥à¤® है। सनातन धरà¥à¤® के लिठहमारे ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿ और महातà¥à¤®à¤¾à¤“ं नें तप और शोध किà¤à¥¤ सनातन में जीवन को धरà¥à¤® के साथ जोड़ने के लिठइंसान के पैदा होने से पहले से लेकर मृतà¥à¤¯à¥ तक 16 संसà¥à¤•ार बताठगठहैं। इन 16 संसà¥â€à¤•ारों के बारे में कई बार चरà¥à¤šà¤¾ की जाती है, लेकिन à¤à¤• सचà¥â€à¤šà¤¾à¤ˆ यह à¤à¥€ है कि अधिकांश लोग अब इनके बारे में नहीं जानते। हिनà¥â€à¤¦à¥‚ धरà¥à¤® को मानने वाले इनमें से सिरà¥à¤« कà¥à¤› ही संसà¥â€à¤•ारों का पालन कर पा रहे हैं।
गरà¥à¤à¤¾à¤§à¤¾à¤¨: विवाह के बाद गृहसà¥à¤¥ जीवन में पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करने पर पहले करà¥à¤¤à¤µà¥à¤¯ के रà¥à¤ª में इस संसà¥à¤•ार को सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ दिया गया है। उतà¥à¤¤à¤® संतान कि पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ और गरà¥à¤à¤¾à¤§à¤¾à¤¨ से पहले तन-मन को पवितà¥à¤° और शà¥à¤¦à¥à¤§ करने के लिठयह संसà¥à¤•ार करना आवशà¥à¤¯à¤• है।
पà¥à¤‚सवन: पà¥à¤‚सवन गरà¥à¤à¤¾à¤§à¤¾à¤¨ के तीसरे माह के दौरान होता है। इस समय गरà¥à¤à¤¸à¥à¤¥ शिशॠका मसà¥â€à¤¤à¤¿à¤·à¥â€à¤• विकसित होने लगता है। इस संसà¥â€à¤•ार के जरिठगरà¥à¤à¤¸à¥à¤¥ शिशॠमें संसà¥à¤•ारों की नीव रखी जाती है।
सीमनà¥à¤¤à¥‹à¤¨à¥à¤¨à¤¯à¤¨: इस संसà¥à¤•ार को सीमंत संसà¥à¤•ार à¤à¥€ कहा जाता है। इसका अरà¥à¤¥ होता है सौà¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ समà¥â€à¤ªà¤¨à¥â€à¤¨ होना। इस संसà¥à¤•ार का मà¥à¤–à¥à¤¯ उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ गरà¥à¤à¤ªà¤¾à¤¤ रोकने के साथ साथ शिशॠके माता-पिता के जीवन की मंगल कामना की जाती है।
जातकरà¥à¤®: संसार में आने वाले शिशॠको बà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿,सà¥à¤µà¤¾à¤¸à¥à¤¥à¥à¤¯ और लंबी उमà¥à¤° की कामना करते हà¥à¤ सोने के किसी आà¤à¥‚षण या टà¥à¤•ड़े से गà¥à¤°à¥à¤®à¤¨à¥à¤¤à¥à¤° के उचà¥à¤šà¤¾à¤°à¤£ के साथ शहद चटाया जाता है। इसके बाद मां बचà¥à¤šà¥‡ को सà¥à¤¤à¤¨à¤ªà¤¾à¤¨ कराती है।
नामकरण: जनà¥à¤® के 11 वें दिन शिशॠका नामकरण संसà¥à¤•ार रखा जाता है। इसमें बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ हवन पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ करके जनà¥à¤® समय और नकà¥à¤·à¤¤à¥à¤°à¥‹ के हिसाब से कà¥à¤› अकà¥à¤·à¤° सà¥à¤à¤¾à¤ जाते हैं जिनके आधार पर शिशॠका नाम रखा जाता है।
निषà¥â€à¤•à¥à¤°à¤®à¤£: जनà¥à¤® के चौथे माह में यह संसà¥à¤•ार निà¤à¤¾à¤¯à¤¾ जाता है। निषà¥à¤•à¥à¤°à¤®à¤£ का मतलब होता है बाहर निकालना। इस संसà¥à¤•ार से शिशॠके शरीर को सूरà¥à¤¯ की गरà¥à¤®à¥€ और चंदà¥à¤°à¤®à¤¾ की शीतलता से मà¥à¤²à¤¾à¤•ात कराई जाती है ताकि वह आगे जाकर जलवायॠके साथ तालमेल बैठा सके।
अनà¥à¤¨à¤ªà¥à¤°à¤¾à¤¶à¤¨: जनà¥à¤® के छह महीने बाद इस संसà¥à¤•ार को निà¤à¤¾à¤¯à¤¾ जाता है। जनà¥à¤® के बाद शिशॠमां के दूध पर ही निरà¥à¤à¤° रहता है। छह माह बाद उसके शरीर के विकास के लिठअनà¥à¤¯ पà¥à¤°à¤•ार के à¤à¥‹à¤œà¥à¤¯ पदारà¥à¤¥ दिठजाते हैं।
चूड़ाकरà¥à¤®: चूड़ाकरà¥à¤® को मà¥à¤‚डन à¤à¥€ कहा जाता है। संसà¥à¤•ार को करने के बचà¥à¤šà¥‡ के पहले, तीसरे और पांचवे वरà¥à¤· का समय उचित माना गया है। इस संसà¥à¤•ार में जनà¥à¤® से सिर पर उगे अपवितà¥à¤° केशों को काट कर बचà¥à¤šà¥‡ को पà¥à¤°à¤–र बनाया जाता है।
विदà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤‚à¤: जब शिशॠकी आयॠहो जाती है तो इसका विदà¥à¤¯à¤¾à¤°à¤‚ठसंसà¥à¤•ार कराया जाता है। इस संसà¥à¤•ार से बचà¥à¤šà¤¾ अपनी विदà¥à¤¯à¤¾ आरंठकरता है। इसके साथ-साथ माता-पिता औऱ गà¥à¤°à¥à¤“ं को à¤à¥€ अपना दायितà¥à¤µ निà¤à¤¾à¤¨à¥‡ का अवसर मिलता है।
करà¥à¤£à¤à¥‡à¤¦: करà¥à¤£à¤à¥‡à¤¦ संसà¥à¤•ार का आधार वैजà¥à¤žà¤¾à¤¨à¤¿à¤• है। बालक के शरीर की वà¥à¤¯à¤¾à¤§à¤¿ से रकà¥à¤·à¤¾ करना इस संसà¥à¤•ार का मà¥à¤–à¥à¤¯ उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ होता है। कान हमारे शरीर का मà¥à¤–à¥à¤¯ अंग होते हैं, करà¥à¤£à¤à¥‡à¤¦ से इसकि वà¥à¤¯à¤¾à¤§à¤¿à¤¯à¤¾à¤‚ कम हो जाती है और शà¥à¤°à¤µà¤£ शकà¥à¤¤à¤¿ मजबूत होती है।
यजà¥à¤žà¥‹à¤ªà¤µà¥€à¤¤:यजà¥à¤žà¥‹à¤ªà¤µà¥€à¤¤ यानी उपनयन संसà¥à¤•ार में जनेऊ पहना जाता है। मà¥à¤‚डन और पवितà¥à¤° जल में सà¥à¤¨à¤¾à¤¨ à¤à¥€ इस संसà¥à¤•ार के अंग होते हैं। यजà¥à¤žà¥‹à¤ªà¤µà¥€à¤¤ सूत से बना वह पवितà¥à¤° धागा है जिसे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ बाà¤à¤‚ कंधे के ऊपर और दाईं à¤à¥à¤œà¤¾ के नीचे पहनता है।
वेदारंà¤: इस संसà¥à¤•ार के बाद वà¥â€à¤¯à¤•à¥â€à¤¤à¤¿ वेदों का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ लेने की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ करता है। इसके अलावा जà¥à¤žà¤¾à¤¨ और शिकà¥à¤·à¤¾ को अपने अंदर समाहित करना à¤à¥€ इस संसà¥à¤•ार का उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ है।
केशांत: गà¥à¤°à¥à¤•à¥à¤² में वेद का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करने के बाद आचारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ की उपसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ में यह संसà¥à¤•ार किया जाता है। यह संसà¥à¤•ार गृहसà¥à¤¥ जीवन में कदम रखने की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ माना जाता है।
समावरà¥à¤¤à¤¨: केशांत संसà¥à¤•ार के बाद समावरà¥à¤¤à¤¨ संसà¥à¤•ार किया जाता है। इस संसà¥à¤•ार से विदà¥à¤¯à¤¾ पूरà¥à¤£ करके समाज में लौटने का संदेश दिया जाता है।
विवाह:पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ समय से ही सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ और पà¥à¤°à¥à¤· के लिठयह सबसे महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ संसà¥à¤•ार माना गया है। सही उमà¥à¤° होने पर दोनों का विवाह करना उचित माना जाता है।
अनà¥à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤·à¥à¤Ÿà¤¿: इंसान की मृतà¥à¤¯à¥ होने पर उसका अंतिम संसà¥à¤•ार कराया जाना ही अंतà¥à¤¯à¥‡à¤·à¥à¤Ÿà¤¿ कहा जाता है। हिंदू धरà¥à¤® के अनà¥à¤¸à¤¾à¤° मृत शरीर का अगà¥â€à¤¨à¤¿ से मिलन कराया जाता है।
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