बच्चा जन्म के बाद क्यों नहीं रोता?HealthPlanet

Posted on Fri 11th Nov 2022 : 09:30

जन्म के समय बच्चा नहीं रोया, केवल इसकी बदौलत नहीं माना जा सकता कि बच्चे में डेवलपमेंट डिले है। बच्चों की डेवलपमेंटल परफॉरमेंस नापने के कई टेस्ट होते हैं। इनमें ग्रॉस एंड फाइन मोटर, स्पीच एंड लैंग्वेज, सोशल एंड पर्सनल के अलावा डेली लिविंग की एक्टीविटीज के बारे जाना जाता है। ये कहना है पीजीआइ के एडवांस पेडियेट्रिक विभाग की हेड व पेडियेट्रिक न्यूरोलॉजी यूनिट की हेड प्रो. प्रतिभा सिंघी का, जो चौथी पीजीआइ पेडियेट्रिक सीएमइ के दौरान बच्चों के न्यूरोलॉजिकल रोगों बारे जानकारी दे रही थी। उन्होंने कहा कि अगर किन्हीं दो में बच्चा पीछे हो तो उसे ग्लोबल डेवलपमेंटल डिले माना जाता है। अगर बाल रोग विशेषज्ञ के पास ऐसा बच्चा आता है तो उस बच्चे की तीन पीढि़यों का संपूर्ण ब्यौरा लेना चाहिए। इसके साथ बच्चे का डिटेल न्यूरोलॉजिकल एग्जामिनेशन होना चाहिए। उसका साइकोमीट्रिक इवेल्यूएशन व फंक्शनल लेवल व लेबोरट्री टेस्ट होने चाहिए जिनमें जेनेटिक टेस्टिंग, मेटाबोलिक टेस्ट, एमआरआइ स्कैन इत्यादि शामिल हैं। ग्लोबल डेवलपमेंट डिले शब्द का प्रयोग उन बच्चों के लिए होता है, जिनका विकास देर से होता है। पांच साल से नीचे के बच्चों के लिए इसका प्रयोग होता है। इससे बड़े बच्चों के लिए मेंटल रिटार्डेशन शब्द या बौद्धिक विकलांगता शब्द का इस्तेमाल होता है।

एडीएचडी से दस प्रतिशत तक बच्चे प्रभावित

चाइल्ड साइकोलॉजी यूनिट के हेड डॉ. प्रभजोत मल्ही ने अटेंशन डेफीसिट हाइपर एक्टीविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) के बारे बताया कि यह बच्चों में आम होने वाला न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिससे 5 से दस प्रतिशत बच्चे प्रभावित होते हैं। यह हाइपर एक्टीविटी, इंपल्सीविटी से जाना जाता है। लड़कों में यह विकार लड़कियों की अपेक्षा ज्यादा होता है। एडीएचडी के होने के कारणों का आज तक नहीं पता। पीड़ित व्यक्ति के ब्रेन में कई जेनेटिक, एनवायरमेंटल, स्ट्रक्चरल व फंक्शनल चेंजेज होते हैं। कई उत्तेजक दवाओं से इसका इलाज होता है। जो उत्तेजक दवाएं नहीं झेल सकते, उन्हें नॉन उत्तेजक दवाएं दी जाती हैं। बीमारी से पीड़ित युवाओं पर दवा देने के दौरान डॉक्टरों को नजर रखनी पड़ती है।

मिरगी की दवा एकदम बंद नहीं करनी चाहिए

पीजीआइ के पेडियेट्रिक न्यूरोलॉजी टीम के डॉ. नवीन सांख्यान ने बच्चों में दौरों के बारे बताया। अगर तो दौरे ब्लड ग्लूकोज लेवल घटने, हेड इंजरी या मेनीनजाइट्स इत्यादि से हो रहे हैं तो यह मिरगी के दौरे नहीं हैं। अगर इससे इत्तर दौरों की वजह है तो यह मिरगी के दौरे होते हैं। सामान्य दौरे भी कई मर्तबा मिरगी के दौरों जैसे लगते हैं, जिनमें फर्क करना निहायत जरूरी है। दौरे भी बच्चों में दो प्रकार के होते हैं। एक जिसमें पूरा शरीर शामिल होता है, जबकि दूसरा जिसमें शरीर का केवल एक अंग शामिल होता है। डॉ. जितेंद्र साहू ने बताया कि मिरगी के दौरों की दवा कब बंद कर देनी चाहिए। अमेरिकन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी गाइडलाइंस का हवाला देते हुए बताया कि दो से पांच साल दवा देने के बाद अगर बच्चे को दौरे पड़ने बंद हो गए हैं तो मिरगी की दवा बंद की जा सकती है।

आइक्यू कम है तो प्रबल संभावना है, दौरा पड़ेगा

साहू ने कहा कि अगर बच्चे की इइजी एब्नार्मल आती है, बच्चे को 2 साल से नीचे या दस से ऊपर की उम्र में दौरे पड़ते हैं, अगर बच्चे का आइक्यू कम है और उसमें दौरे रोकने की क्षमता नहीं है तो मिरगी के दौरे दोबारा पड़ने की प्रबल आशंका रहती है। मिरगी के रोग में दवा तुरंत बंद नहीं कर देनी चाहिए क्योंकि इसके दोबारा होने की काफी आशंका रहती है। धीरे धीरे दवा को घटाना चाहिए।

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