दिमाग में गर्मी क्यों होती है?HealthPlanet

Posted on Fri 9th Dec 2022 : 16:46

चिन्ता के कारण मस्तिष्क में गर्मी बहुत बढ़ जाती है और वह वहां की स्निग्धता, सरलता एवं कोमलता को नष्ट करके दाह एवं उष्णता उत्पन्न करती है। चिन्ताशील मनुष्य का मस्तिष्कीय परीक्षण करने पर पाया गया है कि श्वेत बालुका और पीत पदार्थ (ग्रे मैटर) सूखकर कड़े और ठोस हो जाते हैं।

दिमाग तक भी होता है असर

बढ़े हुए तापमान का बुरा असर शरीर के बाकी हिस्सों के साथ दिमाग तक भी पहुंच सकता है। इसकी वजह से दिमाग की स्थिति और व्यवहार में भी असंतुलन पैदा हो सकता है। बोलते समय लड़खड़ाना, चिड़चिड़ाहट, भ्रम, बैचेनी जैसे लक्षण इसमें काफी सामान्य हैं। इन स्थितियों में त्वरित बचाव के उपाय करना आवश्यक हो जाता है।

मानसिक स्थिति पर नजर रखने के साथ ही अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखें। जैसे शरीर के तापमान का अधिक बढ़ना, शरीर की नमी का कम होना और त्वचा का रूखा होना, पसीने के कम होना, जी घबराना और उल्टी आना, त्वचा का लाल पड़ना, सांसों का तेज चलना और धड़कनों का बढ़ जाना तथा सिरदर्द की समस्या पर इन दिनों विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।

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